पिता कि परछाई
अभिषेक मिश्रा
चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश)
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पिता कोई नाम नहीं, एक एहसास है,
जो परछाईं बन हर पल मेरे पास है।
बचपन में जब पाँव लड़खड़ाए थे,
वो थाम के उँगली चलाते थे।
मैं हँसूं यही कामना लेकर,
ज़ख़्म अपने मन में छुपाते थे।।
कभी सिर पे छत, कभी गीतों में,
हर रूप में साया बन जाते थे।
मैं न गिरूं, यही सोच-सोचकर,
अपने घावों को सह जाते थे।।
पढ़ाई की रातों में नींद नहीं थी
जब पन्नों संग मैं लड़ता था।
चाय की हल्की भाप लिए,
हर सवाल में संग मुस्काते थे।।
मेरी किताबों में जो उजाला था,
उसमें उनकी थकन समाई थी।
मैं जो कुछ भी बन पाया आज,
वो बस उनकी छांव से आई थी।।
जब नौकरी की ओर मैं बढ़ा,
वो बैग मेरा खुद उठाते थे।
भीड़ में पीछे रहते हुए भी,
मुझे सबसे आगे बतलाते थे।।
मेरे नए शहर की रौशनी में,
उनकी आंखों का पानी था।
मैं जो खड़ा था मंचों पर,
वो नीचे बैठ...















