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पद्य

आदमी के भीतर
कविता

आदमी के भीतर

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** आदमी के भीतर एक और आदमी रहता है। वह बाज़ार नहीं जाता, न किसी पद की इच्छा करता है। वह बस चाहता है कि दुनिया थोड़ी कम कठोर हो। लेकिन समय की धूल उसके चेहरे पर जमती रहती है। और एक दिन बाहर वाला आदमी सफल हो जाता है, पर भीतर वाला चुपचाप मर जाता है। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा,...
उन्नति का दीप
कविता

उन्नति का दीप

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** उत्तरोत्तर उन्नति का दीप, संघर्षों से जलता है, प्रखर लेखनी का हर अक्षर, यश का पथ बनता है। काँटों वाली राहों में भी, जिसने हिम्मत थामी है, उसकी लेखनी ने जग में, अपनी छाप निभाई है। शब्दों में जब सत्य जगे, तब सम्मान स्वयं आता, संघर्षों की तपती धूप, यश का चंदन बन जाता। मेहनत की स्याही से जब, सपनों को आकार मिले, प्रखर विचारों की गाथा, हर मन को उपहार मिले। गिरकर फिर उठ जाना ही, उन्नति का आधार बना, लेखनी की दृढ़ता से ही, जीवन का विस्तार बना। यश की सीढ़ी चढ़ने को, धैर्य जरूरी होता है, संघर्षों का हर अनुभव, लेखन में मोती होता है। जिसने पीड़ा को शब्दों की, शक्ति बना कर गाया है, उसकी प्रखर लेखनी ने, जग में मान बढ़ाया है। उत्तरोत्तर उन्नति वहीं, जहाँ कर्म निरंतर हो, लेखनी में तेज वही, जिसमें संघर्ष समंदर हो ...
उद्गम कहाँ
कविता

उद्गम कहाँ

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उथदी का उद्गम कहाँ गिरि गवहर की गहराई कहाँ तक अथाह अन्तरिक्ष की अन्तर सीमा कहाँ कहाँ है गिरि पर खड़े वृक्ष श्रृंगों की सीमा कहाँ सरिता की जितनी गहराई कौन जाने। जल में अपने प्रतिबिम्ब को निहारते रवि, चन्द्र को कौन पकड़े विद्युत की कडकती आवाज को कैसे रोके झुला-झुलते पवन के वैग को कौन रोके। कपसिले बादल के टुकड़े के साथ चांद का छुपना निकलना कौन देखें ओस बिन्दु का चमकना वर्षा की रिमझिम फुहारों में भिगना कौन नहीं चाहता रात्री में टिमटिमाते जुगनुओं के समूहों और आकाश में चमकते तारे एक ह पीत वर्ण, एक रजत वर्ण धन्य है प्रकृति हमारी जो प्रतिदिन नित नये खेल खेलती है मानव खिलाडी है निरन्तर चलता रहता है इस जीवन के लिएं। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए...
सूरज ठंडा  हो जाता है
कविता

सूरज ठंडा हो जाता है

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बैसाख और ज्येष्ठ मास की तपन है। तन-मन झुलसे हुए, आकाश की ओर देख रहे हैं। पेड़-पौधों को, पशु-पक्षियों को, बादलों की प्रतीक्षा है। आषाढ़ मास आ गया है, बादलों ने आ आकर नर्तन किया है। कोई श्वेत, कोई मटमैले, कोई श्याम रंग में उमड़ रहे हैं। वायुमंडल में भी हलचल है, शीतल वायूके झोंको की राह सृष्टि तक रही है। सूर्य उदित है, पर प्रकाश धुंधला सा है, बादल गड़गड़ाहट के साथ संदेश दे रहे हैं। दामिनी ने चमक कर कहा, अब बरसों, तपन से सब झुलस रहा है। बूंद-बूंद गिरते-गिरते, मूसलधार बारिश होने लगी है। अब तो सृष्टि शीतलता से प्रसन्न हैं, क्यों कि सूरज भी जल से, मित्रता करके शीतल हो गया है। उदित भी है शीतल भी है, परंतु प्रसन्न भी है। शीतलता की आवश्यकता, सूरज को भी तो है, वहथक गया है। इसीलिए सूरज ठंडा हो गया है...
मोहब्बत
कविता

मोहब्बत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गम लाख छुपाए हमने है पर कमबख्त यह आंखें रह ना सकी। ओझल तो किया था हमने वो पर सामने आकर ठहर गए। क्या मन की बातें उनसे कहे कुछ शब्द नहीं थे होठों पर। क्या हम बोले क्या वह बोले बस निकल गए अपने पग पर। जब नहीं मिले बातें थी, मिलने पर भूल गए सारी बस प्यार के मीठे पल दो पल बन गए इश्क की यादें हैं। वह है नन्द का छोरा जो हमे दर्श दिखाकर चला गया। ओझल होगया वह अखियो से बस प्यार जताकर चला गया। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर...
उसे राजा बनाना होगा
कविता

उसे राजा बनाना होगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** गधे को गधा मत बोलो, वह भी प्यार का हकदार है, उसकी भी अपनी दुनिया, उसकी अपनी सरकार है। इज्जत अगर न दोगे तुम, इज्जत कहाँ से पाओगे, दिन-रात खटते रहोगे, और “गधा” कहलाओगे। गुस्से से भर जाओ तो, गुस्सा बाहर निकालो जी, मन फिर भी शांत न हो तो, गधों की परेड करा लो जी। राजनीति में आने का, सब गधों को अधिकार है, क्या जंगल, क्या ये समाज, सबको यह स्वीकार है। बंदर-भालू को मदारी, इशारों पर नचवाता है, लेकिन स्वाभिमानी गधे को, वह कभी नहीं झुकाता है। जंगल-भक्ति दिखलाने को, सब पशुओं को आना होगा, अगर चढ़ जाए भक्ति सिर पर, गधे को राजा बनाना होगा। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं...
समय का पन्ना
कविता

समय का पन्ना

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बुढ़ा बच्चा स्वभाव सरीखा अक्सर हम सुनते आए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। रट्टू तोता जैसा डायलॉग रोज कोई दोहराता है। गिनी चुनी सोच प्रशंसा लाभ जग को सुनवाता है। जागो उठो सुनो सभी ट्रंप चाल का भय दिखलाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। दुनिया लोहा मान समझौता रूप स्वीकार किया। फिर धीरे से आँख दिखा छवि में बट्टा लगा दिया। झेंप खीझ बेचैनी मिटाने फर्श पे ही लुढ़कते जाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। बरसों बरस की साख मिटती कैसे दुनिया ने जाना। जल थल नभ अंतरिक्ष शक्तिमान का बहक जाना। एक खिलौना खेलने बच्चे को ट्रंप इक्का ललचाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। रट्टू तोता कुछ तय शब्दों से अपनी शान दिखाता। अपनी बोली में फिर निज उर बोली भी फिसलाता। समर्थ राष्ट्र अर्थ तंत्र शस्त्र प्रगति...
ममता की वो खान है
कुण्डलियाँ, छंद

