रणबांकुरे
माया मालवेन्द्र बदेका
उज्जैन (म.प्र.)
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जंजीरों में बंधकर भी वह, जी भर कर मुस्काये थे।
देश पर बलिदान होकर, मन में बहुत हरषाये थे।
मां,बहन, बेटी उनसे, बिछुड़ने की नही पीर थी।
वह भी रांझा किसी के, उनकी भी कोई हीर थी।
पर देशप्रेम की बंधी, उनके मन में कड़ी जंजीर थी।
ऐसे वीर सपूत मीटे देश पर, वीरांगना के जाये थे।
जंजीरों में बंधकर भी वह, जी भर कर मुस्काये थे।
देश पर बलिदान होकर, मन में बहुत हरषाये थे।
दीपावली के दीप जले, होली की कहीं अबीर थी।
वीर बांकुरे मिले देश को, भारत की तकदीर थी।
आजाद देश की शान बने वह, ऐसी तस्वीर थी।
हमारे लिए बदन पर उनने, अनगिनत कोड़े खाये थे।
जंजीरों में बंधकर भी वह, जी भर कर मुस्काये थे।
देश पर बलिदान होकर, मन में बहुत हरषाये थे।
लेखिका परिचय :-
नाम - माया मालवेन्द्र बदेका
पिता - डाॅ श्री लक्षमीनारायण जी पान्डेय
माता - श्रीमती चंद्रावल...














