देखा है
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रचयिता : नेहा राजीव गरवाल
हर रोज़ सवारते हो, जिस्म को.......
उतर कर इसकी गहराई मे,
कभी अपनी रूह को देखा है???
जानते तो,हो खुद को....
मगर कभी अपनी जिम्मेदारियों को,
अपनो के बीच,चटृानो की तरह
मजबूत बना कर देखा है।
पता तो सब है, सब को .....
मगर जब रुठ जाते हे, इरादे खुद से,
हाँ,वक्त के उन बदलते हालातो मे
क्या कभी, मुसकुराकर देखा है???
चलो पढ़ तो लिया है, इस पागल की
लिखी इन बातो को....
मगर जो गहराई हे इन बातो की,
कभी उसमे उतर कर देखा है???
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लेखीका परिचय :- नेहा राजीव गरवाल दूधी (उमरकोट) जिला झाबुआ (म.प्र.)
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