ममता की वो खान है

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** कुण्डलिया छंद ममता की वो खान है, मानें हम संताप। अपने निज व्यवहार से, करते हम सब पाप।। करते हम सब पाप, सभी हम जो हैं भरते। उसकी पीड़ा आज, देख क्यों नहीं समझते। कहें मित्र यमराज, समझिए इतनी समता। प्यारे पढ़ लो आप, मित्र लाचारी ममता।। मानो ज्ञान भंडार का, निज जीवन आयाम। अज्ञानी बन बैठना, बदनामी तव नाम।। बदनामी तव नाम, भलाई आखिर किसमें। करना वो ही काम, भाव सुखदा हो जिसमें। आप बढ़ाओ कोष, मित्र अब इतना जानो। बाकी सबकुछ आप, सोच समझकर मानो।। जिनकी होती है नहीं, स्वाभिमान पहचान। हम सब उनको जानते, इतना होता ज्ञान।। इतना होता ज्ञान, व्यर्थ है चर्चा करना। होशोहवास में आप, मित्र संभलकर रहना। दूरी रखिए आप, कहानी जो है इनकी। क्यों उनकी पहचान, शोर है चहुँदिश जिनकी।। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि :...
जय का वरण
गीत

जय का वरण

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** विपदाओं से लड़कर, जय को तुम पा जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। विपदाएँ तो नित ही मंगलगान सुनाती हैं। संघर्षों के भावों को, वे रोज़ जगाती हैं। जीवन हो खुशहाल, यही सबकी है चाहत, जो डर जाता उसको ही, वे रोज़ सताती हैं। साहस से प्रियवर तुम तो पूरे भर जाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। आपदाएँ कहती हैं बल को लेकर बढ़ना। एक नई गाथा को लेकर खुशियाँ गढ़ना। कभी न पीछे क़दम हटाना, कर्म यही है, अंधकार में उजियारे का वंदन करना। उल्लासित होकर प्रियवर मंगल बरसाओ। मंज़िल होगी पास, सफलता गह हर्षाओ।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/...
यह जगत है स्वार्थ का
हास्य

यह जगत है स्वार्थ का

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** यह जगत है स्वार्थ का, बना बनाया खेल। क्यों इसमें उलझा हुआ, सरपट चल रही रेल।। रिश्ते नाते अर्थ के, धन बिन सब बेकार। बेटा मांगे गाड़ी बंगला, मांगे भाई अधिकार।। पत्नी ने धीरे से कहा, सुनो मेरे भरतार। बेटे की भर दो तुम जेबें, दे दो भाई को घर बार।। चलो चलें हरि भजन को, वही करेंगे भव से पार। जो खेला हमने रचा, वो है झूठा संसार।। मिलता है, प्रभु शरण में, निश्छल प्रेम अपार। सत्य यही है कलियुग का, यहां चल कपट, व्यापार।। खेल रचाया था हमने, अब टूट गया भ्रम जाल। उलटे पैरों भाग लो, यही समय की है मांग।। प्रभु शरण हो जाओगे, है निश्चित कल्याण।। परिचय : आशा शर्मा पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : शिक्षिका हायरसैकैंडरी स्कूल साहित्यिक पर...
बेटिया
कविता

बेटिया

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** बेटिया तो मां-बाप की परछाई होती है, हर वक्त वो उनके साथ रहती है। कहीं कष्ट ना आये वह हरदम ध्यान रखती है। ठंड गर्मी हो या बारिश समय का ध्यान रखती है, समय पर खा लेना पापा वह हरदम ख्याल रखती है। तुम पुराने कपड़े-जूते तो ना पहनो पापा, फटी बनियान पर वह ध्यान रखती है। यदि बीमार हो जाए दौड़ी आती है वो बेटियां, अच्छे स्पेशलिस्ट को बताना है लिस्ट देखती है बेटियां। कहां जाना नहीं जाना हर सुविधा जुटाती है बेटियां। कही बीमार ना पड़ जाए वह सदा ध्यान रखती है बेटिया। कहीं भी देश या विदेश जाए उनका ध्यान रखती एसी ही मै जाना है टिकट तैयार रखती है। उनके स्वास्थ का हर पल ध्यान रखती है बेटियां, मन की बात वो समझे तन का हाल वो समझे हर परिस्थिति में वह ढल जाती है बेटियां। परिचय : किरण विजय पोर...
ज्ञात नहीं
कविता

ज्ञात नहीं

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हमें लगता है शायद घाटी से घहराते नीचे आते पाषाण का अवसान हो गया परन्तु नहीं पाषाण के जीवन का आरम्भ है, यह उपर घाटी पर निश्तेज, निरीह, निश्चल, निर्विकल्प सा पडा वह बदलते मौसम के झंझावातों से झुकता हुआं पडा था अपनी जगह बनाएं हुए एक कूप मंडूक की भांति परन्तु अब उसका भविष्य उज्जवल है सोचता है वह, हां वह सोचता है शायद देवो में पूजा जाऊं या किसी राजा की पहचान का प्रहरी बन जाऊं पर, पर उसे यह ज्ञात नहीं वर्तमान में मानव कितना कठोर है। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृ...
मन की मुराद
कविता

मन की मुराद

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** मन की मुरादों में बसता प्रेम का मधुर उजास, जिससे महक उठता जीवन, जैसे सावन की मिठास। परिवार के स्नेह से सजता हर आँगन का द्वार, अपनों के संग ही मिलता जीवन को सच्चा प्यार। माँ की ममता, पिता का आशीष अमृत बन जाता, संस्कारों का दीप हृदय में उजियारा फैलाता। देशभक्ति की ज्योति जले तो मन वीर बन जाए, मिट्टी की सौंधी खुशबू जीवन का गौरव कहलाए। तिरंगे की शान हेतु जो सपनों को अर्पित करते, वही राष्ट्र के इतिहास में स्वर्णिम अक्षर भरते। मन की मुराद यही कि हर नारी को मान मिले, उसके श्रम, साहस और सपनों को सम्मान मिले। नारी केवल कोमलता नहीं, शक्ति की पहचान, उसके चरणों से ही खिलता जीवन का मधुबन महान। मन चाहे ऊँचाइयों का हर शिखर सरल हो जाए, मेहनत के हर पथ पर सफलता मुस्कुराए। सत्य, प्रेम और करुणा से जीवन का श्रृंगार ह...
बरखा की आस
कविता

बरखा की आस

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** दिनकर की किरणों का, फैला चहुं ओर है ताप। गर्मी और उमस का है, झेल रहा मानव संताप। धरती का अंतस फटा। चुभ रहे हृदय में शूल। आसमां से नाता तोड़, बदरा गए रास्ता भूल। वृक्षों पर बैठे पंछी भी, रहे सभी हैं अकुलाय। अमवा की डाल-डाल, कोयल रही है बौराय। उमस भरे से दिन लगे, अब शीतल भई शाम। शीतल जल और पेय, भाने लगे अब आम। ताल तलैया सब सूखे, नदिया रही हैं सुखाय। गर्मी औ उमस से अब, जियरा रहा अकुलाय। गर्मी से नित बढ़ रही, वातावरण में है तपन। गर्म हवा लू लपटों से, तन में लग रही अगन। टूट रहा पल-पल अब, मानव मन का विश्वास। जेठ मास में है लग रही, अब बरखा की है आस। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय हिंदी सेवा समिति म प्र., ...
भूलना क्या था भूल गया
कविता

भूलना क्या था भूल गया

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** उसी पल बहुत कुछ उड़ धूल गया, अजीब मुसीबत आन पड़ी यारों, भूलना क्या था, भूल गया। दिमाग पर उस झोंके का ऐसा असर पड़ा, खुद भी न समझ पाया मैं कहाँ खड़ा। बस निरंतर चलता जा रहा हूँ, कोई विशेष नारा दोहराए जा रहा हूँ। प्रशिक्षित अंधभक्त कहलाए जा रहा हूँ, घर-परिवार, रिश्ते-नाते भूल चुका हूँ, अजीब से झूलों में झूल चुका हूँ। कोई किसी नाम से पुकारे, सुनता जा रहा हूँ, कभी सीधे, कभी गोल घूमता जा रहा हूँ। नशा किसी मादक पदार्थ का किया नहीं, फिर भी अजीब से नशे में झूमता जा रहा हूँ। किसका अंधभक्त हूँ, पता नहीं, मगर उसकी बुराई सुनना मंजूर नहीं। लोग कहते हैं- “कैसा हो गया तू? था पहले तो इतना मगरूर नहीं।” किस बंधन में बंध गया, किस झूले में झूल गया, अजीब मुसीबत आन पड़ी यारों, भूलना क्या था, भूल गया। ...
डरे प्रश्न भी भूख-प्यास के
गीत

डरे प्रश्न भी भूख-प्यास के

भीमराव 'जीवन' बैतूल (मध्य प्रदेश) ******************** डरे प्रश्न भी भूख-प्यास के, जिह्वा सके न खोल। हिटलर-सा हो गया घमंडी, दिल्ली का सेंगोल।। लगते हैं अब बागवान के, कातिल क्रूर इरादे।। मसल रहे हैं जब उपवन की, कलियाँ हिंसक प्यादे।। न्याय-देव को अब सत्ता की, बीन करे कंट्रोल।। जाल बनाने लगे हुए सब, मंचासीन जुलाहे।। भेड़ों को अब नित अफीम ही, चरा रहे चरवाहे। पत्रकारिता नैतिकता का, पहन न पाई खोल।। बटन दबाकर हुई अँगुलियाँ, खुद की ही हत्यारी। चोर उच्चकों के हाथों दी, घर की चौकीदारी।। कल की चिंता में 'जीवन' का, बिगड़ गया भूगोल।। परिचय :- भीमराव 'जीवन' निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्...
क्यों भूल जाते है
कविता

क्यों भूल जाते है

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** आधी उम्र जीवन के पार हो गए! माँ-बाप अब तो उम्रदराज हो गए। बिन सहारे उनसे चला नहीं जाता, सहारे की उम्र में किनारे हो गए।। वृद्धाश्रम अब उनका घर हो गए! अपने ही घर से अब बेघर हो गए। कभी रहे नहीं बच्चे माँ-बाप बिना, माँ-बाप से दूर रहते वर्षों हो गए।। साल में एक दिन अब याद आते है! स्टेटस लगाकर बच्चे प्यार जताते है। माँ-बाप का दर्द अब कौन समझेगा, बच्चे माँ-बाप को क्यों भूल जाते है।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच प...
कलम तोड़ना
दोहा

कलम तोड़ना

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** कलम तोड़ना हो सके, जब सच का आवेग। सच्चा ही तो दे सके, दुनिया को शुभ नेग।। कलम तोड़ना नित फले, जो जग को सौगात। जिससे शोभित दिन सदा, और दिव्य हो रात।। कलम तोड़ना हो सुखद, मंगलकारी गीत। आओ! हम गतिमय रहें, बनें धर्म के मीत।। कलम तोड़ना हित रचे, नष्ट करे जो पाप। ताक़त इतनी शब्द में, कौन सकेगा माप।। कलम तोड़ना कर्म है, पावन एक विधान। जो अँधियारा दूर कर, लाये नवल विहान।। कलम तोड़ना साधना, जिसकी हो जयकार। जिससे हो हर स्वप्न नित, जीवन में साकार।। कलम तोड़ना चेतना, जग का सुंदर रूप। जिससे कागज़ को मिले, सतत् निष्कलुष धूप।। कलम तोड़ना लेख को, देते हैं अमरत्व। पत्रकार कवि-लेखनी, रखे अगर सत्-तत्व।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) ...
दुनिया एक रंग मंच
भजन

दुनिया एक रंग मंच

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** जरा मन की अंखियॉ खोल यह जीवन बड़ा है अनमोल। जरा मन …. यह दुनिया एक रंग मंच है। अलग अलग है सबके रोल। कोई सनातन की सोच रखता। कोई पिपासु रक्त का घोल। जरा मन …. राह चुनते सब अपनी अपनी। गन्तव्य सब का एक ही ठोर। ज्ञान,बुद्धि, विवेक से सबको। मिलता है अभिनय का मोल। जरा मन …. साँसों से हैं जब तक रिश्ता। जीवन है तभी तक अमोल। होगा कल कहाँ ठिकाना। इस दुनियाँ का चक्र है गोल। जरा मन …. कर्म फल से भाग्य बँधा है। यादों से उसका होता तोल। ख़ाली हाथ जायेगा जब तू। रेह जाएँगे केवल तेरे बोल। जरा मन …. परिचय :- कमल किशोर नीमा पिता : मोतीलाल जी नीमा जन्म दिनांक : १४ नवम्बर १९४६ शिक्षा : एम.कॉम, एल.एल.बी. निवासी : उज्जैन (मध्य प्रदेश) रुचि : आपकी बचपन में व्यायाम शाला में व्यायाम, क्षिप्रा नदी में तैराकी और शिक्षा अध्...
तलाक
कविता

तलाक

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रिश्तों में संवाद का दीप जब धीमे-धीमे बुझ जाता है, तब साथ रहते हुए भी मन का आँगन सूना रह जाता है। अहंकार की ऊँची दीवारें दिलों के बीच खड़ी हो जाती हैं, "मैं" की जिद में "हम" की डोर अक्सर टूट सी जाती है। विश्वास की नींव हिलते ही घरौंदा बिखरने लगता है, शंका का एक बीज भी जीवन को ज़हर करने लगता है। समय की कमी और व्यस्तता रिश्तों को दूर कर देती है, पास रहकर भी दूरी, जीवन को मजबूर कर देती है। अपेक्षाओं का बोझ जब हद से ज्यादा बढ़ जाता है, तब प्रेम का कोमल पौधा भी मुरझा सा जाता है। धैर्य और सहनशीलता आज कम होती जा रही है, छोटी-छोटी बातों पर भी डोर टूटती जा रही है। (उपाय) यदि संवाद का दीप फिर से दोनों मिलकर जलाएं, तो बिखरे हुए रिश्ते भी मुस्कुराकर फिर जुड़ जाएं। (उपाय) अहंकार को त्याग कर यदि प्रेम को स्थान द...
एक, एक पल
कविता

एक, एक पल

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** एक, एक दिन एक, एक पल शाम बितती है ज़िन्दगी यू हीं फिसलती जाती है जनाजे के किसी को करते हुए रुखसत ज़िन्दगी के अरमानों का गला घुटता है मचलते जज्बातों की मशाल धधकती है। धड़कनों के कहकहे सुनता है आफताब भी उन्हीं कहकहों में डुबता हैं सूरज कहीं मोहब्बत और प्यार से पालने वाले दिलदार न जाने कब, कैसे इस दुनिया से विदा हो गये। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप ...
राधा और द्वारिकाधीश संवाद
कविता

राधा और द्वारिकाधीश संवाद

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** एक दिन साथ विचरण करते राधा ने कृष्ण से पूछा, कैसे हो द्वारकाधीश कृष्ण आहत हुए सोचने लगे " राधा तो कान्हा कह कर पुकारती हैं फिर ये द्वारिकाधीश संबोधन क्यों. स्वयं को सम्भालते कृष्ण बोले आओ कुछ पल साथ बैठते हैं! कुछ मैं अपनी कहूँगा कुछ तुम अपनी सुनाना एक दूसरे के सुख दुःख बांटते हैं। कृष्ण बोले जब-जब तुम्हारी याद आइ आँखों से अश्रु बहते थे जीवन सूना सा था तुम्हारे बिन। राधा मुस्काई- तुम तो मेरे नैनो में बसे हो, मैं तो तुम्हें भूली ही कहां जो अश्रु बन बह जाने देती इन नैनो से तुमको। कृष्ण ने पूछा- हम तो सदैव से तुम्हारे कान्हा रहे हैं ये द्वारिकाधीश का संबोधन क्यूँ? राधा पुनः मुस्कराई बोली- जब तुम प्रेम से बंधे थे तो कान्हा थे, तुम्हारे हाथों में मधुर संगीत वाली बाँसुरी सुशोभित ...
उसने ख़ुद को लिखा
कविता

