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कविता

बेटियां
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बेटियां

आयुषी दाधीच भीलवाड़ा (राजस्थान) ******************** माँ का प्रश्न तो पिता का उत्तर होती हैं बेटियां, माँ की चाल तो पिता की उड़ान होती हैं बेटियां, माँ का स्वार्थ तो पिता का संतोष होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की चिंता तो पिता का प्यार होती हैं बेटियां, माँ की दुलारी तो पिता की परी होती हैं बेटियां, माँ की ममता तो पिता का अपनापन होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की सीख तो पिता की दिशा होती हैं बेटियां, माँ की गोद तो पिता की दुनिया होती हैं बेटियां, माँ की आस तो पिता का विश्वास होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। माँ की परछाई तो पिता का गर्व होती हैं बेटियां, माँ की हमदर्द तो पिता की दवा होती हैं बेटियां, माँ की अश्रुधारा तो पिता की धड़कन होती हैं बेटियां, हां, यही तो होती हैं बेटियां। परिचय :-  आयुषी दाधीच शि...
माता
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माता

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** सुख देती बच्चों को माता। जग की देखो वही विधाता।। माँ ही जानो होती अम्बे। करे कृपा माता जगदम्बे।। स्वर्ग मिले चरणों में उसके। कर सेवा बच्चों जी भर के।। माता सीता माँ अनुसुइया मां जशुदा है माँ कौशल्या। आशीषों की है फुलवारी। बच्चों की करती रखवारी।। सद्गुण हमको मातु सिखाती। बच्चों को वह अमृत पिलाती।। मात हृदय को तुम न दुखाओ। बच्चों उसका साथ निभाओ।। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सतर्कता समिति जबलपुर की भूतपूर्व चेयरपर्सन। प्रकाशित ...
मेरी पसंद
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मेरी पसंद

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** माता दुर्गा की पूजा की श्री राम ने, वह तट पसंद है, माता सीता ने वनवास काटा, वह पंचवटी पसंद है। हनुमाना ने लंका की उजाड़ी, वह वाटिका पसंद है, राम-सीते का मिलन हुआ, वह वाटिका पसंद है। लव-कुश का जन्मोत्सव हुआ, वह आश्रम पसंद है, रामकृष्ण परमहंस ने ज्ञान दिया, वह आश्रम पसंद है। मीरा की भक्ति से पावन हुई, वह धरती पसंद है, कृष्ण ने गोपियों संग लीला की, वह धरती पसंद है। तुलसी ने रामचरित रची, वह गंगा तट पसंद है, श्रीराम ने जलसमाधि ली, वह सरयू घाट पसंद है। कपिश्वर लाए संजीवनी, वह पाषाण पसंद है, कृष्ण ने रक्षा हेतु उठाया, वह गोवर्धन पाषाण पसंद है। जिस रज पर जीवन संभव, वह धरती पसंद है, जिस रज पर मैं चरण रखूँ, वह अपनी धरती पसंद है। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" ...
मां शब्द की अभिव्यक्ति
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मां शब्द की अभिव्यक्ति

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** मां शब्द की अभिव्यक्ति क्या करूं,1132 क्या लिखूं माँ पर कोई एक रचना! विधाता का श्रेष्ठ सृजन हमारे लिए, माँ के रूप में खुद आए हमारे लिए मां के दुलार बिन रह न पाया, हर जगह मौजूद मां का ही साया! कभी सोने न दिया भूखे पेट मुझे उठाकर नींद में, निवाला खिलाया।। मैं ईश्वर का नाम लूं न लूं दुआएं तेरी हमेशा लगती मुझे झोली में तेरी सदैव रहती मन्नतें, धागे बांधे न जाने कितने मेरे लिए।। लाख कोशिश कर लूं फिर भी, तेरा ऋण मैं उतार न पाऊंगी सलामत रहो बस मेरे लिए तुम तुम्हारी दुआओं से, यश पाऊंगी।। क्या लिखूं माँ तेरे लिए मैं शब्दों से तेरा ही दिया हुआ, ये जीवन हैं मेरा तुम्हारी स्वयं कि, मैं हूं एक रचना आज मां बनकर ही एहसास हुआ।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) ...
जीवन की पहचान
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जीवन की पहचान

