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पद्य

मेरी पसंद
कविता

मेरी पसंद

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** माता दुर्गा की पूजा की श्री राम ने, वह तट पसंद है, माता सीता ने वनवास काटा, वह पंचवटी पसंद है। हनुमाना ने लंका की उजाड़ी, वह वाटिका पसंद है, राम-सीते का मिलन हुआ, वह वाटिका पसंद है। लव-कुश का जन्मोत्सव हुआ, वह आश्रम पसंद है, रामकृष्ण परमहंस ने ज्ञान दिया, वह आश्रम पसंद है। मीरा की भक्ति से पावन हुई, वह धरती पसंद है, कृष्ण ने गोपियों संग लीला की, वह धरती पसंद है। तुलसी ने रामचरित रची, वह गंगा तट पसंद है, श्रीराम ने जलसमाधि ली, वह सरयू घाट पसंद है। कपिश्वर लाए संजीवनी, वह पाषाण पसंद है, कृष्ण ने रक्षा हेतु उठाया, वह गोवर्धन पाषाण पसंद है। जिस रज पर जीवन संभव, वह धरती पसंद है, जिस रज पर मैं चरण रखूँ, वह अपनी धरती पसंद है। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" ...
लोहा ले लो शत्रु से …
दोहा

लोहा ले लो शत्रु से …

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** (भ्रमर दोहे) लोहा ले लो शत्रु से, जागो मेरे मीत। होगी तेरी जीत ही, त्यागो सारे भीत। त्यागो जिद्दी चाल को, मानो मेरी बात। छोड़ो सारी दुष्टता, देती जो आघात।। खाना खाओ शुद्ध ही, जो हो शाकाहार। हत्या जीवों की रुके, छोड़ो अत्याचार।। जीना सीखो शान से, गंदा धंधा छोड़। बेईमानी त्याग दो, नेकी से हो होड़।। आओ मेरे पास तू, सीखो प्रज्ञा गूढ़। दूँगा ऐसा ज्ञान मैं, मानो रे हे मूढ़।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 र...
क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है
छंद

क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है

डॉ. भावना सावलिया हरमडिया, राजकोट (गुजरात) ******************** (पीयूष वर्ष छ्न्द) २१२२ २१२२ २१२ पास जिसके माँ वही धनवान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। सृष्टि में माँ का सृजन अनमोल है। कष्ट हर लेता जननि का बोल है। सर्व सुख माँ के लिए संतान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। गोद में संसार भर का सुख मिला। स्नेह सिंचन से कली-सा मन खिला।। नित्य तन-मन से करें फिर सम्मान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। इस जगत की राह में सब शूल हैं। एक माँ की गोद में बस फ़ूल हैं। माँ खिलाती हाथ से पकवान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। शीश चरणों में झुकाया है जिसे। कष्ट जीवन में कहाँ फिर है इसे। तीर्थ का पावन वही गृह स्थान है। क्योंकि माँ साक्षात ही भगवान है।। सर्व सुख संपत्ति की माँ नाव है। ग्रीष्म की दोपहर में वह छाँव है। माँ हमेशा चाहती उत्थान है। क्योंक...
मां शब्द की अभिव्यक्ति
कविता

मां शब्द की अभिव्यक्ति

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** मां शब्द की अभिव्यक्ति क्या करूं,1132 क्या लिखूं माँ पर कोई एक रचना! विधाता का श्रेष्ठ सृजन हमारे लिए, माँ के रूप में खुद आए हमारे लिए मां के दुलार बिन रह न पाया, हर जगह मौजूद मां का ही साया! कभी सोने न दिया भूखे पेट मुझे उठाकर नींद में, निवाला खिलाया।। मैं ईश्वर का नाम लूं न लूं दुआएं तेरी हमेशा लगती मुझे झोली में तेरी सदैव रहती मन्नतें, धागे बांधे न जाने कितने मेरे लिए।। लाख कोशिश कर लूं फिर भी, तेरा ऋण मैं उतार न पाऊंगी सलामत रहो बस मेरे लिए तुम तुम्हारी दुआओं से, यश पाऊंगी।। क्या लिखूं माँ तेरे लिए मैं शब्दों से तेरा ही दिया हुआ, ये जीवन हैं मेरा तुम्हारी स्वयं कि, मैं हूं एक रचना आज मां बनकर ही एहसास हुआ।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) ...
जीवन की पहचान
कविता

