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पद्य

मातृभूमि को नमन हमारा
भजन

मातृभूमि को नमन हमारा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** भारत मां से पंचतत्व ले, ईश्वर ने है हमें बनाया। इसीलिए भारत माता है, सब संतों ने यही बताया। भारत मां ... मां की सेवा रक्षा करना, सर्वोपरि कर्तव्य हमारा। भारत भूमि ने ही अबतक, सात्विक पोषण किया हमारा। जो दायित्व दिया ईश्वर ने, उसने ही है पूर्ण कराया। भारत मां ... जो अर्पित सीमा रक्षा को, उनको प्रतिपल नमन हमारा। उनको भी नमन कि जिन्होंने, राष्ट्र पे अपना सबकुछ वारा। जो विकास का लक्ष्य ले चले, अखिल विश्व में मान बढ़ाया। भारत मां ... जो भी जहां दे रहा सेवा, सर्वोतम का लक्ष्य बना ले। सबकुछ दिया मातृभूमि ने, निष्ठा से वो कर्ज चुका ले। जो निष्काम लगा सेवा में, उसने सबका प्यार है पाया। भारत मां ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेर...
पशुपतिनाथ
कविता

पशुपतिनाथ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** अद्भुत सौंदर्य उतरा था धरा पर एक रात हमने देखा, जहाँ मौन था किंतु शब्द बोल रहे थे, प्रकृति की सुन्दरता भिन्न-भिन्न रूप रंग में अपनी छटा बिखेर रही थी , तारे भी इस मनमोहक छवि को निहार रहे थे, शांत निस्सीम क्लांत रात गौशाला की रात थी !! तभी एक शब्द कानो में पड़ा गौ माता पुकार रही थीं, कह रही थीं सो जाओ बहुत रात हो चुकी है , उनकी आवाज सुन बत्तखों ने गान शुरू कर दिया , बाकी पक्षी भी सुर ताल में गीत गुनगुनाने लगे ! कुछ जीव सूकून की नींद सो रहे थे कुछ विचरण कर रहे थे, मंद-मंद मलय उनको सहला रही थी ! अचानक सूकून की तंत्रा भंग हुई, कोई जीव करूण गुहार लगा रहा था, वो दर्द में था उसके साथ बहुत से जीव जो असहाय थे नेत्रहीन थे, जो हड्डी हड्डी हो चुके थे वो भी जाग रहे थे ! उनकी तकलीफें...
जपें राम या श्याम
भजन

जपें राम या श्याम

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** होती है भक्ति, होती है पूजा, आते वहीं श्रीराम। होती है पीड़ा,होती है करुणा, आते वहीं श्याम। होती ... शक्ति का दुरुपयोग ना होता, होते नहीं नराधम। युग युग में अवतार लेकर, आते ना धरा पर राम। होती ... सक्षम होकर अन्याय देखते, लगाते नहीं लगाम। चुप रहने पर देखना पड़ता हैं इसका दुष्परिणाम। होती ... अधर्मियों से ही होता है, पाप कर्मों का आयाम। मानवता की राह दिखाने, इस धरती पे आते राम। होती ... जीवन जीना कला है चाहे, शांति हो या संग्राम। कर्म सबके उत्तरदायी, इस धरा पर ही परिणाम। होती ... मानव तन का इस श्रृष्टि मे, सब से उच्च मुकाम। राजा हो या फिर रंक सभी के, पालक है श्री राम। होती ... एक ही माया,एक ही है काया, सुंदर दोनों नाम। चाहे पुकारें राधा कृष्ण, चाहे पुकारों सीताराम। होती ... परिचय :- ...
सच कहना है अब बुरा
दोहा

सच कहना है अब बुरा

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) सच कहना है अब बुरा, कहे यहाॅं सच कौन। सच के दुश्मन हैं सभी, अच्छा है जो मौन।। भूल गया है मौत को, लालच से मजबूर। तन्हा जाना क़ब्र में, फिर भी करे ग़ुरुर।। मेरी क्या पहचान है, ढूॅंड रहा मैं कौन। दिखता जो वो मैं नहीं, अंदर कुछ है मौन।। फ़ितरत है इंसान की, सबके अलग विचार। कुछ तो सच को सच कहें, कुछ करते इनकार जीते जी का साथ है, मरने पर है भार। चले सभी इस पार तक, चले नहीं उस पार।। साक़ी ऐसी मत पीला, चढ़कर उतरे यार। एक बार ऐसी पिला, भव-सागर हो पार।। कुछ दिन का बस खेल है, मौत हॅंसे इक ओर। बचना मुश्किल मौत से, लाख लगा ले जोर।। कीड़े खाऍं क़ब्र में, जब तक रहे शरीर। सोच वहाॅं तकलीफ़ में, कैसी होगी पीर।। जिसके दिल में प्यार है, सही वही इंसान। पत्थर दिल कुछ नफ़रती, घूम र...
लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है
कविता

