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पद्य

ओस
कविता

ओस

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** मोती जैसी ओस यह, गिरती देखो पात। दृश्य सुहाना यह लगे, जैसे हो बरसात।। मोहक लगती शीत में, पल्लव गिरती नित्य। मोती की माला बनी, चमके बन आदित्य।। ओस गुणों की खान है, एक बहुत है खास। लाख टके की है दवा, गिरती है जब घास।। सुखदायी यह शीत है, खूब करें हम काम। अमृत बनती ओस है, और नहीं है दाम।। रहे दुबकती पर्ण पर, जैसे हो बैचैन। चमक रही हर हाल में, खोजें उसको नैन।। टपक रही हर पर्ण पर, करती उनसे बात। अनुपम लगती है बड़ी, कहें प्रकृति सौगात।। न्यौछावर जीवन करें, पत्तों की है मीत। नवजीवन की आस है, गाती प्रिय के गीत।। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ....
शक्तिशाली करवा चौथ व्रत
कविता

शक्तिशाली करवा चौथ व्रत

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कितना पावन कितना प्यारा करवा चौथ का पावन यह पर्व ब्रत करने में सुहागिन, हो आती लालायित भर आता हर्ष उल्लास सुहागिनों में असीम ऊर्जा बढ़ाता खुशियों से भर देता करवा चौथ का पावन यह पर्व निभाती है विवाहित महिलाएं बड़े चाव से करती चौथ का व्रत दिनभरभूखे प्यासे रहकर रात चंद्रमा देख देती अर्ध्य सुख समृद्धि कुशल खुशहाल में सुहागिने हाथों में लगाती मेहंदी माथे पर ओढ़ चुनरिया लगाती लाल लाल माथे पर बिंदी करती प्रण करती ब्रत कहती है चंदा नियमधर्म से पावन प्यारा करवा चौथ का करेंगी पावन व्रत परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को ख...
हे चाँद तेरे दीदार का इंतज़ार
कविता

हे चाँद तेरे दीदार का इंतज़ार

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** सुबह से भूखी प्यासी, चेहरे पर शिकन नहीं। बस तुम्हारा इंतजार। प्रिये नाम की मेहंदी रचाकर, बस अब तेरा इंतजार। ये व्रत भूख का नहीं, समर्पण का त्यौहार। जो सात फेरे लिये थे, उसी विश्वास,का त्यौहार। सुबह से सजी, अब तुम्हारे दीदार का इंतज़ार। आज के चाँद में तो बस, तुम दूजे नूरों का इंतजार। चलनी में पहले चांद को, दिया के ओट से देखूं। फिर उसी छलनी में, अपने नूर को देखूं। अपने व्रत का पुण्य, तुम्हीं पर वार देती। पारांयण कर समर्पित हो जाती। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्...
खामोशी पढ़ लेता है
कविता

खामोशी पढ़ लेता है

डॉ. विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** चादर से बाहर पैर जाहिर चलन अब खास हो गया, मगर सटीक ज्ञानवान बोली मितभाषी गढ़ लेता है। शिखर पहुंचने के निज तरीकों में सभी होते माहिर, बचपन से पचपन सफर तक प्रियभाषी बढ़ लेता है। चुनौती संघर्ष मेहनत औजार से सुंदर बुत बना लिए, बेहतर मनुज बनने खुद में ही नक्काशी मढ़ लेता है। कथन श्रवण दर्शन सतत रवायत बने बैठे सबूतों के, नेपथ्य इंसा गुमान देखिये जो खामोशी पढ़ लेता है। होशोहवास में अच्छे बुरे काम का अंजाम है जिंदगी, अनमोल किरदार वो जब छाई बेहोशी लड़ लेता है। कामयाबी का पद पदक पदवी देखता है सारा जहां, बेहद सुखद मंजर जब महज शाबासी चढ़ लेता है। चुनाव में हर चेहरा मोहरा भी खास अहमियत रखे, बदमाशी ऐयाशी फितरत संग प्रत्याशी लड़ लेता है। परिचय :- डॉ. विजय कुमार गुप्ता "मुन्ना" जन्म : १२ मई १९५६ निवासी : दुर्ग छत्...
नवदुर्गा देवी
आंचलिक बोली, कविता