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** चित्र नही चरित्र बनाये, फोटो नही मुस्कान बढाये, द्वेष नही स्नेह बढाये, राग नही अनुराग बढाये। घृणा नही प्रेम बढाये, अपमान नही सम्मान बढाये, अकेला नही समूह बनाये, धोखा नही विश्वास बनाये। बेसहारो का सहारा बन जाये, बेरोजगारी नही रोजगार बढाये, माँ मातृभूमि, और जन्मभूमि का मान बढाये, जिसका खाये उसका गाऐ। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम्मानित ४. १५००+ कविताओं की रचना व भ...
घाम पियास
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घाम पियास

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** लकलक-लकलक घाम करत हे। घाम पियास म मनखे मरत हे। काटें काबर रुख-राई ल संगी, ताते-तात आज हवा चलत हे।। बर पिपर के छईयाँ नँदागे। बिन छईयाँ के चिरई उडा़गे। आगी अँगरा कस भुइयाँ लागे, भोंमरा जरई म गोड़ भुँजागे।। नदियाँ, नरवा, अउ तरिया अटागे। जंगल झाड़ी, रुख राई कटागे। घाम पियास म सबला बचइया, हरियर धरती घाम म सुखागे ...।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिं...
पिता की रौशनी
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पिता की रौशनी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाँ बेटा, मैं तुझे अंधेरे से बचाना चाहता हूँ, जीवन के कुछ मूल सूत्र समझाना चाहता हूँ। ये सही है, मेरा बार-बार टोकना तुझे शायद अच्छा नहीं लगता, मुझसे खुलकर बात करने का मन अक्सर ही कतराता, भटकता। मेरी डाँट, मेरे शब्द तुझे जैसे चाकू-छुरा लगते हैं, पर इन्हीं में छुपे भाव मेरे तेरे भविष्य के रक्षक बनते हैं। तू क्यों नहीं समझ पाता है इन बातों की गहराई को, बात पूरी सुने बिना ही छोड़ देता है सच्चाई को। जल्दबाज़ी छोड़, धैर्य का ताप सहना सीख, अपने पैरों पर चलना, खुद को गढ़ना सीख। हर एक फरमाइश के पीछे कितनी मेहनत झेल रहा कोई, अपनी ही ज़िंदगी, अपने ही तन से कितना खेल रहा कोई। वक़्त किसी के लिए नहीं ठहरता, ये सच्चाई याद रखना, जो पसीने से खेलते हैं उनके पाँव में छाले भी हार मानते ये बात ...
धीरे-धीरे हँसना प्रिये …
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धीरे-धीरे हँसना प्रिये …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। सोणी-सोणी है मेरी नार, सच्चा-सच्चा है तेरा मेरा प्यार।। तुझको मेरे पास रहना है, सच्चा साथ निभाना है। धीर धारण करके रहना है, मुझे महकाते रहना है। मुझसे ही है तेरा श्रृंगार, मेरे बिना श्रृंगार है बेकार। धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। सोणी-सोणी है मेरी नार, सच्चा-सच्चा है तेरा मेरा प्यार।। रातें काली-काली होती हैं, फिर भी सुंदर सुबह होती हैं। रातों में मीठी-मीठी बातें होती हैं, मगर अधूरी रह जाती हैं। मेरी परछाई बनना प्रिये, मरने से पहले साथ रहना प्रिये। इस जीवन में मेरी हो प्रिये, फिर कहना मेरा ये ही है प्यार। सबको सच्च कहना, इसको ही कहते है सच्चा दिलदार। धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। स...
मां तो मां होती है
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मां तो मां होती है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** आंचल के छांव में, ममता के मोह में, मां तो सब सह जाती है। मां तो मां ही होती है।। स्नेह भाव, मम्मत्व से भरी। पुत्र प्रेम में सब भूल सारे कष्ट सहकर भी हंसकर जीती जाती है। बिटिया से करे हंसी ठिठोली, आंखों ही आंखों में सब कुछ समझाती। मां तो मां ही होती है।। पाल पोस कर किया बड़ा अब फिर भी सीने से लगाती है। सपने देखे बहुओं का, दामाद ढूंढे भविष्य के सपने बुने, घर को स्वर्ग बनाती है। घर संभाले, बच्चों की इच्छा पूरी करें, लाड़ लुटाए लड़के पर इतनी इतराती है। मां तो मां होती है।। सब कुछ सह कर भी जीवन नौछावर कर जाती है। ‌मिला न कोई अपना सा, अब तो मां की यादों में रहता हूं, सपनों में जीता हूं, अकेले में ही मां से बातें करता हूं ‌।‌ मां तो मां होती है।। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प...
लिखता रहूंगा
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लिखता रहूंगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जब से मैंने होश संभाला, मां-बाप ने विद्यालय में डाला, गुरुजनों और साथियों ने साथ निभाया, शब्दों को कैसे गढ़ना है- यह हुनर सिखाया। तभी से लिखता चला जा रहा हूँ, कभी अपनी उलझनें, कभी दिल के फ़साने, कभी प्रेरणा देने वालों से मुलाक़ातों के तराने। कभी प्रेम, कभी पीड़ा, कभी जीवन की टीस, तकनीक की दौड़ में भी ढूंढता रहा अपनी ही किसी चीज़। अपनों के रंग, उनके वार और प्रतिघात, भरोसेमंद हाथों से भी खाई दिल पर चोट की घात। भले ही मैं कवि या लेखक न दिखता हूँ, पर शब्दों के संग निरंतर चलता हूँ। परिवार को मुस्कान देने की कोशिश में लगा, कभी अपने ही खून से भी मिला धोखा जगा। जिसे सबसे अधिक विश्वसनीय माना, उसी से जीवन का सबसे गहरा घाव पाया, तभी तो खुद की पहचान का आईना भी कभी-कभी मुझे मेरी औका...
अतरी की वादियाँ
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अतरी की वादियाँ

