नाज
कंचन प्रभा
दरभंगा (बिहार)
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मुझे कुछ और जमाने से क्या
उन पर मुझे बहुत ही नाज है।
चाहने वाले तो उन्हे बहुत है मगर
उनके दिल पर सिर्फ मेरा ही राज है
मुझे कुछ और जमाने से क्या
उन पर मुझे बहुत ही नाज है।
उन्हे देखूँ उन्हे चाहूँ उनके साथ चलती जाऊँ
अब अन्त समय तक बस यही काज है
मुझे कुछ और जमाने से क्या
उन पर मुझे बहुत ही नाज है।
लाख शोहरत पा भी लूँ दुनिया में
साथ उनके चलना ही मेरे सर का ताज है
मुझे कुछ और जमाने से क्या
उन पर मुझे बहुत ही नाज है।
उड़ने भी लगूं गगन में पंछी की तरह
उनकी हथेली ही मेरी परवाज है
मुझे कुछ और जमाने से क्या
उन पर मुझे बहुत नाज है।
कितने ही गीत लिखूँ मैं अपनी कलम से
हर गीत में छुपा हुआ उनका ही साज है
हमे कुछ और जमाने से क्या
उन पर मुझे बहुत ही नाज है।
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परिचय :- कंचन प्रभा
निवासी - लहेरियासराय, दरभंगा, बिहार
आप भी अपनी कवि...



