नवदुर्गा देवी

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मँय तोर बेटा अँव दाई, तँय ह मोर महतारी ओ। तोला सुमरत आवत हँव, मँय ह तोर दुवारी ओ।। थारी म धरे हँव तोर बर, नरियर, फूल अउ चुनरी। महमहई उदबाती बारके, उतारत हँव तोर आरती।। मोर दुख ल हरले माता, मोर बिगड़े काम बना दे। अरजी, बिनती करत हँव, जिनगी म खुशी ला दे।। घंटी बजाके तोला जगाहूँ, ए दरी कर दे उपकार। सबके सुनथच, मोर गरीब के सुन ले माता पुकार।। घर म सुख अउ शांति लादे, समृद्धि के भर दे भंडार। नौ दिन ले सेवा करत हँव, तोर महिमा हे अपरंपार।। तोर मंदिर मेर किंदरत हवँव, जपत-जपत तोर नांव। जनम देवइया तहीं माता, तोला छोड़के कहाँ जांव।। हे! शैलपुत्री, ब्रह्मचारिणी, चंद्रघंटा, कूष्मांडा माता। चेतना, ज्ञान, साहस अउ शक्ति ले हवय तोर नाता।। हे! स्कंदमाता, कात्यायनी, कालरात्रि, महागौरी देवी। करुणा, विजय, ...
पीपल की छाँव
कविता

पीपल की छाँव

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** चुनाव के चक्कर में कहीं बदल मत जाना, मित्र। झंडे बदलेंगे, नारे बदलेंगे, चेहरों पर लगे रंग हर पाँच साल में फिर बदलेंगे। आज जो अपना है, कल किसी और के साथ खड़ा मिलेगा, आज जो हाथ मिला रहा है, कल वही हाथ किसी नए निशान पर मुहर लगवाएगा। मगर तुम मत बदलना। याद रखना चुनाव तो पाँच साल बाद फिर लौट आएँगे, उम्मीदों की गठरी लेकर, वादों की नई पोटली लेकर। पर हमारी दोस्ती किसी घोषणा-पत्र की मोहताज नहीं। हम फिर लौटेंगे उसी गाँव की पगडंडी पर, जहाँ धूल आज भी हमारे बचपन के पदचिह्न सँभाले बैठी है। उसी पीपल के पेड़ के नीचे एक पुरानी-सी छाँव होगी, और हम दोनों बिना किसी झंडे के, बिना किसी नारे के, सिर्फ़ अपनेपन की बात करेंगे। वहाँ कोई हार-जीत नहीं होगी, कोई पक्ष-विपक्ष नहीं होगा ...
नदी फिर से बहना
कविता

नदी फिर से बहना

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** कलम बोलती कागज से, आओ मन की कह दूं। झूठे जग के चलचित्रों में, सत् के रंग बतला दूं। सूख गया रिश्तों का सागर, संबंधो में थार मरूस्थल। स्वार्थ के वशीभूत जगत है, बहरूपिया सा अंतस्थल। ज़र जोरू जमीन खास है, रत्तीभर स्नेह कहां सहोदर में। शुष्क लुप्त है आत्मियता, रिसती दरार गहरी आंगन में। बोल चाल बंद अपनों से, कुंठित गैरों से भ्रमित हुए। दूध में तलवार चलती, संस्कार सब धूमिल हुए। वात्सल्य शल्य से ग्रसित, रोये अपनापन संन्यास लिए। मात-पिता में अनबन बडी, बच्चें पढ़ने को वनवास लिए। पति पत्नी के गठबंधन में, निरस गाँठों की भरमार घनी। अलगाव विखंडित मोहब्बत, झूठी शान जिए प्रणय के धनी। कब समरसता को सीखेंगे, अपनेपन में कटे कटे से रहना। यूं विस्तापित जग जीवन में, ममता की नदी फिर से बहना। परिचय :- डॉ...
सबसे ऊपर संविधान
कविता

सबसे ऊपर संविधान

बाल कृष्ण मिश्रा रोहिणी (दिल्ली) ******************** हाथ में तिरंगा, दिल में वतन, कर देंगे गद्दारों को दफन। तिरंगा हाथ में, आग दिल में है, भारत का हर युवा अब महफिल में है। गद्दारी का अब एक ही अंजाम होगा, हर जवाब अब संविधान से होगा। जाग गया अब देश का युवा, सिस्टम का होने वाला है 'धुआँ-धुआँ'! जो देश बेच कर भाषण देते, वो ही हर दिन देशभक्ति के नारे देते! कुर्सी के आगे झुकता ईमान- जनता पूछे, “कहाँ है संविधान?” सवाल उठे तो डरना कैसा, लोकतंत्र है- कलम उठेगी, वोट बोलेगा, सच का सूरज फिर से डोलेगा। जागा युवा, जागा हिंदुस्तान, गूँजे फिर से संविधान! जनता जागी, बदला मिज़ाज, अब सवालों का होगा राज। युवा कहे- हम साथ चलेंगे, झूठ के आगे नहीं झुकेंगे। तिरंगा ऊँचा, ऊँचा सम्मान, दिल में भारत, हाथ में संविधान! नफ़रत हारें, प्रेम जगे, भारत के हर कोने में दी...
प्रिय शीतल लोचन कर दो
कविता

प्रिय शीतल लोचन कर दो

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** प्रीति तुम्हारी से आकुल यह, हर्षित मेरा मन कर दो। झुलस रहीं हूँ प्रेम-अगन में, व्यग्र हृदय चंदन कर दो।। प्रेम पयोधर घट सुधियों के, सुधा कलश छलकाओ। अपनी कस्तूरी सौरभ से, यह जीवन महकाओ।। तोड़ो सब तटबंध प्रीति के प्रियतम सम्मोहन कर दो। बहे प्रीति मकरंद हृदय में, मन से तुम उसे निहारो। बदन लाज से सकुचाता है, नेह हमारा स्वीकारो।। आकर बाँच प्रेम की पाती, प्रिय शीतल लोचन कर दो। लगा टकटकी पंथ तुम्हारा, कब से मैं खड़ी निहारूँ। मधुर मिलन हो तुमसे तब ही, व्याकुल-सी देह सँवारूँ। जन्म-जन्म तक रहे याद वह, गठबंधन पावन कर दो। ढाई आखर प्रेम पढ़ी हूँ, जपूँ प्रेम की ही माला। प्राण डालते प्रस्तर में तुम, वैसा जादू कर डाला।। प्रिय तुम संजीवन बूँटी बन, रुचिकर फिर जीवन कर दो। परिचय : मीन...
कहे मित्र यमराज
कुण्डलियाँ, छंद

कहे मित्र यमराज

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** कुण्डलिनी छंद माया में हर जन फँसा, बना हुआ है हीन। ठगनी उसको ठग रही, और संग में दीन।। और संग में दीन, कौन लगता ठुकराया। कहे मित्र यमराज, यही तो बंधन माया।।३१ लालच में इसके फँसे, हो पाते कब दूर। ज्ञान, ध्यान, विज्ञान, सब होते मजबूर।। सब होते मजबूर, द्वंद्व का भारी कच-कच। माया के आधीन, स्वार्थ का होता लालच।।३२ जानें कब हम हो गये, माया के आधीन। और आज अब हम सभी, बनकर घूमें दीन।। बनकर घूमें दीन, आज हम खुद ही मानें। आगे का अब हाल, हमारे ईश्वर जानें।।३३ मँहगाई की मार, रही रो जनता सारी। सोच रही दिन रात, नई आई बीमारी।। नई आई बीमारी, व्यर्थ कहना दुखदाई। कहें मित्र यमराज, नया रिश्ता मँहगाई।।३४ मँहगाई का दौर है, बिकता नहीं अनाज। हुई किसानी आजकल, बनी कोढ़ में खाज।। बनी कोढ़ में खाज, व्यर्थ सब लगता भाई। ...
गोवर्धन पूजा
कविता

गोवर्धन पूजा

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** हे गोवर्धन गिरधारी, तेरी लीला जगत में न्यारी, संकट की घड़ियां में विपदा, पल में मिटा दीनी सारी।।१।। दूर देश से चलकर आते यात्री, पूजा करते परिक्रमा लगाते गोवर्धन में श्रद्धाभक्तिभाव से कर पूजा आराधना, खो जाते।।२।। गोवर्धन गिरिराज जी में छोटी-बड़ी सात कोस की परिक्रमा गोवर्धन पावन भूमि में पैदल चलकर, सगुनपाते यात्रीघना।।३।। भक्तिआंनद का लगाकर गोता, गोवर्धन में भरता कोना कोना जयकारा गिरिराज के नाम का, तयपल में होता मिनटों में कोना।।४।। जपते नाम गोवर्धन गिरिराज का, मार्ग में करते मंदिरदर्शन रटते रटते नाम गोवर्धन गिरधारी का, मस्त रहते औऱ मगन।।५।। गोबर के गोवर्धन में होता है कितना अदुभुत महत्व श्रद्धालु अन्तर्मन से दीप धूप फल भेंट कर समझते तत्व।।६।। लगाते लाखों की तादाद में पूर्णिमा प...
कलयुगी रावण
कविता

कलयुगी रावण

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** हम क्यों मारे उस रावण को? कलयुग में रावण कम तो ना है, बस एक भूल के कारण ही युग-युग से मारते रावण है। कलयुग में अत्याचार कम तो ना है हम देख रहे हर गली मोहल्ले में, रावण ने तो सीता का हरण किया पर छुआ नहीं उस सीता को। अब तो रावण कलयुग के रेप बलात्कार अपहरण मर्डर जैसे घोर पाप वह करते हैं, फिर भी उन रावण को क्यों छोड़ भला, हम उस रावण को मरते हैं। वह वीर पराक्रमी धर्मनिष्टर वेदों का ज्ञाता संगीतज्ञ वह ज्ञानी ध्यानी शिव भक्त, फिर क्यों मारे उस रावण को, जो देशद्रोही जो आतंकी जो कपटी जो छलिया भी तो है। जो सज्जनों पर अत्याचार करे जो संतों का अपमान करे जो शोषण अत्याचार करे जो संतों का अपमान करे इस रावण को क्यों ना मारे हम उन दुष्टो का पृथ्वी से भार उतारे हम। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति ...
जय-जय मैया सिद्धिदात्री
कविता

जय-जय मैया सिद्धिदात्री

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खुशियां लाई है मैया नवरात्रि की आज नवमी पूजा सिद्धिदात्री की।। अलौकिक शक्ति दायिनी है माता मैया दिव्य शक्ति क्षमता की दाता।। पद्मासना मैया है चतुर्भुजाधारी हस्ते कमल शंख चक्र गदा धारी।। दे अणिमा, महिमा, गरिमा, लघिमा ईश्वत्व, वशित्व, प्रकाम्य और प्राप्ति।। शिव ने पूजन कर प्राप्त की थी सिद्धि उनका शरीर हुआ अर्धनारीश्वर शक्ति।। आशीष से आठ सिद्धियों की प्राप्ति ईर्ष्या, द्वेष, आलस्य, करुणा से मुक्ति।। सिंह की सवारी कर मां उठा ले कटार अत्याचारी, दुराचारियों का बहिष्कार।। मस्तक लगाते अक्षत कुंकुम अर्चन, जय-जय सिद्धिदात्री मैया करते नमन।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शिक्षा - एम.ए. हिन्दी समाज शास्त्र बी.एड. जन्म स्थान - शिकोहाबाद (आगरा) निवासी - इंदौर (मध्य प्रदेश) व्यवसाय - स...
इन्सान हूं …
कविता

इन्सान हूं …

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ऐ खुदा रहम करना रहम करना खुदा मै सबके लिए दुआ मांगती हूं आबोहवा मे फैले जहर को रुखसत करने की तहजीब मागंती हूं। साथ तेरा चाहिऐ हजार हाथो से दुआ लुटा दे ता जिन्दगी तेरा ऐहसान मानूंगी हताश है इन्सान जिन्दगी के सफर मे महफुज नही इन्सान जिन्दगी के सफर मे। धौकनी सी चलती सासों पर पहरा लग गया तेरी दुआ के भरोसे भीख मांगती हूं इन्सा हूं, इन्सा के लिए दुआ मांगती हूं। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंद...
वह सितारा कहाँ चला गया
कविता