उसने ख़ुद को लिखा

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उसने ख़ुद को लिखा, रोटी बनाते- बनाते..... चौके में बिखरे आटेख़ुद से, और झट से मिटा दिया।। उसने ख़ुद को लिखा, कुर्सी-मेज दरवाज़े-खिड़की पे जमी धूल से.... और झट से मिटा दिया।। उसने ख़ुद को लिखा, समन्दर की रेत पे और देखा तेज़ बहाव को, मिटाते हुए उसका अस्तित्व, उसने भीगी पलकों में समेट लिया अपना लिखा।। उसने "जग" को लिखा, "जगदीश्वर" को..... शायद वह इक बेहतरीन लेखिका रही होगी न, झांककर खिड़की से बाहर... उसने ख़ुद को... कहां... कहां लिखा! पर ख़ुद को "कहां" लिखा...????? परिचय :- इंदौर (मध्य प्रदेश) की निवासी अपने शब्दों की निर्झर बरखा करने वाली शशि चन्दन एक ग्रहणी का दायित्व निभाते हुए अपने अनछुए अनसुलझे एहसासों को अपनी लेखनी के माध्यम से स्याह रंग कोरे कागज़ पर उतारतीं हैं, जो उन्हें खुशियों के आसमान...
बढ़ी है नफ़रत
ग़ज़ल

बढ़ी है नफ़रत

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** वज़्न- १२१२ २१२१ २१ बढ़ी है नफ़रत बढ़ें हैं शूल। खिला है जब से विषैला फूल।। ये ख़त्म कैसे हुआ है अम्न। कहाॅं पे हमसे हुई है भूल।। धुऑं बचा है बची है राख। बची न बस्ती बची है धूल।। गधे हैं ख़ुश सब यहाॅं पे आज। कि ढो रहे बोझ वो अमूल।। किया था झूठे ने वादा झूठ। थी उसकी बातें सभी फ़ुज़ूल।। जो कहते करते अच्छे लोग। गधों का कोई नहीं उसूल।। वफा के बदले जफ़ा निज़ाम। दिया है उसने मुझे ये मूल।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपन...
नींद से जागने के बाद
कविता

नींद से जागने के बाद

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** ऊपर से नीचे तक कसीदे गढ़ रहे हैं, किसी को नहीं पता किस ओर बढ़ रहे हैं। राजा दिन को रात कह रहा है, और हम भी सिर झुकाकर वही कह रहे हैं। दिल, जिगर, शरीर छलनी पड़ा हुआ है, राजा का सैनिक हर घर में खड़ा हुआ है। जो कुछ भी घर में है, बस खाते जाओ, चरण-चाटन संग स्तुति-गान गाते जाओ। बर्बादी में भी बदलाव का नारा गूंज रहा है, डंका कब, कहाँ, कैसे बज रहा है- दुनिया सारा देख रहा है। झूठों के बाजार बड़े सजे हुए हैं, भोले-भाले खरीददार बीच फँसे हुए हैं। राशन तो लेना है, मगर कैसे लूँ? झोले में आभास भरा जा रहा है, बताओ-उसके पैसे कैसे दूँ? भविष्य के सुनहरे खयालों के सहारे, खाली पेट बच्चे ज़िंदगी कैसे गुज़ारें? अरमानों की पटरी पर धड़ाधड़ दौड़ रही रेल, किस वक्त में फँस गया हूँ मैं, क्या चल रहा यह खेल? ...