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पद्य

मनखे हो के मनखे बर
आंचलिक बोली, कविता

मनखे हो के मनखे बर

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) मनखे हो के मनखे बर, तँय काबर मरत हस बिन तेल अउ बाती के, तँय काबर जरत हस हाँसत गावत बिता ले, तँय अपन जिंनगी ला पर के जिनगी मा, झोझा काबर परत हस !! कुछु खाय चाहे कुछु पहिरे, तोला का करना हे झूठ लबारी चारी चुगली, तोला दूरिहा रहना हे सुवारथ के चक्कर मा, तँय काबर फाँसत हस काकरो दुख दरद ल देख, काबर हाँसत हस !! मनखे जनम पाय हस, सुग्घर करम करना हे चार दिन के जिनगी, तहन सबो ला मरना हे दूसर के महल अटारी देख, काबर मरत हस मेहिनत बिना, फर के आस, काबर करत हस !! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर र...
योग अपनाओ, रोग भगाओ
गीत

योग अपनाओ, रोग भगाओ

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** योग अपनाओ, रोग भगाओ, जीवन को तुम महकाओ, तन को साजो, मन को माजो, खुशियाँ तुम अपनाओ। योग भगाए रोग... योग भगाए रोग... सुबह-सवेरे जब तुम उठना, ताजी हवा में श्वास तो भरना, 'सूर्य-नमस्कार' से दिन की शुरुआत तुम करना। आलस त्यागो, शक्ति जागो, योग पथ पर चल जाओ, योग भगाए रोग... प्राणायाम की शक्ति न्यारी, दूर हो व्याधि सारी, बीमारी अब हार मान ले, होगी जीत तुम्हारी। ध्यान लगाओ, मन को सजाओ, अंतर्मन में मुस्कुराओ, योग भगाए रोग... स्वस्थ काया, सात्विक माया, योग ही सबसे सच्चा, बुजुर्ग हो या युवा यहाँ पर, योग करे हर बच्चा। जग को जगाओ, सबको बताओ, योग की अलख जगाओ, योग भगाए रोग... योग भगाए रोग, जीवन को तुम महकाओ! परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : ...
दोस्ती
कविता

दोस्ती

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** एक दोस्त है मेरा शांत, धीर, सिंधु सा व्यवहार में प्रखरता जैसे चमक हो किरणे पड़ती नीर की कर्तव्य, प्रेम, और परिश्रम के रस से भरा एक दोस्त है मेरा ।। प्यार से खुशियों की एक् कली खिलाता अपनी भरपुर मेहनत से भूमि को लहलहाता, हर्षाता एक दोस्त है मेरा ।। मीठी लगी जिसकी प्यारी दोस्ती चख के देखी अभी है वो मिसरी सी डली एक दोस्त है मेरा ।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी म...
आशीष
दोहा

आशीष

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** आज कौन अब दे रहा, आप बताओ भाव। सबको अब आशीष भी, लगता जैसे घाव।। मातु-पिता आशीष लो, गुरुजनों के साथ। तभी हमारे शीश पर, समझो ईश्वर हाथ।। जैसी करनी हम करें, वैसा पाते रोज। कलयुग में आशीष की, करें स्वार्थ की खोज।। छलछंदो की आड़ में, आशीषों पर वार। समय साथ अब खो रहा, हम सबका संस्कार।। मीठे बोल की आड़ में, कपट छिपाकर लोग। देते हैं आशीष भी, मन में शापित रोग।। चाह रहे आशीष हैं, मम प्रियवर यमराज। कहते हैं प्रभु दीजिए, बने हमारा काज।। परिचय :- सुधीर श्रीवास्तव जन्मतिथि : ०१/०७/१९६९ शिक्षा : स्नातक, आई.टी.आई., पत्रकारिता प्रशिक्षण (पत्राचार) पिता : स्व.श्री ज्ञानप्रकाश श्रीवास्तव माता : स्व.विमला देवी धर्मपत्नी : अंजू श्रीवास्तव पुत्री : संस्कृति, गरिमा संप्रति : निजी कार्य विशेष : अधीक्षक (द...
दिव्या अनुराग
कविता

दिव्या अनुराग

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** जन्म जमांतर की मेरी अतृप्त इच्छाएं मुझे छूने लगी है। देख कर तुमको मुझ में प्रेम जिज्ञासा फिर उत्पन्न होने लगी है। तुम्हारे अस्पर्श अहसास मेरे सहस्रार को जागृत करने लगे है। न चाहते हुए भी मेरे अनाहत में तुम्हारे स्वर को गूंजने लगे हैं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak1...
जवाब एक विकृत मानसिकता को
कविता

जवाब एक विकृत मानसिकता को

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** मत भूल, नारी केवल घर की नहीं, समाज और सभ्यता के सम्मान की पहचान होती है, संस्कारों की धड़कन, परिवार की मुस्कान होती है। पर तू तो जाति के मद में डूबा हुआ, अपने ही बनाए दायरों में कैद खड़ा है, मानवता से कोसों दूर, अहंकार के शिखर पर चढ़ा है। सोचता हूं, तू अपनी माँ, बहन, बेटियों को किस दृष्टि से देखता होगा, क्या अब भी उन्हें पुरानी जंजीरों में ही बांधता होगा? तेरी पीड़ा का कारण यही है कि जिन्हें तुमने सदियों तक पायदान से अधिक नहीं समझा, उन्हीं में से एक बेटी ने जन-जन के विश्वास का मुकाम रचा। संविधान की राह पर चलकर न्याय और प्रशासन का मान बढ़ाया, समाज के हर वर्ग को साथ लेकर समानता का दीप जलाया। लेकिन जाति के संकरे नालों में पलने वाले खुले आकाश का अर्थ कहाँ जानेंगे, स्वयं को विश्लेषक क...
एक भूखा प्यासा मजदूर
कविता

एक भूखा प्यासा मजदूर

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** कामकाज में चतुर दक्ष एक भूखा प्यासा मजदूर निकला उपार्जन की तलाश में, सुबह से शाम तक घूमता फिरता रोजगार और काम की तलाश में, बस खड़ा चौराहे पर अपने औजार हथियार संग निरखकर कह रहा अंर्तमन में भूख से कराहता, बोला खुद से, भूखे पेट निकला हूँ मजदूरी करूं, उपार्जन करूँ बैचैन भूख से हूँ, सिर में चक्कर फिर भी काम के चक्कर में विश्राम कैसे करूँ, काम के तलाश में अडिग खड़ा हूँ, मिल जाये मेहनत की मजदूरी बस निकला हूँ भुख मिटा दूं,सबकी निकला हूँ काम से,घर घर काम करूं उपार्जन करूँ परिवार का पेट भरूँ खून पसीना बहाकर, दिनभर की थकावट में काम करूँ, भूखे बिलखते पीड़ित बच्चों का दुःख दर्द बस, दूर करूँ अचानक मजदूर की, दुर्दशा को देख स्वार्थी पूछकर, कहने लगा आधे पैसे ले लो, मजदूरी आधी ले लो निबटा दो समूचा काम, भूख त...
चलने को चलता हूँ
कविता

चलने को चलता हूँ

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** चलने को चलता हूँ, मगर धीरे-धीरे चलता हूँ। मंजिल की जल्दी नहीं मुझे, रास्तों को पढ़ता चलता हूँ। हर मोड़ पर रुक कर मैं, खुशबू को महसूस करता हूँ। पत्थरों की खुरदरी सतह को, छूकर मैं मुस्कुराता हूँ। दुनिया की इस दौड़-धूप में, मैं अपनी लय में जीता हूँ। थकान के गहरे साये में भी, सुख की बूँदें पीता हूँ। तेज़ चलने वाले निकल गए आगे, मैं पीछे रहकर ही सही, हर पल की सुंदरता को, अपनी आँखों में भरता हूँ। चलने को चलता हूँ, मगर धीरे-धीरे चलता हूँ। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का नाम : माया देवी जन्म दिनांक : १३/०७/१९९१ सम्प्रति : शिक्षक शिक्षा : दो बार स्नातकोत्तर, बीएड निवासी : गोरखाना तहस...
बात थोड़ी आपकी
ग़ज़ल

बात थोड़ी आपकी

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** बात थोड़ी आपकी भाती तो है। कुछ कवायद सच नज़र आती तो है। क्या हुआ वो पेड़ जिस पर फल नहीं, बैठकर कोयल वहाँ गाती तो है। इस शहर से उस शहर को जोड़ने, गाँव से होकर सड़क जाती तो है। चाहतों का हो न हो चाहे असर, देर मेंहदी रंग दिखलाती तो है। हो भले ही चाँद बादल में छुपा, आसमाँ पर रोशनी छाती तो है। लाख उसको भूलने की सोच लें, वो अदा फिर सामने आती तो है। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास : अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति : शिक्षक प्रकाशन : देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान : साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपन...
मानव और दानव
दोहा

मानव और दानव

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मानव दानव क्यों बने, सोचें सब यह बात। जगमग दिन खिलता रहे, कभी न हो फिर रात।। मानव मानव ही रहे, रीति-नीति हों संग। क्योंकर दानव बन मनुज, करे स्वयं से जंग।। मानव के तो संग हों, मानव के गुणधर्म। सदा सोच पावन रहे, मानव से ही कर्म।। दानव बनना पाप है, बहुत बड़ा अभिशाप। मानव मानव बन गहे, सदा मनुज का ताप।। मानव मानव-सा रहा, किंचित बने न क्रूर। यही कामना हो मनुज, दानवता से दूर।। मानव दानव क्यों बने, क्योंकर हो अवसान।। मानव करुणा धार ले, तो निश्चित उत्थान।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य शासकीय जेएमसी महिला महाविद्यालय प्रकाशि...
एक सैनिक का प्रेम
कविता

एक सैनिक का प्रेम

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* हाथों में यह कलम ना होती, निकलते न ये भाव, आंखें कभी ना रोती तन्हाई हमें यूं न चुभती यदि तुम मेरे पास होती आने वाला पल याद तुम्हारी लाता है जाने वाला पर टीस पीछे छोड़ जाता है जितना चाहा तुम्हें भूलना उतना ही तुम याद आती हो तुम्हें याद करने की जरूरत ना होती यदि तुम मेरे पास होती तुम्हें कुछ लिखना चाहा, जब भी मैंने भावों को शब्दों में ना बांध पाया दिल की आवाज सुन लेती आंखों की जुबान समझ लेती यदि तुम मेरे पास होती बाहों में तुझे ले लूँ, चाह ये बार-बार होती दामन में तेरे, सर रख रोता सिंदूर मांग में तेरी भर देता सोचते-सोचते दिन कितने गुजर गए हालत हमारी यूं ना होती यदि तुम मेरे पास होती।। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी ...
मिला दो राम से हनुमत
भजन

मिला दो राम से हनुमत

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** मिला दो राम से हनुमत, तेरा गुणगान गाएंगे। बताओगे जो भी युक्ति, उसे करके दिखाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... प्रभु आराध्य है तेरे, मेरे आराध्य तो तुम हो। कृपा जो राम की पाए, उसे क्या कर दुष्कर हो। तेरी भक्ति फलित होगी, तो प्रभु भक्ति को पाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... तुम्ही ने की कृपा सुग्रीव पर, तो राम को पाया। दिया सेवा का अवसर, और उसे भय मुक्त करवाया। तेरी करुणा कृपा से ही, तो दिल मेरा राम आएंगे। मिला दो राम से हनुमत... तेरे स्वामी की सेवा का, जो अवसर मैंने पाया है। तुम्ही से शक्ति लेकर के, उसे मैंने निभाया है। हैं जब तक प्राण तन में, हम तो यह सेवा निभाएंगे। मिला दो राम से हनुमत... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रच...
कंचन मृग छलता है अब भी
गीत

कंचन मृग छलता है अब भी

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** कंचन मृग छलता है अब भी, जीवन है संग्राम। उथल-पुथल आती जीवन में, डसती काली रात। जाल फेंकते नित्य शिकारी, देते अपनी घात।। चहक रहे बेताल असुर सब, संकट आठों याम। बजता डंका स्वार्थ निरंतर, महँगा है हर माल। असली बन नकली है बिकता, होता निष्ठुर काल।। पीर हृदय की बढ़ती जाती, तन होता नीलाम। आदमीयत की लाश ढो रहे, अपने काँधे लाद। झूठ बिके बाजारों में अब, छल दम्भी आबाद।। खाल ओढ़ते बेशर्मी की, विद्रोही बदनाम। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट माता : स्व. सुमित्रा पाठक पिता : स्व. हरि मोहन पाठक पुत्र : सौरभ भट्ट पुत्र वधू : डॉ. प्रीति भट्ट पौत्री : निहिरा, नैनिका सम्प्रति : सेवानिवृत्त जिला न्यायाधीश (मध्य प्रदेश), लोकायुक्त संभागीय सत...
मेरे पिता
कविता

मेरे पिता

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** मेरे लिए आन बान, शान है पिता धरती का साक्षात भगवान है पिता..!! सब रिश्तों का एक मिसाल है पिता अपनों के लिए बनते ढाल है पिता..!! छाले हो पांव में नहीं दिखाते है पिता कंधे पर बैठाकर भी घुमाते है पिता..!! पैरो पर खड़ा होना सिखाते है पिता सही, गलत का राह दिखाते है पिता..!! जिम्मेदारियों का बोझ उठाते है पिता गम सहकर खुद मुसकुराते है पिता..!! अपनो कि हर चाह पूरी करते है पिता दो में से दो रोटी देना जानते है पिता..!! भूखा रहकर बच्चों को खिलाते है पिता जिंदगी जीना बच्चों को सिखाते है पिता..!! डगमगाते कश्ती का खेवनहार है पिता बच्चों के लिए मानो पूरा संसार है पिता..!!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा य...
डिजिटल रिश्ते
कविता

डिजिटल रिश्ते

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** सोशल मीडिया पर आकर रख जाते दिल का हाल, पर जब कोई पूछे रिश्तों का सच, तो चुप हो जाते तत्काल। डिजिटल रिश्तेदार हजारों-लाखों में मिल जाएंगे, मगर अपने ही घर के रिश्ते अक्सर भूखे रह जाएंगे। मन हुआ तो स्टेटस देखा, लाइक किया, इमोजी भेज दिया, औपचारिकता की चादर ओढ़ स्नेह का कर्तव्य पूरा कर लिया। लगाव कब का खत्म हो चुका, बाकी नहीं बचा एक प्रतिशत, भावनाएं अब फाइलों जैसी, रिश्ते बन बैठे हैं डेटा-संचित। घर में कोई शुभ आयोजन हो, निमंत्रण जाए हर द्वार, कुछ लोग बेमन से आएंगे, निभाने भर को व्यवहार। खाया-पीया, सलाहें दीं, व्यवस्था पर टिप्पणी सुनाई, फिर यह कहकर चल देंगे- "घर में बहुत व्यस्तता भाई।" और जो कल तक निखट्टू थे, बदनाम थे जिनके नाम, वही शायद सबसे ज्यादा बताये घर में है अपना काम। रि...
पतझड़ जरूरी हैं
कविता

पतझड़ जरूरी हैं

प्रतिभा दुबे "आशी" ग्वालियर (मध्य प्रदेश) ******************** नई शाख़ों को आने के लिए, बसंत की बहार में नवीन, कोंपलों को खिलने के लिए...।। पतझड़ अंत नहीं मुक्ति है नवीन संचार के माध्यम से, प्रकृति की संरचना के फिर जीवंत हो उठने के लिए...।। पतझड़ भी ज़रूरी है फिर से बसंत आने के लिए क्योंकि चक्र यही चलता रहेगा मुरझाए मन को खिलाने के लिए...।। रौशनी जरूरी है... अंधकार को मिटाने के लिए जीवन यह क्षण भंगुर मात्र संतुष्टि जरूरी है यहाँ से जाने के लिए...।। तलाश करते रहे सुकून हम तलाशते रहे खुशियाँ मुस्कुराने के लिए ये पतझड़ एहसास दिलाता है एक जिंदगी काफी है मुस्कुराने के लिए...।। परिचय :-  श्रीमती प्रतिभा दुबे "आशी" (स्वतंत्र लेखिका) निवासी : ग्वालियर (मध्य प्रदेश) उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना...
खुद अपना हॉलमार्क बनिए
कविता

खुद अपना हॉलमार्क बनिए

सुषमा शुक्ला इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** खुद अपना हॉलमार्क बनिए, पहचान उधार न लीजिए, सत्य, श्रम और संस्कारों से जीवन का श्रृंगार कीजिए। भीड़ के पीछे चलने से व्यक्तित्व नहीं निखरता है, अपने कर्मों की चमक से ही हर चेहरा सँवरता है। सोने की शुद्धता जैसी हो मन की निर्मलता आपकी, ऐसी छाप छोड़ जाइए कि मिसाल बने हस्ती आपकी। आंधियाँ लाख आएँ पथ में, धैर्य कभी मत खोइए, अपने आदर्शों की ज्योति से हर अंधियारा धोइए। खुद अपना हॉलमार्क बनिए, यही सफलता का सार, चरित्र की खुशबू से महके जीवन का हर द्वार। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू...
सपने
कविता

सपने

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मैंने कभी संजोए सपने सपनों मे खो, खो कर कई महल ढहाए मैंने सपनों में बना, बना कर। आया कोइ दूर गगन से तारागणों का समूह कर गया आंगन को दिप्त मेरे समा गया पुनः सपनों में अंजली में पुन्ज उलिचा मैंने सपनों के दोने से गति प्रकाश की देखी मैंने कोसों, मीलों थी जो दूर मन बवरा उड, उड जाता गगन क्षितिज से दूर। ये पर्वतों की हरियाली ये वृक्षों की छाया शाख, शाख पर क्यों पुकारें पी, पी पपिहा गान। सपने में जो मन्जर देखा देखा स्वयं को चहकते हुए आंख खुली तो न था पर्वत ना ही उलिजा गया कोइ पुन्ज। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के ल...
योग करो
कविता

योग करो

आशा जाकड़ 'आस' इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** योग करो, योग करो, तन को रोग मुक्त करो। प्रातः उठ योगा करो, सारी बेचैनी दूर करो।। व्यायाम करने से मिलती है ऊर्जा स्फूर्ति। आध्यात्मिक, मानसिक व शारीरिक शक्ति। योग करने से रहता स्वस्थ तन-मन प्रसन्न। मन में अच्छे विचारों का होता है आगमन।। शुद्ध वायु मिले, प्रातः प्रतिदिन भ्रमण करो। पेड़ पौधे लगाओ, ऑक्सीजन प्राप्त करो।। योग हमारे जीवन का अच्छा सुलभ व्यायाम। प्रतिदिन करो अनुलोम, विलोम व प्राणायाम।। जीवन में यदि करोगे प्रतिदिन नियमित योग। कभी समीप न फटकेगा कोई चिंता या रोग।। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहित्यकार एवं समाजसेविका) शिक्षा - एम.ए. हिन्दी समाज शास्त्र बी.एड. जन्म स्थान - शिकोहाबाद (आगरा) निवासी - इंदौर (मध्य प्रदेश) व्यवसाय - सेन्ट पाल हा. सेकेंडरी स्कूल इन्दौर से सेवानिवृत्त शिक्षिका प्रकाशन कृति...
बहिनी
आंचलिक बोली, कविता

बहिनी

कामता साहू भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) सगा बरोबर दु दिन बर, मोर अंगना मा पाँव मड़ाथस।। दुख पीरा ल बिसरा के अपन, मया के गोठ गोठियाथस।। तोर आये ले घर दुवार हा, होरी, देवारी कस लागथे।। जइसे बसंत के आये ले, चिरई-चुरगुन मन चहकथे।। परिचय :- कामता साहू (शिक्षक) निवासी : भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़) सम्प्रति : शिक्षक घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी रचनाएँ प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर 98273 60360 पर सूचित अवश्य करें …...
जिनगी के रद्दा
आंचलिक बोली

जिनगी के रद्दा

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी - गीत)12 वो दिन बढ़ सुघ्घर हो जाथे, दाई के भुवना म जोत जंवारा लहराथे, चैत के महीना खुशहाली के नवा बिहान लाथे, फेर नवा बछर के अंजोर बगराही कोन? मोर जिनगी के रद्दा बताही कोन? महिना बैसाख के हमाथे। अक्ति के भंवर लइका मन पुतरी पुतरा के परवाथे, ऐसो के लगिन म मोरो लग जातिस, दाई अपन मन के बात बताते, कैसे समझावव मैं तोला वो दाई, बिना रोजगार मोला, अपन बेटी के हाथ धराही कोन? मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन? मुंधेरहा के घाम मंझनिया कस जनाथे, सुरुज नारायण तरवा म चढ़ जाथे, जब महिना जेठ के आते, जरत भोंभरा तीपत हे छानी, बूंद-बूंद पानी बर तरसत परानी, जल बिन सुन्ना हमर जिगानी, फेर जल संरक्षण में महत्तम ला बताही कोन ? मोर जिनगी के रद्दा दिखही कोन? पियासे भुंईया के जी जुड़ाथे जब महीना आषाढ़ संग बरखा आते, ...
पिता का फर्ज
कविता

पिता का फर्ज

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** पिता हूँ, पिता का दर्द जानता हूँ ! गम छिपाकर मुसकुराने का मर्म जानता हूँ..!! छाले हो पांव में कोई गम नहीं ! कंधे पर बैठाकर दुनिया घुमाना जानता हूँ..!! ना दे कोई मुझे नसीहत जीने का ! अच्छी जिंदगी जीने का हर राज जानता हूँ..!! जिम्मेदारियों ने जकड़ लिए है पर मेरे ! वरना ख्वाबों के शहर में उड़ना जानता हूँ..!! अपनों की खुशी और अपनों का प्यार ! लक्ष्य है पिता की जिंदगी का मैं भी जानता हूँ..!! जी रहे है हम भी बेहतर जिंदगी ! पर पिता हूँ, पिता का हर फर्ज जानता हूँ…!! परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं ...
सतगुरु चालीसा एवं आरती
चौपाई, दोहा

सतगुरु चालीसा एवं आरती

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** सतगुरु चालीसा -:दोहा:- गुरुवर की कर वंदना, नित्य झुकाऊँ माथ। प्रभु जी विनती आप से, रखना सिर पर हाथ।। -:चौपाई:- सतगुरु का जो वंदन करते। ज्ञान ज्योति निज जीवन भरते।।१ गुरू शिक्षा का तोड़ नहीं है। इससे सुंदर जोड़ नहीं है।।२ गुरु वंदन का शुभ दिन आया। सकल जगत का उर हर्षाया ।।३ गुरु चरणों में खुशियाँ बसतीं। सुरभित जीवन नदियाँ रसतीं।।४ गुरु दरिया में आप नहाओ। जीवन अपना स्वच्छ बनाओ।।५ गुरुवर जीवन साज सजाते। ठोंक-पीटकर ठोस बनाते।।६ पाठ पढ़ाते मर्यादा का। कष्ट मिटाते हर बाधा का।।७ गुरू कृपा सब पर बरसाते। समय-समय पर गले लगाते।।८ गुरुवर जीवन मर्म बताते। जीवन से अवरोध हटाते।।९ साहस शिक्षा गुरुवर देते। ज्ञान सीख उर में भर देते।।१० गुरू शिष्य का निर्मल नाता। जीवन को है सहज बनाता।।११ भेद-भा...
गुरुजनों की याद आती वाणी
कविता

गुरुजनों की याद आती वाणी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** बचपन में पढ़ते वक्त, गुरूजी रहते रोज साथ कहते थे, पढोगे मन से, जीवनभर रहेगी बातें याद।। गुरुजी के मुखारबिंद से निकलते है ज्ञान के अनमोल वचन, ज्ञान की घुंटी पिलाकर सुनते रहे गुरूवचन बचपन के दिन याद करें याद आते अनमोल वचन, बच्चो सदैव याद रखना अनमोल महानवचन, गुरुजन के आजीवन अनमोलवचन ये है सच्चे धन, आते है याद, कहते रहे गुरुजी, भूलना कभी नहीं ज्ञान की मूलबात, हमेशा संग रखना अनमोल बात अटके जब जीवन में जब कोई काज करना लेना गुरुजी की बातें दिल से याद, विपत्ति में गुरुदेव की हो न हो आती है कही बात की याद, कहते सदैव गुरुजी, माता पिता, गुरुजनों परिवारजनों कुटुम्बजनों, और आत्मीयजनों से सदैव बनाये रखो प्रेम सदभाव व्यवहार और रखना सदैव आपसी अपनापन, स्नेहप्यार, मुलाकात बनाये रखो ऐसे मजबूत रिश्ते, अनुभव...
विषधरों को पालते हैं
गीत

विषधरों को पालते हैं

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** विषधरों को पालते हैं, जो डुबोते प्रेम-बेड़े। आह भरती है गरीबी, और पैसा तन उधेड़े।। क्षीण होती आस है अब, गाज छाती पर गिरी है। प्रेम निष्ठा खो गयी सब, जेब स्वारथ से घिरी है।। बह रही तृष्णा हृदय में, काल के खाकर थपेड़े। जब चुनावी दौर आता, सैकड़ो उत्पात होते। चाल चलते हैं शकुनि- सी, नित नए आघात होते।। लालचों के शाल मिलते, जीत के फिर साथ पेड़े। कागजी अखबार निशदिन, खोलते दिन-रात पोलें। फिर धजी का साँप बनता, मूक बहरे बोल बोलें।। किस तरह सागर तरेंगे, जर्जरित नावों के बेड़े। चोंच लंबी मौत की है, रोग करता देख हमला। पैंतरा बदला सभी ने, हो रहा है नित्य घपला।। आपदा की ये सदी है, सुत पिता को हैं खदेड़े। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य प्रदेश) पति : पुरुषोत्तम भट्ट ...