लम्हा-लम्हा चुराना पड़ता है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** जीवन कोई आसान सफर नहीं, काँटों पर चलकर मंजिलों को छूना पड़ता है। गिरते हैं, संभलते हैं, फिर बढ़कर, मेहनत से तकदीर बनती है। उम्मीद का दिया कभी बिना बुझे, अँधेरे में भी रौशनी बनकर, खुद चमकना पड़ता है। समय कभी साथ दे, कभी परीक्षा ले, किस्मत साथ ना दे। शिद्दत से जो जुड़कर, कभी न हारा, हर लम्हा एक लड़ाई है, हर साँस एक कहानी है। जो समय चुराकर मेहनत कर ले, उसी के नाम तारीखें और जवानी है। मंजिल पूछती है मेहनत का हिसाब, और सपने माँगते हैं वक्त की कुर्बानी। जो आज पसीना बहा दे मेहनत में, कल दुनिया उसी की जुबानी को गले लगाता है। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचन...
यमराज का ग़ुस्सा
कविता

यमराज का ग़ुस्सा

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** पहली वारिश और ये हाल हर ओर सुनाई पड़ रहा त्राहि माम बेचारा यमराज है परेशान लोग उसे बेवजह कर रहे बदनाम। सुनकर उसे भी गुस्सा आया जोर से भन्नाया-इज्जत का फालूदा बनाया। कहने लगा- ये सब विकास की माया है कमीशन जमकर खाया गया है। पेड़ों की अंधाधुंध कटाई नदी, नाले, तालाबों पर अतिक्रमण अनियोजित शहरीकरण, गाँवों से पलायन आधुनिकता की आँधी और नित नव सुविधाओं का लोभ बढ़ता प्रदूषण, बिगड़ता मौसम चक्र ऊपर से स्वार्थ, लोभ की विकृति मानसिकता मरती संवेदनाएं, जहरीली होती भाव-भंगिमाएं यही है आज का मानव समाज। बदले में रोता है, खूब खोता है, जो बोता है, वही तो काटता है फिर भी जमकर अफसोस करता और घड़ियाली आँसू बहाता है, मगर खुद को बदलने का विचार भूलकर भी मन में नहीं लाता है, बस! दोष पर दोष सिर्फ औरों को ...
भीड़ का आदमी
कविता

भीड़ का आदमी

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** सबके साथ चलता हुआ आदमी धीरे-धीरे अपने साथ चलना भूल गया। वह हर बात पर सहमति में सिर हिलाता रहा, यह जाने बिना कि एक दिन उसका अपना सिर उसकी अपनी बात के लिए बचा ही नहीं। अब वह भीड़ में है, सुरक्षित भी, स्वीकार भी। बस, आदमी नहीं रहा। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा, पर्याव...
मन की मुराद
कविता

मन की मुराद

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार...
मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की
भजन

मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की, मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी। प्रेम को रंग, प्रीत की पाती, भक्ति गुलाल लगाओ नर नारी। हो... मै तो मन मंदिर को सजाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। ज्ञान शलाका अंजन भर-भर, डाल रहे गुरु, मिटा तिमिर सब। हो... मैं तो ज्ञान के दीप जलाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। काम, क्रोध, मद, लोभ लुटेरे, ये विवेक मानव का हर ले। हो... मै तो ज्ञान के तीर चलाऊंगी।। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। गुरु ही जग में "आशा" बंधावै, आत्मानंद का बोध करावै। हो... मैं तो "गुरु चरण कमल बलि जाऊंगी। सखी री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। मैंने ओढ़ी चदरिया हरि रंग की, मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। आली श्री मैं तो सतगुरु मिलन मनाऊंगी।। परि...
आज और कल
कविता

आज और कल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** चौपालों की दशा आज और कल का चौपाल बडा सा बरगद का पेड़ पेड़ के चारों ओर बना बडा सा चबुतरा प्रतिदिन आबाद रहता था। प्रातः काल में बचपन खेलें दोपहरी में महतारी बतियातीं सन्ध्या लगतीं बैठक वृद्धों की। खूब खेल होते बरगद के फूल और पत्तों से। बनती रोटियां बरगद की छाया में ले हाथ में रोटी का टुकडा थामे हाथ मां का आंचल चबाता हैं रोटी का टुकडा। चौपाल पर चढकर गोल-गोल चक्कर काटता है लाला पर, अब हां पर अब न चौपाल हैं न बरगद का पेड न पिपल की पिपरी न नीम की ठंडी छाया। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचन...
मंजिल की तलाश
मुक्तक

मंजिल की तलाश

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मंज़िलों की तरफ, बढ़ना है अब हमें। मुश्किलों से बहुत, लड़ना है अब हमें। कैसी भी हो परेशानी, कठिनाई अब, अपनी ज़िद पर शरद अड़ना है अब हमें।। मंज़िलों की तरफ कूच करना ही है। हर सफलता को अब नित्य वरना ही है। हौसला सँग में होगा, तो हारूँ नहीं, बनके जलधार हमको तो बहना ही है।। आयें व्यवधान तो भी अडिग मैं रहूँ। हर मुसीबत को मैं शौर्य से नित सहूँ। नित्य चेहरे पे मुस्कानें खेलें सदा, ले पराक्रम, सुसाहस, मैं मज़िल गहूँ।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशित रचनाएं व गतिविधियां : पांच हज़ार से अधिक फ...
जरा आगे बढ़कर तो देखो
कविता

जरा आगे बढ़कर तो देखो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परंपराओं से आगे ज़रा बढ़कर तो देखो, पुरातन झंझावातों से थोड़ा उबरकर तो देखो। बदल दो उस व्यवस्था को, जो रोकती हो आगे बढ़ जाने से, समय के साथ कदमताल मिलाने से। हर व्यवस्था समय के साथ बदलती है, हर युग अपनी नई मान्यताएँ गढ़ती है। यदि जकड़े रहोगे बीते हुए विचारों में, तो जड़ता किसी की भी चेतना को ही कुतरती है। पगडंडियों और बैलगाड़ियों से निकलकर, हम रेल और हवाई सफ़र तक आ गए। जिन्होंने समय की चाल पहचानी, वे दुनिया भर में अपनी पहचान बना गए। जब उड़ने को नए पंख निकल आते हैं, घिसी-पिटी राहें फिर कहाँ सुहाते हैं। जब व्यवस्था किसी योग्य को ठुकरा देती है, तभी एक नया विचार जन्म लेता है, और संभावनाओं का नया आकाश देता है। न्यूटन, डार्विन, आइंस्टीन आज भी इसलिए याद हैं, क्योंकि उनके विचा...
कौन यहाॅं है साथ
छंद, दोहा

कौन यहाॅं है साथ

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** (दोहा उर्दू छंद) इतना ग़ुरुर मत करो, कौन यहाॅं है साथ। सब मरने के बाद में, छूकर धोते हाथ।। जीवन तो इक वहम है, कर्मों का है खेल। सच तो है बस मौत ये, दुनिया है इक जेल।। कर्म सही तो सब सही, पटरी पर है रेल। बुरा भला कोई नहीं, क़ुदरत का सब खेल।। वैद्य डॉक्टर को यहाॅं, सब कहते भगवान। कुछ सौदागर लाश के, बेच रहे ईमान।। हिम्मत सब में है नहीं, सच कहने की बात। सच को सच कहता वही, जो सच पर दिन रात।। आज यहाॅं तो कल वहाॅं, जग में फिरे फ़क़ीर।। अच्छे दिन के आस में, नैनन बरसे नीर।। सच से फ़ुर्सत है नहीं, कैसे बोले झूठ। उसकी दुकान झूठ की, धन्था है मत रूठ।। फ़रियादी अब कर रहे, क़ातिल से फ़रियाद। बुज़दिल इतना मत बनो, सब कुछ हो बर्बाद।। राजा अच्छा है वही, कर जो करे मुआफ़। भेद-भाव भी मत करे, सही ...
ऐ बारिश …
कविता

ऐ बारिश …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ऐ बारिशों तुम इंसाँ न बनो यूँ मत करो कि जब ज़मीं की साँसें प्यास से थमने लगें दरिया के दीदे सूख जाएँ पेड़ों की हथेलियाँ दुआ में उठकर बिखर जाएँ तब तुम कहीं समंदर की छतों पर गीत गाती फिरो। और फिर एक रोज़ अचानक इस कदर टूटकर बरसो कि बस्तियाँ डूब जाएँ घरोंदे टूट जाएँ ख़्वाब छूट जाएँ, और इंसाँ तुम्हें इंसाँ होने की दुहाई दें। यह हुनर तो इंसानों का है ज़रूरत के वक़्त साथ न देना और जब ज़रूरत गुज़र जाए तो एहसानों की बारिश लेकर बरसते हुए लौट आना। तुमने देखा तो होगा रिश्तों को सूखी धरती सा तड़पते हुए, तेरी बूंदों सा बिखरते हुए एक हाथ, एक साथ की आस में रिश्तों के आसमाँ को तकते हुए। इंसाँ आए भी तो ऐसे जैसे सैलाब हो लिए सूखे में बारिश का ख़ाब हो लिए साथ कम देते हैं हिसाब ज...
उसूल भूल गए…?
कविता

उसूल भूल गए…?

संजय एम तराणेकर इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** सादगी की राहों पर जो चुपचाप बढ़ गया, ईमान का दीप बनकर अँधेरों से लड़ गया। जिनके महलों में भी "सेवा" का ही शोर है, इस हिसाब में हर सुविधा का कोई छोर है। कुर्सी मिली तो जनता का ही नाम भूल गए, भत्तों की 'फेहरिस्त' में सारे उसूल भूल गए। एक जनाब पैदल चलकर मिसाल लिख रहे, बाकी तो लाल बत्ती में भी सवाल लिख रहे। रिश्वत की धूल से जब 'आईना' धुंधला हुआ, सच का चेहरा देख के हर चेहरा मिला हुआ। यहाँ गांधी के नाम पे भाषण तो रोज़ हो गए, गांधी के रास्ते मगर आज भी कम से हो गए। परिचय :- संजय मुरलीधर तराणेकर एक स्वतंत्र कवि, लेखक व फ़िल्म समीक्षक हैं। आप साधारण परिवार में जन्मे मूलतः मध्य प्रदेश के इन्दौर के निवासी हैं। आपका सन १९९० के दशक से लेखन में मन रमने लगा और ‘पत्र संपादक के नाम‘ से अपनी लेखन यात्रा ...
समय
कविता

समय

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** समय का कारवां बढता गया मैं पिछे रह गई क्योंकि समय के पंख लगे थे और... और मैं, थी पंख विहिन। समय को साधा नहीं अवसर के सन्धान से काश... समय पंख कटा होता मैं पिछे मुडकर नहीं देखतीं। जग के झंझावातों मैं कब, कैसे समय हाथ से निकल गया मैं समझ नहीं पाई समय के बढ़ते कारवां के इशारों को। मैं समय को झेल न पाई कोई कह भी रहा था मुझे चल दो, कारवां के साथ। पर मैं पकड़ न पाई समय को झुककर प्रणाम करता समय मेरे पास से गुजर गया गुजरते समय के प्रणाम का मैं उत्तर न दे पाई। देखो... हां देखो वह आज मुझे अतीत बन चिढा रहा है और...मै... समय की सीमा पर हाथ मलती रह गई। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रच...
कतरा-कतरा सागर का
कविता

कतरा-कतरा सागर का

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कतरा-कतरा सागर बनता, बूँद-बूँद में शक्ति समाई, छोटे-छोटे शुभ प्रयासों से जीवन ने मंज़िल पाई। हर अनुभव एक मोती बनकर मन की माला में जुड़ जाता, संघर्षों की हर छोटी लहर साहस का दीपक बन जाता। प्रेम, दया, करुणा के कतरे जब मानव-हृदय में खिलते हैं, सूखी धरती जैसे सावन पाकर हरियाली से मिलते हैं। ज्ञान की हर छोटी किरण अज्ञान का तम हर लेती है, सत्कर्मों की हर बूँद मिलकर जीवन-गंगा भर देती है। आओ हम भी कतरा-कतरा मानवता का सागर भर जाएँ, अपने शुभ कर्मों की लहरों से जग में प्रेम-सुगंध फैलाएँ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथ...
अन्नदाता
छंद