वह सितारा कहाँ चला गया

चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) ******************** लाखों दिलों की धड़कनें थम-सी गईं, वह सितारा कहाँ चला गया। आँखें नम हो गईं, वह आवाज़ कहाँ खो गई, वह सितारा कहाँ चला गया। ज़मीं रो रही है, आसमाँ रो रहा है, आज मौसम का रुख भी बदला-सा है, चारों ओर उदासी छाई हुई है, वह सितारा कहाँ चला गया। कैसे दें हम उसे विदाई, जाते-जाते सबको रुला गया। वह सितारा कहाँ चला गया। परिचय :- चेतना सिंह प्रकाश "चितेरी" निवासी : प्रयागराज (उत्तर प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindir...
सबका मालिक एक- रोला
रोला

सबका मालिक एक- रोला

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** (१) सबका मालिक एक, एक ही सबका दाता। करे पूर्ण अरमान, दयामय भाग्य विधाता। दे सुख का वरदान, सभी उसके गुण गाओ। वह तो है अभिराम, चरण में शीश नवाओ।। (२) सबका मालिक एक, एक ही सबका दाता। जग में कैसा कौन, जानता वह है ज्ञाता। बाँटे वह नित हर्ष, सदा देता उजियारा। उसको करो प्रणाम, पाप उससे है हारा।। (३) सबका मालिक एक, एक ही सबका दाता। उसका बेड़ा पार, रोज़ जो उसको ध्याता। दिल है उसका नर्म, सभी का पालनहारा। जो भी है लाचार, साथ रह बने सहारा।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां ...
माता शेरावाली
भजन

माता शेरावाली

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** माता शेरावाली हे माता शेरावाली हमें दो वरदान गाते रहे हम तेरा गुणगान तुम्हीं अम्बा, जगदंबा, जग जननी तेरे चरणों में रहे सदा मेरा ध्यान माता… तुम्हारे अनेकों है रुप माता सभी है ममता के स्वरूप सब रूपो में समाहित है इस जगत का कल्याण माता। हे माता … करें तुमको नमन, चढ़ाये श्रद्धा सुमन तेरी भक्ति में रमा रहे मेरा ये मन जीवन में आए ना कभी कोई व्यवधान कर दो हमें माता ऐसी सिद्धि प्रदान हे माता … तुम हो ज्योति किरण, भरती ख़ुशियों से मन सब के जीवन की करती हो राहें आसान तुम हो शक्ति का रुप माँ करो हम पर कृपा दे दो अभय का हमें दान माता हे माता … परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आपकी बचपन में व...
मन का मनका
कविता

मन का मनका

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कभी भूत कभी भविष्य में, मन का मनका फेरे लगाता। बीते समय में महती भूमिका निभाई है, आज कुछ समय ने, और कुछ शरीर ने रोक लगाई है। अब यह जर्जर ही इमारत है। इसका संचालन करना कठिन है। विश्वास भोजन है, निश्चिंतता जल है। निश्छल प्रेम औषधि है, इसी से इमारत खड़ी रह सकती है। इस बात को जो समझ पाया है। उसी ने इसकी पुरानी, ईंटों के अनुभव का लाभ उठाया है। जीवन मंत्र जीने के बाद ही, जाना जाता है। किसी किताब में, इस यात्रा का वर्णन नहीं आता है। इस जर्जर इमारत में ही, वह एकमात्र, किताब रखी है। क्योंकि उन्होंने जीवन जीकर, अनुभवों की कलम से आंसुओ की स्याही से, कभी आनंद के पन्नों पर, इसे लिखकर संजो रखी है। किताब अनोखी है। कहती है, आज से भविष्य है, बीते को भूल कर ही, स्वर्णिम भविष्य की नींव सदैव रखी गई है। ...
बूढ़ी अम्माँ
कविता

बूढ़ी अम्माँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** सुघड़ता और संस्कारों की बुलन्द इमारत हैं बूढ़ी अम्मा, भोजन, पापड़ और अचार बनाती, बिना नाप जोख के अद्भुत स्वाद, दिलाती। जो घर के सारे काम, एक साथ करते हुए, सारे प्रबंधन को मात देती उनके हर काम में सुघड़ता दिखती! फिर भी नहीं कही गई कोई कहानी कोई किस्से उनके लिए, जिसने अपने हाथों के स्वाद से, अपने व्यवहार से, पीढ़ी-दर-पीढ़ी को तृप्त किया और सँवारा है ! बल्कि उन बूढ़ी होती काया पर आधुनिक न होने का प्रश्न चिन्ह लगाया है !! सभी को खुश रखना, सदा सबका आभार जताते रहने में सारी उम्र बिता दी ! समय ऐसा भी आया नहीं कोई और अम्मा, उन बूढ़ी अम्मा के पद चिन्हों को ग्रहण करना चाहती, नहीं आत्मसात करना चाहती उनके सद्गुण भरे आचरण को, क्यूँ की इनकी योग्यता की कोई डिग्री, कोई प्रमाणपत्र नही...
मंगल पांडे
कविता

मंगल पांडे

सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' बलिया (उत्तरप्रदेश) ******************** लेकर हाथों में तलवारें जब हम शत्रुओं पर ललकारे "त्राहि माम, त्राहि माम" शत्रु सारे पुकारे बागी बलिया जागा था घर द्वार सब त्यागा था जब धार्मिक भावनाओं को ठेस पहुंचा बैरकपुर से तब विद्रोह उठा जाग बलिया का वह शेर उठा मंगल पांडे ने २९ मार्च १८५७ को दिया नारा "मारो फिरंगी को" अंग्रेज अधिकारियों पर हमला बोल दिया साहस का द्वार वह खोल दिया वह वीर बागी बलिया वाला था वह वीर त्यागी बलिया वाला था वह विद्रोही तेवर वाला था धड़-धड़ गोली दाग दिया फिर तलवार से वार किया १८५७ का पहला बलिदानी था वह सच्चा हिंदुस्तानी तब से मेरा खून खौल रहा है "इन्कलाब जिंदाबाद" दिल बोल रहा है। परिचय :-  सत्येन्द्र कुमार सिंह 'सहज' निवासी : गुदरी सिंह के टोला, पांडे पुर, बैरिया, बलिया, (उत्तरप्रदेश) ...
मुसाफिर
कविता

मुसाफिर

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** अनजान राहों का हूँ मुसाफिर, मुझसे बेहतर कौन जानता। पड़ावों से गुजरा हूँ अब तलक, मंजिल का ठिकाना कौन जानता।। हर मोड़ पर इक कहानी छूटी, हर गाँव में इक नाम छूटा, जो साथ चले थे सफर में, उनका अफसाना कौन जानता। धूल सनी है पगडंडियाँ, और पाँवों में छाले हैं, इन राहों में कितना दर्द है, ये राही बेचारा कौन जानता। शाम ढले तो याद आते हैं, वो अपने छूटे मकान, परदेस में ये दिल अकेला, कितना तड़पा कौन जानता। लोग पूछते हैं कहाँ तक जाना, किस शहर में है ठिकाना, मैं हँस के कह देता हूँ यारों, अगला पड़ाव कौन जानता। थक कर जो बैठा हूँ जरा, तो लगता है घर पास है, फिर सुबह होते ही चल दूँ, ये दिल दिवाना कौन जानता। सफर ही मेरा घर है, और चलना ही मेरी पूजा, रुक जाऊँ तो मर जाऊँ, इस राज़ को सारा कौन जानता। इसीलिए चलता जा रहा हूँ, अ...
पुराने पन्नों से
कविता