जीवन की पहचान

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** चित्र नही चरित्र बनाये, फोटो नही मुस्कान बढाये, द्वेष नही स्नेह बढाये, राग नही अनुराग बढाये। घृणा नही प्रेम बढाये, अपमान नही सम्मान बढाये, अकेला नही समूह बनाये, धोखा नही विश्वास बनाये। बेसहारो का सहारा बन जाये, बेरोजगारी नही रोजगार बढाये, माँ मातृभूमि, और जन्मभूमि का मान बढाये, जिसका खाये उसका गाऐ। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम्मानित ४. १५००+ कविताओं की रचना व भ...
घाम पियास
कविता

घाम पियास

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** लकलक-लकलक घाम करत हे। घाम पियास म मनखे मरत हे। काटें काबर रुख-राई ल संगी, ताते-तात आज हवा चलत हे।। बर पिपर के छईयाँ नँदागे। बिन छईयाँ के चिरई उडा़गे। आगी अँगरा कस भुइयाँ लागे, भोंमरा जरई म गोड़ भुँजागे।। नदियाँ, नरवा, अउ तरिया अटागे। जंगल झाड़ी, रुख राई कटागे। घाम पियास म सबला बचइया, हरियर धरती घाम म सुखागे ...।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिं...
पिता की रौशनी
कविता

पिता की रौशनी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** हाँ बेटा, मैं तुझे अंधेरे से बचाना चाहता हूँ, जीवन के कुछ मूल सूत्र समझाना चाहता हूँ। ये सही है, मेरा बार-बार टोकना तुझे शायद अच्छा नहीं लगता, मुझसे खुलकर बात करने का मन अक्सर ही कतराता, भटकता। मेरी डाँट, मेरे शब्द तुझे जैसे चाकू-छुरा लगते हैं, पर इन्हीं में छुपे भाव मेरे तेरे भविष्य के रक्षक बनते हैं। तू क्यों नहीं समझ पाता है इन बातों की गहराई को, बात पूरी सुने बिना ही छोड़ देता है सच्चाई को। जल्दबाज़ी छोड़, धैर्य का ताप सहना सीख, अपने पैरों पर चलना, खुद को गढ़ना सीख। हर एक फरमाइश के पीछे कितनी मेहनत झेल रहा कोई, अपनी ही ज़िंदगी, अपने ही तन से कितना खेल रहा कोई। वक़्त किसी के लिए नहीं ठहरता, ये सच्चाई याद रखना, जो पसीने से खेलते हैं उनके पाँव में छाले भी हार मानते ये बात ...
ज़िंदगी चार दिन की
ग़ज़ल

ज़िंदगी चार दिन की

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** अरकान- फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन फ़ाइलुन वज़्न- २१२ २१२ २१२ २१२ मौत सच है रहेंगे सदा हम नहीं। जीने का भी यहाॅं पे मज़ा कम नहीं।। ज़िंदगी चार दिन की जियो शान से। बाटो खुशियाॉं जहॉं में मगर ग़म नहीं।। ज़ुल्म सहते रहे उनके हॅंसते हुए। रोए ऐसे की ऑंखें हुई नम नहीं।। ज़ेहनी कमजोर जो लड़ते फिरते हैं वो। गुस्से में कांपते जिनके कुछ दम नहीं।। जंग बल से नहीं तुम लड़ो अक़्ल से। नज़रें दुश्मन पे हों ये मगर ख़म नहीं।। चढ़ने के बाद जल्दी न उतरे मिरी। फूल महवे की पीता कभी रम नहीं।। लोग क्यूॅं डर रहे देख मुझको निज़ाम। ठर्रा बोतल में है ये कोई बम नहीं।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित हैं। क...
धीरे-धीरे हँसना प्रिये …
कविता

