विरह गीत
रशीद अहमद शेख 'रशीद'
इंदौर म.प्र.
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बन गया बैरी सुखद अनुराग है!
जल रही अविरल विरह की आग है!
सजन-पथ सूना पड़ा है।
क्लेश माथे पर चड़ा है।
नयन भी पथरा गए हैं,
लग रहा हर क्षण बड़ा है।
देह को डसता प्रतीक्षा-नाग है!
जल रही अविरल विरह की आग है!
कहीं आहट है न दस्तक।
पत्र भी आया न अब तक।
मानता है मन नहीं कुछ,
राह देखें नयन कब तक।
भ्रमित क्यों करता निरन्तर काग है!
जल रही अविरल विरह की आग है!
निकेतन,छत,डगर,परिसर।
जी नहीं लगता कहीं पर।
पर्व या त्यौहार कोई,
रुलाते हैं दुखद बनकर।
उदासी है सतत फीका फाग है!
जल रही अविरल विरह की आग है!
तन नहीं श्रृंगार करता।
मन हमेशा आह भरता।
ढंग कोई भी जगत का,
वेदना को नहीं हरता।
कर चुका मनवा सभी सुख त्याग है!
जल रही अविरल विरह की आग है!
परिचय - रशीद अहमद शेख 'रशीद'
साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’
जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१
जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म...