पुराने पन्नों से

हंसराज गुप्ता जयपुर (राजस्थान) ******************** अनुप्रास तुम्हारे बैनन में है, सैनन से गहरा त्रास प्रिये. मधुमासों की जननी हो तुम, प्रिय वसंत की निर्झरिणी शांत हृदय की मंद रागिनी, भ्रांतमना सुरमयी तरुणी मिलन मिठास है प्रिय प्रवास, बिछुड़े मिलने की आस प्रिये, अनुप्रास तुम्हारे बैनन में, सैनन से गहरा त्रास प्रिये, बदन जलाती कड़ी धूप में, सुख उपजाती शीतल छाया सावन का आवन मनभावन, नीर तुम ही ने बरसाया जन्मों-जन्मों की आज मिटादो, अन्तर में गहरी प्यास प्रिये अनुप्रास तुम्हारे बैनन में, सैनन से गहरा त्रास प्रिये झलका मधुमय धवल चन्द्र, शारद निर्मल आह्वान प्रिये चुनने दो हंसा को मोती, रख लो मानस का मान प्रिये मधुर मधु मधुकर अवलम्बन, नित ज्योति का उत्थान प्रिये धवल खीर है नवल चांदनी, हो जाये अमृतपान प्रिये बनकर खिलता सुर्ख गुलाब, पूरो अन्तिम अभिलाष प्रिये अनुप...
जीत का परचम फहराना है
कविता

जीत का परचम फहराना है

अनुराग बघेल लोरमी, मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** मंजिल चढूँ तो चढूँ कैसे?, मन में यह सवाल है। रास्ता कठिन है लेकिन, हौसला बेमिसाल है।। कदम-कदम पर काँटे बिखरे, रुकना कब स्वीकार है? राह अंधेरी, दूर किनारा, मुझमें हिम्मत अपार है।। चट्टानें भी झुक जाएँगी, जब हिम्मत की हुंकार होगी। तूफ़ान भी रास्ता बदलेगा, जब हौसलों की बौछार होगी।। माना कि यह चढ़ाई दुर्गम, साँसें भी अब फूल रहे हैं। रुक गए जो, वो मिट गए, चले जो, वो अंबर छू रहे हैं।। जितने छाले पैरों में होंगे मेरे, उतनी सुंदर जीत होगी। काली रात के ढलते ही फिर, भोर की नई शुरुआत होगी।। मेरे पैरों के छाले गवाह हैं, मैं थककर हारने वाला नहीं। मंजिल के शिखर को छुए बिना, मैं पीछे हटने वाला नहीं।। तपती भूमि, धधकती ज्वाला, राहों में मेरे अंगारे हैं। लेकिन टूटने न दूँगा सपने, जो आँखों ने सँवारे हैं।। ...
स्मित मच्छार को नमन
कविता

स्मित मच्छार को नमन

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भारतीय पॉयलट ने सारे, यात्रियों की है जान बछाया। पूरा देश नमन करता है, उसने देश का मान बढ़ाया। हनुमत से प्रार्थना यही है, उसपर निज कृपा बरसा दो। घायल उसको किया दुष्ट ने, तुम उसको संजीवनी पिलादो। ऐसे वीर चोट खाकर भी, औरों की रक्षा करते है। नश्वर तन सबका छूटता है, ऐसे नाम अमर रहते है। परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को खोलकर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98...
संवैधानिक हुंकार
कविता

संवैधानिक हुंकार

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** संवैधानिक चाबुक को पीठ पर उनके इस तरह से फिराओ, तड़ित बिजली से कम झटका न लगे ऐसा महसूस कराओ, आये दिन करते रहते हैं बरसाती मेंढकों की तरह टर्र टर्र सूख जाए उनके आस का दरिया त्वरित उनको भान कराओ, यह देश नहीं किसी की बपौती है, हर वंचित के हक की यहां चुनौती है, जो दबाना चाहते हैं सदियों की आवाज़ को, अब बदलना होगा उस दकियानूसी समाज को, आरक्षण कोई भीख नहीं, हमारा अधिकार है, समानता की नींव पर टिका यह संसार है, जो ताक में बैठे हैं समता का गला घोंटने को, जो आतुर हैं बाबासाहेब के सपनों को रौंदने को, उन्हें बता दो कि अब युग बदल चुका है, चेतना का शंखनाद चारों ओर बज चुका है, अब चुप बैठना गुमराह होने जैसा होगा, हक के लिए न लड़ना गुनाह होने जैसा होगा, उठो और अपनी कलम को हथियार बनाओ, संविधान ...