धीरे-धीरे हँसना प्रिये …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। सोणी-सोणी है मेरी नार, सच्चा-सच्चा है तेरा मेरा प्यार।। तुझको मेरे पास रहना है, सच्चा साथ निभाना है। धीर धारण करके रहना है, मुझे महकाते रहना है। मुझसे ही है तेरा श्रृंगार, मेरे बिना श्रृंगार है बेकार। धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। सोणी-सोणी है मेरी नार, सच्चा-सच्चा है तेरा मेरा प्यार।। रातें काली-काली होती हैं, फिर भी सुंदर सुबह होती हैं। रातों में मीठी-मीठी बातें होती हैं, मगर अधूरी रह जाती हैं। मेरी परछाई बनना प्रिये, मरने से पहले साथ रहना प्रिये। इस जीवन में मेरी हो प्रिये, फिर कहना मेरा ये ही है प्यार। सबको सच्च कहना, इसको ही कहते है सच्चा दिलदार। धीरे-धीरे हँसना प्रिये, मेरा मुझसे ही कहना प्रिये। स...
मां तो मां होती है
कविता

मां तो मां होती है

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** आंचल के छांव में, ममता के मोह में, मां तो सब सह जाती है। मां तो मां ही होती है।। स्नेह भाव, मम्मत्व से भरी। पुत्र प्रेम में सब भूल सारे कष्ट सहकर भी हंसकर जीती जाती है। बिटिया से करे हंसी ठिठोली, आंखों ही आंखों में सब कुछ समझाती। मां तो मां ही होती है।। पाल पोस कर किया बड़ा अब फिर भी सीने से लगाती है। सपने देखे बहुओं का, दामाद ढूंढे भविष्य के सपने बुने, घर को स्वर्ग बनाती है। घर संभाले, बच्चों की इच्छा पूरी करें, लाड़ लुटाए लड़के पर इतनी इतराती है। मां तो मां होती है।। सब कुछ सह कर भी जीवन नौछावर कर जाती है। ‌मिला न कोई अपना सा, अब तो मां की यादों में रहता हूं, सपनों में जीता हूं, अकेले में ही मां से बातें करता हूं ‌।‌ मां तो मां होती है।। परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प...
रोम-रोम आनंदित करदे …
भजन

रोम-रोम आनंदित करदे …

कमल किशोर नीमा उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** रोम-रोम आनंदित करदे, जगत का पालन हारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। प्रेम रस की मूरत है वो, सब से है वो न्यारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। छवि निहारे जब जब, लगता है सब से दुलारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। मोर मुकुट पिताम्बर धारी, मोहन मुरली वाला। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। गिरि धारी वो कुंज बिहारी, नैनों का है तारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। रंग रसिया के रंग मे रमा है, बृज मंडल सारा। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। युगों मे अवतरित होता है, धर्म का ये रखवाला। वो श्री कृष्ण है प्यारा, वो श्री कृष्ण है प्यारा। भक्तों के कष्टों को हर, कर देता है उजियारा। वो श्री कृष्ण है प्य...
लिखता रहूंगा
कविता

लिखता रहूंगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जब से मैंने होश संभाला, मां-बाप ने विद्यालय में डाला, गुरुजनों और साथियों ने साथ निभाया, शब्दों को कैसे गढ़ना है- यह हुनर सिखाया। तभी से लिखता चला जा रहा हूँ, कभी अपनी उलझनें, कभी दिल के फ़साने, कभी प्रेरणा देने वालों से मुलाक़ातों के तराने। कभी प्रेम, कभी पीड़ा, कभी जीवन की टीस, तकनीक की दौड़ में भी ढूंढता रहा अपनी ही किसी चीज़। अपनों के रंग, उनके वार और प्रतिघात, भरोसेमंद हाथों से भी खाई दिल पर चोट की घात। भले ही मैं कवि या लेखक न दिखता हूँ, पर शब्दों के संग निरंतर चलता हूँ। परिवार को मुस्कान देने की कोशिश में लगा, कभी अपने ही खून से भी मिला धोखा जगा। जिसे सबसे अधिक विश्वसनीय माना, उसी से जीवन का सबसे गहरा घाव पाया, तभी तो खुद की पहचान का आईना भी कभी-कभी मुझे मेरी औका...
अतरी की वादियाँ
कविता

अतरी की वादियाँ

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** आकर देखिए जरूर यहाँ , मोहक अत्री की वादियाँ। लें खुशबू सोंधी मिट्टी की, अवलोकन करें ये घाटियाँ।। यहीं तपोवन की पुण्यभूमि , गर्म कुंड झरना पहाड़ियाँ। प्रकृति अति सुहानी लगती है , छोटी झुरमुट लताएँ-झाड़ियाँ।। जेठियन घाटी लगे अद्भुत, यहाँ दृश्य मनोरम झाँकियाँ। आकर देखें गहलौर घाटी, दशरथ की जुनूनी कहानियाँ।। शान यहाँ किसानों की है, खेतों की टेढ़ी-मेढ़ी आरियाँ। आकर निहारें अद्भुत छटा को छोटी-बड़ी यहाँ की क्यारियाँ।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (पी.एन.बी.) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स...
यौवन
कविता

यौवन

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** दिन जवानी के आते जाते रहेंगे। मोहब्बत के गीत हम भी गाते रहेंगे। नाम लेकर खुदा तेरा हम उसे मनाते रहेंगे। अफसाने तो बहुत लिखे हैं हमने हर अफ़साने में तेरे नाम के साथ उसका नाम लिखते रहेंगे। लोग पूछेंगे जब भी दर्द की वजह हम भी सर्द हवाओं के साथ उसका नाम भी हम लिखते रहेंगे। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी...
सतरंगी दुनिया- २१
कविता

सतरंगी दुनिया- २१

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** अपनी ज़िंदगी को खुली किताब मत बनाइए, क्योंकि लोगों को पढ़ने में नहीं, बल्कि पन्ने फाड़ने में मजा आता है। *खिचड़ी की विशेषता देखिए- अगर बर्तन में पकती है तो बीमार को ठीक कर देती है और दिमाग में पके तो इंसान को बीमार कर देती है।* अजीब है दुनिया मरने वाले को रोने वाले हजार मिल जाएंगे, मगर जो जिंदा है, उसे समझने वाला एक भी नहीं मिलता है। समय का खेल भी निराला है, भरी जेब ने दु‌निया से पहचान कराई, और खाली जेब ने इंसानों की। जो लोग हमें पसंद नहीं करते हैं, उनके बारे में अजीब बात यह है, कि वे हमारी हर चीज पर नजर रखते हैं। हमारी ज़िन्दगी भी अजीब है, होती तो है हमारी, पर जीना दूसरों के लिए पड़ता है। गर्लफ्रेंड को शराब पीते देख ब्वाय फ्रेंड ने पूछा- तुम लड़की हो के भी शराब पीती हो ? गर्लफ्रेंड ने जवाब दिया, कि क्या २-४ पैग पीने के...
मजदूर
कविता

मजदूर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं। दिन-रात वह मेहनत करता है। चैन सुकून से वह रहता है। पसीने की कमाई वह खाता है। गीत खुशी क वह गाता हैं। मजदूर है, मजबूत है……।। माना साधन उनके पास भरपूर नहीं। औरों स वह मशहूर नहीं। कंधे पर बोझ वह ढोता है। अपनी हालत पर वह नहीं रोता हैं। मजदूर है, मजबूत है….।। परिवार का पोषण करता है। नाम मालिक का रोशन करता है। गम अपना वह छिपाता है। आँसू वह नहीं बहाता है। मजदूर है, मजबूत है, मजबूर नहीं।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करे...
सब ठीक होने की कीमत
कविता

सब ठीक होने की कीमत

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सब कुछ ठीक होने की उम्मीद में हम हर दर्द को सहते चले जाते हैं और समय चुपचाप हमसे सब कुछ छीनता चला जाता है। हम कहते हैं बस थोड़ा और सह लो बस हालात बदल जाएँगे बस सुबह आ ही जाएगी। पर सुबह आती है तो चेहरे बदल चुके होते हैं जिन्हें बचाने की चाह थी वे यादों में बदल चुके होते हैं। हम घाव भरने का इंतज़ार करते हैं और जीवन लहू बहाकर आगे बढ़ जाता है हम भविष्य सँवारते रहते हैं, और वर्तमान दफन होता जाता है। सब कुछ ठीक होने तक सपने थक जाते हैं रिश्ते चुप हो जाते हैं! फिर एक दिन हालात सच में सुधरते हैं पर जश्न मनाने वाला कोई नहीं बचता क्योंकि जो चाहिए था सुख के लिए वह सब संघर्ष में खत्म हो चुका होता है!! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरव...
मैं… कहाँ रह गया मैं…?
कविता

मैं… कहाँ रह गया मैं…?

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं... मैं था कभी.. मेरा स्वाभिमान.. मेरा दंभ मगर... अब मै कहाँ रह गया हूँ मैं...... तरंग विहीन उमंग विहीन धड़कते स्पंदनों के घेरे से बाहर नाना रूपी विलग स्वरूपी संवेदनाओं से ऊपर उठ कर स्वप्न सागर में तैरने का अहसास लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? मिचमिचाते तारों भरे नील गगन में मटमैले से प्रकाश में चंदा विहीन तारा पूरित नभ पर शायद अमावस्या है भाव विहीन भावों के गहन समंदर में तिरोहित भाव लिए मैं हूँ पर प्रश्न है... क्या मैं हूँ...? चलाचल के समागम में हरित वसुंधरा पर ढह गई मानवीय सोच सभ्यता और संस्कृति विरासत के गुण बह गये आडंबरीय सैलाब में भौतिकता की मोह धारा में चमकता मार्तंड जगाता है विश्वास पर कैसे मानूं... फिर भी अस्तित्व है मेरा पर प्रश्न है... क्य...
पाति
कविता

पाति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ओ निरझर बता मैं किसे सुनाऊं तेरी पाति बंधे हुए सलील को उगते हुए रवि को या स्वार्थ भरे मानव को बता तू ही बता क्या धरा का वक्ष फट नही रहा बंधे बांधों के कारण। क्या बंधा जल कोस नहीं रहा अपने आपको तुझे बहता देख तेरी व्यथा पाती से अधिक है धरती का फटना बांधों का बंधना मिट्टी का कटना वृक्षों का कटना। केवल मानव कै लिए धरती फटती हैं सहती हैं जल विहिन हो जब वह मानव को अपने मे समाती हैं तो इसमे धरती का दोष कैसा। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों स...
चलो चले भैया हम गांवों की ओर
कविता

चलो चले भैया हम गांवों की ओर

डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' मंडला (मध्य प्रदेश) ******************** पीपल की छैंया और अमुआ की बोर, खटमिट्ठी अमिया ले आमराई से झोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। टेढ़ी-मेढ़ी पगडंडी जाए खेतों की ओर, कुहू कुहू गूंजे जहां कोयल का शोर, चलो चलें भैया हम गांवों की ओर। सुरभित सुहानी सी लगे जहां नित भोर, शीतल समीर बहती जहां चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। इठलाती बलखाती बहे नदी जिस ओर, ममता की छांव में सोंधी रोटी के कौर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। गूंजे गीता की वाणी गूंजे अजान चहुं ओर, मंदिर में गूंजे है घंटों का शोर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। प्रीति का पराग झलके जहां पोर पोर, संस्कृति के रंग जहां बिखरे चहुं ओर, चलो चले भैया हम गांवों की ओर। परिचय :- डॉ. संध्या शुक्ल 'मृदुल' निवासी : मंडला (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : प्रदेशाध्यक्ष- अखिल भारतीय ...
सुभद्रा कुमारी चौहान
कविता

सुभद्रा कुमारी चौहान

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** वीरत्व की ज्वाला से दहकती, वाणी में था हुंकार, जन-जन में जागृत करतीं वे, स्वाधीनता का संचार। कलम बनी जब शस्त्र उनका, शब्द बने रणभेरी, रानी की गाथा गाकर, भर दी हिम्मत अनेरी। नारी शक्ति का रूप प्रखर, साहस जिनका आभूषण, अंग्रेजी सत्ता से टकराईं, लेकर स्वाभिमान का वचन। झांसी की वीरांगना का, गाया अमर गान, आज भी गूंजे भारत में, उनका ओजस्वी सम्मान। ऐसी वंदनीय कवयित्री को, शत-शत नमन हमारा, वीर रस की वह अमिट ज्योति, जग में रहे उजियारा। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : 25 अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन क...
गुरु गोविंद सिंह जी
कविता

गुरु गोविंद सिंह जी

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गुरु ग्रंथ गुरु की वाणी सत मार्ग पर चलाएं, दसवें गुरु गुरु गोविंदसिंह जी नमन हमारा सो सो बार। धर्म देश रक्षा के खातिर किया देह बलिदान, साहस और वीरता से किया मुगलों पर है वार, झुके नहीं वह डटे रहे अपने पथ पर आज, सिख धर्म के कट्टर त्यागी बलिदानी है आप, देश भक्ति की भावना उनके लिए सम्मान, कितने गुरु अवतरित हुए गुरु ग्रंथ का मान, गुरु की वाणी धर्म हमारा पथ पर चले महान। डरे नहीं वह झुके नहीं वह थे योद्धा महान, धर्म में रहना उद्देश्य हमारा चाहे जाए प्राण, धर्म ना बदला नहीं झुकना ऐसे वीर महान । आज उनके चरित्र पर चलना है हमें साथ, नहीं तो राष्ट्र समाज संस्कृति गर्त में जा रही आज। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन ...
नमन उन शहीदों को …
कविता

नमन उन शहीदों को …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भारत आजाद कराने, दीवानों की वो टोली चली थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। न जाने कितने परवानों ने, सीने पर खाई गोली थी, मन में अडिग संकल्प लिए, उन्होंने ही क्रांति जगाई थी। इतिहास के पन्नों में पढ़ लेना, आजादी जिनकी दीवानी थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। माँ भारती की मुक्ति को, वीरों ने हँसकर कुर्बानी दी थी, कोई कैसे कह दे हमको, केवल अहिंसा से आजादी मिली थी? हाँ यह भी पढ़ना, कितनी 'लक्ष्मी' रणचंडी बन लड़ी थीं, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। स्वातंत्र्य-यज्ञ की वेदी पर, कितनी ही माँओं की गोद सूनी थी, न जाने कितनी बहनों ने, अपनी राखी वाली कलाई खोई थी। खदेड़ दिया फिरंगियों को, जमकर धूल चटाई थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। जह...
रूप चाँदनी भा रही
दोहा

रूप चाँदनी भा रही

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** रूप चाँदनी भा रही, रही आज मन मोह। अंतर्मन में नेह है, हर पल है आरोह।। सन्नाटा छाया हुआ, चुप है हर आवाज़। सुर भी सब मायूस हैं, खामोशी में साज़।। हर दिल को तो भा रही, तेरी मृदु मुस्कान । हर दिल में रहती सदा, इसकी पावन आन।। आँसू लगते नेक हैं, जब हो मन में प्यार। रिश्तों की संजीवनी, अपनेपन का सार।। भटक न जाना बंधुवर, प्रभु दिखलाते राह। रखो सत्य उर में सदा, निकलेगी तब वाह।। अंधकार को मारकर, धारण कर उजियार। तभी बनेगी ज़िन्दगी, फूलों का संसार।। प्रभु को मानो हर समय, तभी बनेगी बात। बन जाएगी ज़िंदगी, सुख की तो बारात।। कभी न करना लोभ तुम, कभी न करना पाप। वरना है यह ज़िन्दगी, केवल तो अभिशाप।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मे...
कृत्य और बर्बादी
कविता

कृत्य और बर्बादी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यौवन कभी तो घटेगा, बिजली संयंत्र का बायलर कभी तो फटेगा, तब नहीं होगा मुझे किसी प्रकार का आश्चर्य, वो दिन भी होगा सामान्य दिन नहीं समझूंगा कोई विशेष तिथि पर्व, क्योंकि आग इस कदर जलाया जा रहा है, हर किसी के द्वारा घी का होम दे आग भड़काया जा रहा है, नहीं मतलब किसी को देश धर्म राग से, सब संतुष्ट है भड़कती हुई आग से, नहीं पड़ना फर्क कहां लगी है आग, हर कोई भड़का रहा अग्नि धवल आग, मतलब नहीं ये आग कब कहां किसे जलायेगा, जहां ए दौर में कैसा मंजर लाएगा, वस्तु स्थिति का सामना करने बैठा है हर कोई तैयार, ग्रस्त है मानसिक रोग से राष्ट्र यार किंचित हृदय स्पंदन नहीं हो रहा है, हर हिय एक बकवास ढो रहा है, जिए जा रहा लेकर मन में इक आस, संपूर्ण लग रहा सबको किसी का बकवास, कुकृत्य कुछ अंधों की आबा...