अन्नदाता

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** (विष्णुपद छ्न्द) जीवनांत तक अवनी पर का, श्रेष्ठ अन्नदाता । कठिन परिश्रम करते सबके, हो जीवन दाता। लहराता यह खेत तुम्हारा, जीवन दर्पण है। फसल खुशी से जो समाज को, की येअर्पण है।। सहचर आठों पहर प्रकृति का, बनकर रहते हो। तुम आँधी तूफ़ान झेलकर, संकट हरते हो।। परहित जीवन मंत्र तुम्हारा, सुख बरसाते हो। ठंड-धूप बारिश को सहकर, अन्न उगाते हो।। माथे पर की धूल कृषक की, पावन चंदन सी। धूल-स्वेद से सनी महकती, काया कंचन-सी। निर्मल मन से‌ भक्ति-भाव है, ईश्वर को अर्पित। कर्म किया निस्वार्थ भाव का, करते आप समर्पित।। सुख का कर बलिदान किया जगती का पालन है। कर्म तुम्हारा संन्यासी से ,बढ़कर पावन है।। भूमिपुत्र का साधु-तपस्वी से उत्तम तप है। करते आठों पहर कर्म हैं, जो प्रभु का जप है।। जियो और जीने दो का है, संस्कार ...
थोथे सारे वादे निकले …
गीत

थोथे सारे वादे निकले …

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** थोथे सारे वादे निकले, सच्चाई के लाले। आँखों बँधी लोभ की पट्टी, होते नित घोटाले।। उबड़-खाबड़ सड़क कोसती, व्यस्त सभी चौराहे। डामरीकरण का नाटक बस, होता जब जी चाहे।। मन में क्षोभ हज़ारों लेकिन, ख़ुद ही दुश्मन पाले। टौल-टैक्स भारी ले-लेकर भरते रोज़ ख़ज़ाने। सड़क सुधरती कागज़ पर ही, काम सभी मनमाने।। सच्चाई पर मौन भीष्म बन, काम करें सब काले। दुर्घटनाएँ होतीं प्रतिदिन, रोतीं हैं माताएँ। थोड़े दिन आन्दोलन होते, चक्रव्यूह रचनाएँ।। अन्धी नगरी चौपट राजा, बुनता रहता जाले। औरँगज़ेबी आदेशों से, दिल पर चले कुल्हाड़ी। गहरी चोट कुशासन देता, उलट-पुलट हर गाड़ी।। बस नीलामी आदर्शों की करते टोपी वाले। परिचय : मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सु...
आत्म-मंथन
कविता

आत्म-मंथन

आरुषि कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मैं-मैं में नहीं, मुझसे हूँ। हिम्मत नहीं है मुझमें फिर भी कहूँगी। समझ नहीं है मुझमें फिर भी लिखूँगी। अक्सर लोग निकाल देते हैं मेरे विचार को दिमाग से क्योंकि मैं-मैं में नहीं मुझसे हूँ। चाहती तो हूँ दुनिया से दूर रहना फिर सोचती हूँ मैं ही क्यों? क्यों कोई और नहीं? बस ऐसी ही बेतुकी-भरी ख़्वाहिशों में उलझी रहती हूँ। फिर मायूस होकर, गुमसुम-सी, मैं ख़ुद को ही अपने में समेट लेती हूँ। परिचय :- आरुषि शिक्षा : १२वीं कक्षा की छात्रा राजकीय उत्कृष्ट वरिष्ठ माध्यमिक पाठशाला गाहलियां निवासी : कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। प्रिय मित्र, शुभचिंतक एवं परिवारजन आपको प्रेषित मेरी नई स्वरचित रचना, कृपया लिंक को ...
गुरुवर ऐ भगवान
दोहा

गुरुवर ऐ भगवान

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** तुमने दिया विवेक तो, हुआ सत्य का भान। करूँ शुक्रिया आपका, गुरुवर ऐ भगवान।। खिलता है जीवन तभी, जब गुरुवर हैं संग। करूँ शुक्रिया ज़िन्दगी, गुरु से जो नवरंग।। यदि गुरुवर हैं संग तो, मैं नित ही बलवान। करूँ शुक्रिया तात हे!, है जीना आसान।। नहीं ज्ञान बिन चेतना, जीवन जाता हार। प्रभुवर करता शुक्रिया, पाया मैं उजियार।। गुरु देते संस्कार नित, कर देते निर्माण। सदा शुक्रिया ज्ञान का, जिससे रक्षित प्राण।। हर दुर्गुण को दूर कर, गुरुवर लाते शान। करूँ शुक्रिया सूर्य का, मिलती जिससे आन।। गुरुवर का नित शुक्रिया, जिनका पावन काम। जिनको समझो शिष्य तुम, पूरे चारों धाम।। गुरुजी की महिमा बहुत, करो शुक्रिया खूब। जो देते हैं ज्ञान को, गहराई में डूब।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंड...
जन्मदिवस
कविता

जन्मदिवस

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** बढ़ता चला जा रहा हूँ के करीब, शनैः शनैः,अनवरत- आगे बढ़ने की प्रक्रिया जारी है सतत... दिन-ब-दिन कुछ खोते हुए, सबकी बधाइयाँ लेते हुए, काफी समय बाद जब देखता हूं पीछे मुड़कर, लगता है जैसे बचपन से बुढ़ापे में आ गया हूँ उड़कर। खेलकूद, शिक्षा, प्रेयसी, पत्नी, पुत्र और पुत्री- जीवन चलता रहा मानो एक ही सूत्र में बँधी कड़ी। मौके आए कई अच्छे पद के, पर आड़े आईं सीमाएँ मेरी औकात और सामाजिक स्थिति की- वही सरहदें जो हर कदम पर मुझे रोकती रहीं, तोड़ती रहीं। भरोसा दिलाने वाले अपने एक-एक कर मुकर गए, अपनी जिम्मेदारियों का बोझ मुझ पर छोड़कर उबर गए। फिर शुरू हुआ दौर संघर्ष का- चंद सिक्के कमाने का, और शिक्षा के विमर्श में खुद को बचाए रखने का। राहें गुज़रीं कठिन परिश्रम से, मैं दूर होता गया अप...
नदी किनारे
कविता

नदी किनारे

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कहीं कोई मिलता है बिछुड जाने के लिए क्यों हुक सी उठती है, फिर मिलने के लिए। तमाम शब खोया रहा खयाल में उसके जैसें चांद खो जाता है घटाओं में जैसें न जाने कब तक रोती रही आंखें बेदर्द हाल मेरा देख, दिवारे भी शिकवे करने लगी उसके कहीं कोई बीता लम्हा, बीता अरसा सावन बीता, भादौ बीता चंचल किरणों संग पुनम बीती अंधियारी बीती रिती रिती। हर कोई था यहां सबका अपना नदी किनारे मैं ही था, सिर्फ प्यासा, प्यासा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियो...
हक और शक
कविता

हक और शक

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** एक धोबी की आवाज़ पर बिना जाँच पड़ताल घर से निकाला माता सीता को मर्यादा पुरुषोत्तम राम ने न जाने कैसी ये मर्यादा थी राम की या फिर था पुरुषोचित मन का शक.... भरे दरबार में स्वयंबर की आड़ में परम ज्ञानी, अति बलशाली प्रतापी भीष्म ने तलवार की नोक पर अम्बे, अम्बिका और अम्बालिका तीनों को इच्छा के विरुद्ध उठा लिया.... शायद... मर्यादा की छाँव में रहा हो पुरुषोचित हक..... सभी परिवार प्रमुखों के समक्ष धर्मराज कहे जाने वाले युधिष्ठिर ने द्यूत क्रीड़ा में स्व भार्या द्रोपदी को बिना उसकी मर्जी जाने लगा दिया दाव पर मन कहाँ समझ पाया कि स्वांग था मर्यादा का या फिर पांडवों का पुरुषोचित हक..... कौरवों के राज दरबार में नीति कुशल विदुर द्रोणाचार्य, कृपाचार्य, भीष्म जैसे अजेय व्यक्तित्वों के साम...
मन का कुरुक्षेत्र
कविता

मन का कुरुक्षेत्र

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मन के भीतर रोज ही, छिड़ता नया संग्राम। अर्जुन-सा संशय खड़ा, कृष्ण बने सतनाम॥ लोभ-मोह की सेनियाँ, घेरे चारों धाम। विवेक धनुष जब तान दे, मिट जाए अंधियाम॥ क्रोध दुर्योधन बन गया, अहंकारी बलवान। प्रेम-सुदर्शन घूमकर, करे उसे निष्प्राण॥ ईर्ष्या की गांधारियाँ, बाँधे मन के नेत्र। सत्य सूर्य जब उग पड़े, जगमग हो कुरुक्षेत्र॥ कामनाओं के चक्र में, उलझे जीवन-तंतु। संयम बन अभिमन्यु जब, तोड़े सारे बंधु॥ धैर्य भीष्म-सा अटल हो, श्रद्धा बने कवच। विपदा कितनी भी बढ़े, न डिगे मन का रथ॥ सद्गुण पांडव बन खड़े, दुर्गुण कौरव जान। जीत उसी की अंत में, जो रखे धर्म विधानl मन का कुरुक्षेत्र है, जीवन का विस्तार। जो खुद को ही जीत ले, उसका हो उद्धार॥ परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध...