क्षणिक अंधेरा
मालती खलतकर
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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अंधेरों से डर लगता है
उजाले कोसों दूर है
कदम दर कदम बढ़ते हैं
मगर मंजिल अभी दूर है
गुफाओं के अंधेरे
कंदराओं के अंधेरे
अतीत के महलों के अंधेरे
हर कदम पर अंधेरे हैं घेरे
चलती हूं इसी आशा में
कभी तो मंजिल मिलेगी
उजाले की उम्मीद में
सूरज की रोशनी मिलेगी
छट जाएंगे जीवन से
अंधेरे फिर नई सुबह होगी
कहता है दिल मेरा
मत डर इन अंधेरों से
क्षण भर में मिट जावेगे
अपनी रख बुलंद हौसले
परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ीआप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवा...

