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आकर देखिए जरूर यहाँ , मोहक अत्री की वादियाँ। लें खुशबू सोंधी मिट्टी की, अवलोकन करें ये घाटियाँ।। यहीं तपोवन की पुण्यभूमि , गर्म कुंड झरना पहाड़ियाँ। प्रकृति अति सुहानी लगती है , छोटी झुरमुट लताएँ-झाड़ियाँ।। जेठियन घाटी लगे अद्भुत, यहाँ दृश्य मनोरम झाँकियाँ। आकर देखें गहलौर घाटी, दशरथ की जुनूनी कहानियाँ।। शान यहाँ किसानों की है, खेतों की टेढ़ी-मेढ़ी आरियाँ। आकर निहारें अद्भुत छटा को छोटी-बड़ी यहाँ की क्यारियाँ।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
यौवन
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यौवन

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** दिन जवानी के आते जाते रहेंगे। मोहब्बत के गीत हम भी गाते रहेंगे। नाम लेकर खुदा तेरा हम उसे मनाते रहेंगे। अफसाने तो बहुत लिखे हैं हमने हर अफ़साने में तेरे नाम के साथ उसका नाम लिखते रहेंगे। लोग पूछेंगे जब भी दर्द की वजह हम भी सर्द हवाओं के साथ उसका नाम भी हम लिखते रहेंगे। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी...
सतरंगी दुनिया- २१
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सतरंगी दुनिया- २१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** अपनी ज़िंदगी को खुली किताब मत बनाइए, क्योंकि लोगों को पढ़ने में नहीं, बल्कि पन्ने फाड़ने में मजा आता है। *खिचड़ी की विशेषता देखिए- अगर बर्तन में पकती है तो बीमार को ठीक कर देती है और दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है।* अजीब है दुनिया मरने वाले को रोने वाले हजार मिल जाएंगे, मगर जो जिंदा है, उसे समझने वाला एक भी नहीं मिलता है। समय का खेल भी निराला है, भरी जेब ने दु‌निया से पहचान कराई, और खाली जेब ने इंसानों की। जो लोग हमें पसंद नहीं करते हैं, उनके बारे में अजीब बात यह है, कि वे हमारी हर चीज पर नजर रखते हैं। हमारी ज़िन्दगी भी अजीब है, होती तो है हमारी, पर जीना दूसरों के लिए पड़ता है। गर्लफ्रेंड को शराब पीते देख ब्वाय फ्रेंड ने पूछा- तुम लड़की हो के भी शराब पीती हो ? गर्लफ्रेंड ने जवाब दिया, कि क्या २-४ पैग पीने के...
मजदूर
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मजदूर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं। दिन-रात वह मेहनत करता है। चैन सुकून से वह रहता है। पसीने की कमाई वह खाता है। गीत खुशी क वह गाता हैं। मजदूर है, मजबूत है……।। माना साधन उनके पास भरपूर नहीं। औरों स वह मशहूर नहीं। कंधे पर बोझ वह ढोता है। अपनी हालत पर वह नहीं रोता हैं। मजदूर है, मजबूत है….।। परिवार का पोषण करता है। नाम मालिक का रोशन करता है। गम अपना वह छिपाता है। आँसू वह नहीं बहाता है। मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करे...
सब ठीक होने की कीमत
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सब ठीक होने की कीमत

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में हम हर दर्द को सहते चले जाते हैं और समय चुपचाप हमसे सब कुछ छीनता चला जाता है। हम कहते हैं बस थोड़ा और सह लो बस हालात बदल जाएँगे बस सुबह आ ही जाएगी। पर सुबह आती है तो चेहरे बदल चुके होते हैं जिन्हें बचाने की चाह थी वे यादों में बदल चुके होते हैं। हम घाव भरने का इंतज़ार करते हैं और जीवन लहू बहाकर आगे बढ़ जाता है हम भविष्य सँवारते रहते हैं, और वर्तमान दफन होता जाता है। सब कुछ ठीक होने तक सपने थक जाते हैं रिश्ते चुप हो जाते हैं! फिर एक दिन हालात सच में सुधरते हैं पर जश्न मनाने वाला कोई नहीं बचता क्योंकि जो चाहिए था सुख के लिए वह सब संघर्ष में खत्म हो चुका होता है!! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरव...
मैं… कहाँ रह गया मैं…?
कविता

मैं… कहाँ रह गया मैं…?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं... मैं था कभी.. मेरा स्वाभिमान.. मेरा दंभ मगर... अब मै कहाँ रह गया हूँ मैं...... तरंग विहीन उमंग विहीन धड़कते स्पंदनों के घेरे से बाहर नाना रूपी विलग स्वरूपी संवेदनाओं से ऊपर उठ कर स्वप्न सागर में तैरने का अहसास लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? मिचमिचाते तारों भरे नील गगन में मटमैले से प्रकाश में चंदा विहीन तारा पूरित नभ पर शायद अमावस्या है भाव विहीन भावों के गहन समंदर में तिरोहित भाव लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? चलाचल के समागम में हरित वसुंधरा पर ढह गई मानवीय सोच सभ्यता और संस्कृति विरासत के गुण बह गये आडंबरीय सैलाब में भौतिकता की मोह धारा में चमकता मार्तंड जगाता है विश्वास पर कैसे मानूं... फिर भी अस्तित्व है मेरा पर प्रश्न है... क्य...
पाति
कविता

पाति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ओ निरझर बता मैं किसे सुनाऊं तेरी पाति बंधे हुए सलील को उगते हुए रवि को या स्वार्थ भरे मानव को बता तू ही बता क्या धरा का वक्ष फट नही रहा बंधे बांधों के कारण। क्या बंधा जल कोस नहीं रहा अपने आपको तुझे बहता देख तेरी व्यथा पाती से अधिक है धरती का फटना बांधों का बंधना मिट्टी का कटना वृक्षों का कटना। केवल मानव कै लिए धरती फटती हैं सहती हैं जल विहिन हो जब वह मानव को अपने मे समाती हैं तो इसमे धरती का दोष कैसा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों स...
चलो चले भैया हम गांवों की ओर
कविता

चलो चले भैया हम गांवों की ओर

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** पीपल की छैंया और अमुआ की बोर, खटमिट्ठी अमिया ले आमराई से झोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी जाए खेतों की ओर, कुहू कुहू गूंजे जहां कोयल का शोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। सुरभित सुहानी सी लगे जहां नित भोर, शीतल समीर बहती जहां चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। इठलाती बलखाती बहे नदी जिस ओर, ममता की छांव में सोंधी रोटी के कौर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। गूंजे गीता की वाणी गूंजे अजान चहुं ओर, मंदिर में गूंजे है घंटों का शोर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। प्रीति का पराग झलके जहां पोर पोर, संस्कृति के रंग जहां बिखरे चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय ...
सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता

सुभद्रा कुमारी चौहान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** वीरत्व की ज्वाला से दहकती, वाणी में था हुंकार, जन-जन में जागृत करतीं वे, स्वाधीनता का संचार। कलम बनी जब शस्त्र उनका, शब्द बने रणभेरी, रानी की गाथा गाकर, भर दी हिम्मत अनेरी। नारी शक्ति का रूप प्रखर, साहस जिनका आभूषण, अंग्रेजी सत्ता से टकराईं, लेकर स्वाभिमान का वचन। झांसी की वीरांगना का, गाया अमर गान, आज भी गूंजे भारत में, उनका ओजस्वी सम्मान। ऐसी वंदनीय कवयित्री को, शत-शत नमन हमारा, वीर रस की वह अमिट ज्योति, जग में रहे उजियारा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन क...
गुरु गोविंद सिंह जी
कविता

गुरु गोविंद सिंह जी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गुरु ग्रंथ गुरु की वाणी सत मार्ग पर चलाएं, दसवें गुरु गुरु गोविंदसिंह जी नमन हमारा सो सो बार। धर्म देश रक्षा के खातिर किया देह बलिदान, साहस और वीरता से किया मुगलों पर है वार, झुके नहीं वह डटे रहे अपने पथ पर आज, सिख धर्म के कट्टर त्यागी बलिदानी है आप, देश भक्ति की भावना उनके लिए सम्मान, कितने गुरु अवतरित हुए गुरु ग्रंथ का मान, गुरु की वाणी धर्म हमारा पथ पर चले महान। डरे नहीं वह झुके नहीं वह थे योद्धा महान, धर्म में रहना उद्देश्य हमारा चाहे जाए प्राण, धर्म ना बदला नहीं झुकना ऐसे वीर महान । आज उनके चरित्र पर चलना है हमें साथ, नहीं तो राष्ट्र समाज संस्कृति गर्त में जा रही आज। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन ...
नमन उन शहीदों को …
कविता

नमन उन शहीदों को …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भारत आजाद कराने, दीवानों की वो टोली चली थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। न जाने कितने परवानों ने, सीने पर खाई गोली थी, मन में अडिग संकल्प लिए, उन्होंने ही क्रांति जगाई थी। इतिहास के पन्नों में पढ़ लेना, आजादी जिनकी दीवानी थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। माँ भारती की मुक्ति को, वीरों ने हँसकर कुर्बानी दी थी, कोई कैसे कह दे हमको, केवल अहिंसा से आजादी मिली थी? हाँ यह भी पढ़ना, कितनी 'लक्ष्मी' रणचंडी बन लड़ी थीं, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। स्वातंत्र्य-यज्ञ की वेदी पर, कितनी ही माँओं की गोद सूनी थी, न जाने कितनी बहनों ने, अपनी राखी वाली कलाई खोई थी। खदेड़ दिया फिरंगियों को, जमकर धूल चटाई थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। जह...
कृत्य और बर्बादी
कविता

कृत्य और बर्बादी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यौवन कभी तो घटेगा, बिजली संयंत्र का बायलर कभी तो फटेगा, तब नहीं होगा मुझे किसी प्रकार का आश्चर्य, वो दिन भी होगा सामान्य दिन नहीं समझूंगा कोई विशेष तिथि पर्व, क्योंकि आग इस कदर जलाया जा रहा है, हर किसी के द्वारा घी का होम दे आग भड़काया जा रहा है, नहीं मतलब किसी को देश धर्म राग से, सब संतुष्ट है भड़कती हुई आग से, नहीं पड़ना फर्क कहां लगी है आग, हर कोई भड़का रहा अग्नि धवल आग, मतलब नहीं ये आग कब कहां किसे जलायेगा, जहां ए दौर में कैसा मंजर लाएगा, वस्तु स्थिति का सामना करने बैठा है हर कोई तैयार, ग्रस्त है मानसिक रोग से राष्ट्र यार किंचित हृदय स्पंदन नहीं हो रहा है, हर हिय एक बकवास ढो रहा है, जिए जा रहा लेकर मन में इक आस, संपूर्ण लग रहा सबको किसी का बकवास, कुकृत्य कुछ अंधों की आबा...
चिरई
आंचलिक बोली, कविता

चिरई

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिरई चुरगुन के चिंव-चिंव बोली अउ फुँदक-फुँदक के रेंगना हर घाते सुग्घर लागथे। प्राकृतिक सौंदर्य हर चिरई चुरगुन ले हवय। चिरई चुरगुन बिना जंगल झाड़ी अउ महल अटारी ह सुन्ना लागथे। फेर गरमी दिन म नदियाँ नरवा, तरिया, डबरी सबो ह सुखा जाथे त चिरई चुरगुन मन बूँद-बूँद पानी बर तरसत रहि जाथे। कतकोंन चिरई मन तो दाना-पानी बिना अपन परान ल तियाग देथे। ऐसना समय म चिरई चुरगुन के जीव ल बचाय बर उदिम कर सकथन अपन घर के छत छानी मा, बारी बखरी मा अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राख के चिरई चुरगुन के पियास ल बुझा स सकथन। जेकर ले लहकत घाम म उड़त परकी परेवना अउ जम्मों चिरई चुरगुन मन अपन पियास ला बुझा सके। आज कल तो सहर तो बहुत दूरिहा के बात आय गांव म घलोक आघु कस चिरई चुरगुन देखे बर नइ मिलय। दिनों दिन चिरई चु...
नोहर की बदलती आबोहवा
कविता

नोहर की बदलती आबोहवा

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भूल गए बिहानी का वैभव, भूला वो सम्मान यहाँ, भगतसिंह के नाम पे सिसक रहा ईमान यहाँ। परशुराम चौक की गरिमा, अब धुएं में खोई है, नोहर की ये पावन माटी, आज अकेले रोई है। वो गोल गटा कुआं जहाँ, जुटती थी टोलियां कभी, आज वहां सट्टे की लत ने, छीनी सबकी खुशियां सभी। शिवाजी स्टैंड की चौखट पर, कैसा ये मंजर आया है, नोहर की गलियों के साये में, डोडों का व्यापार समाया है। न लाज रही बुजुर्गों की, न खौफ रहा अब शासन का, हर नुक्कड़ पर खेल चल रहा, नशीले उस राशन का। जहाँ गूंजते थे नारे आज़ादी और क्रांति के, वहां सौदा हो रहा है आज, समाज की शांति के। घर की दहलीज लांघ कर, अब नारी भी कदम बढ़ाती है, चंद रुपयों की खातिर वो, ज़हर घरों तक लाती है। मैली हवा में हाथ धोना, अब दस्तूर बन गया, जो शहर कभी था हीरा, वो आज नासूर...
पहचान जाहिर हो
कविता

पहचान जाहिर हो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ********************1132 सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित्र अब दरों दीवार पर सिर पटकना होगा, तथाकथित आत्माओं, भूतों की तरह अतृप्त हो इधर-उधर भटकना होगा, जिस तरह हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं, उसी तरह लोगों को अपनी संतुष्टि जताने उछलना कूदना मटकना होगा, बंधे नहीं हो मोटी जंजीरों में, आशावादी हो अपनी अनदेखी तकदीरों से, मगर सिर फंसाए हो अंधभक्ति में, आश्वस्त हो इसकी शक्ति में, तो तैयार हो ये सोच कि मूत्र पी गोबर गटकना होगा, तब तक स्वीकार्य नहीं हो, अंधत्व की सारी अदाएं शिरोधार्य नहीं हो, इन अदाओं के साथ पूरी तरह तैयार हो, देश को खोखला करने वाले अब अय्यार हो, तैयार किये गये हो छांट चुनकर, बर्बाद ए मस्तिष्क को भरोसा है तुम पर, स्वतंत्र रहने के लिए नियमों को झटकना होगा सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित...