Friday, March 20राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर आपका स्वागत है... अभी सम्पर्क करें ९८२७३६०३६०

पद्य

जुनून
कविता

जुनून

रश्मि नेगी पौड़ी (उत्तराखंड) ******************** जोश सा था, मेरे अंदर मेरा जोश, मेरा जुनून बन गया रास्ते में मेरे आई कई रुकावटें मेरे जुनून ने उनका डटकर सामना किया लाखों लोगों ने कोशिश की मेरे हौसलों को दबाने की मेरे जुनून ने मेरे हौसलों को दबने न दिया जोश सा था, मेरे अंदर मेरा जोश, मेरा जुनून बन गया हुई कभी हताश, हुई कभी परेशान मेरे जुनून ने मुझे व्यर्थ की चिंता त्यागने को कहा लाख चाहा कुछ लोगों ने मुझे गिराना, मेरे जूनून ने मुझे गिरने न दिया जोश सा था, मेरे अंदर मेरा जोश, मेरा जुनून बन गया हुई जब भी मैं निर्बल, मेरा जुनून साथी बनकर मेरे साथ रहा न होने दिया निराश, न होने दिया उदास हमेशा मुझे आगे बढ़ने को प्रेरित किया कैसे करूं मैं धन्यवाद उस जुनून का, जिसने हर कदम पर मेरा साथ दिया जोश सा था, मेरे अंदर मेरा जोश, मेरा जुनून बन गया परिचय : रश्मि नेगी निवासी : पौड़ी उत्तराखंड शिक्षा : ए...
पायल छनक गई
गीत

पायल छनक गई

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** बहुत संभाले रखा मगर अवसर क्या पाया, चंचल मना वो बावली पायल छनक गई।। मैं नहीं चाहती मन के, पट धड़कन खोले, मैं नहीं चाहती पायल, की रुनझुन बोले। मैं नहीं चाहती सोचो, में हो खलल कोई, मैं नहीं चाहती प्रीतम, का तन मन डोले।। पर क्या करती पग फिसला, बेबस हुए कदम, सागर लहराया अखियां, मेरी छलक गई। बहुत संभाले रखा मगर अवसर क्या पाया, चंचल मना वो बावली पायल छनक गई।। वो मेरी ही यादों में शायद खोए थे, मनहर वो ख्वाब मिलन के कई संजोए थे। मैं खुशियों की सौगातें लेकर आई थी, सावन प्यासे अधरों पर साजन बोए थे।। तड़पी थी मैं आलिंगन, में उस पल उनके, दिल बहका मेरा मेरी, सांसें महक गई। बहुत संभाले रखा मगर अवसर क्या पाया, चंचल मना वो बावली पायल छनक गई।। यूं दर्ज समय के पृष्ठों पर पल हुए विकल, मन में थी मीठी दोनों तरफ बहुत हलचल। बातें होती थी आंखों की तब आं...
अपने हिस्से की भूख
कविता

अपने हिस्से की भूख

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** परहित में जीना है बड़ा, हित में जाता गला सूख, दूसरे को नहीं दे सकता अपने हिस्से आई भूख। भूख सभी को लगती है, जिसने जन्म यहां लिया, पर भूख खत्म हो जाये, भलाई नामक रस पिया। कैसी विडंबना इस जग, शांत नहीं हो जन भूख, हड़प लेते हैं निर्धन का, उल्टे सीधे रखता रसूख। निज भूख जो कम माने, दूसरे की भूख माने अति, पुण्य कर्म में जीवन बीते, जग में हो उसकी सद्गति। गरीब को भूख लगती है, कोई पूछता नहीं है हाल, कितने निर्धन चले गये हैं, जग से काल के ही गाल। खाने की भूख नहीं लगे, धन दौलत पर यूं मरते हैं, अमीर लोग बात अजब, भोजन खाने से डरते हैं। भूख के रूप अनेकों होते, बिन भूख के मिलते कम, भूख देखते गरीब जन की, आँखें खुद हो जाती नम। नहीं मिट सकती इस जहां, भूख अजब निराली होती, कुछ को रोटी भूख सताये, कुछ को भूख हो हीरे मोती। नहीं बाट सकता कोई यहां...
माँ तारा
कविता

माँ तारा

ओमप्रकाश सिंह चंपारण (बिहार) ******************** तू हो समर्पिता, अर्पिता तू हो सृष्टि की मूल बिंदु तुम्ही हो। माँ तू हो अनय की सृंखला बनी तू हो भोग की ग्रहिका बनी। तू हो धरा पर अर्चिता, गर्विता अनादि अनन्त तू विभु सम्पन हो। प्रचंड मार्तण्ड की सुप्त किरणों से तू शशि सम्पन्न धरा करती हो। माँ तू मनु की सतरूपा अनादि अभिन हो जब भी धारा पर गहन अंध छाता है मां तू महा ज्योति प्रभा बनकर आती मां तारा तू अनादि अनन्त हो मातेश्वरी तू प्रीति संपन्न हो पुरुरवा की मेनका रमभा तुम्हीं हो साहचर्य सहगामनी सत्य सनातनी हो महाभोगनी फिर भी योगिनी हो कुंडलिनी सर्पनी तू महआभैरवी हो धधकती चिताय महाश्मशान में जीवन की नश्वरता चिंता की रेखाएं। जीवन की कोलाहल में मृत्यु की निरव शांति में मातेश्वरी तारा तुम्ही छुपी हो। इस जीवन की संध्या में मां तू अपूर्व लालिमा हो। परिचय :- ओमप्रकाश सिंह (शिक्षक मध्य विद्यालय ...
ऋतुराज बसंत में
कविता

ऋतुराज बसंत में

मनोरमा पंत महू जिला इंदौर म.प्र. ******************** बसंत में शब्द भी रंग जाते हैं, बाँसती रंग में, दिन चढते चढते आ जाते तरंग में महक उठते हैं, मौलसिरी की गंध से, साँसों में बस जाते हैंं छंदों के अनुराग से एक एक अक्षर बदल जाता मधुमास में, टेसू के फूल बन बिखर जाते पी के संदेश में मन के भाव उमड़ जाते, कोयल की तान में, छलक जाते आँसू बन विहरणी के दर्द में, कानों में रस घोलते संवेगो के आवेग से, बिखर बिखर पत्तो से रचते स्वर्णिम विहान रह रह मचल जाते, करते कविता का अभिसार परिचय :-  श्रीमती मनोरमा पंत सेवानिवृत : शिक्षिका, केन्द्रीय विद्यालय भोपाल निवासी : महू जिला इंदौर सदस्या : लेखिका संघ भोपाल जागरण, कर्मवीर, तथा अक्षरा में प्रकाशित लघुकथा, लेख तथा कविताऐ उद्घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानिय...
फैशन
गीत

फैशन

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** फैशन का यह दौर सुहाना लगता है। अच्छा खासा मर्द जनाना लगता है। पल भर में कैसे बदलते है नक़्शे। अब तो हर लड़का शबाना लगता है। फैशन का यह दौर सुहाना लगता है। अच्छा खासा मर्द जनाना लगता है।। कैसे कैसे वो परिधान को पहनता है। और कैसा कैसा करता है अपना श्रृंगार। फर्क समझा आता नहीं है इसमें लोगो को। कौन नर और कौन मादा है सही में। अब तो फैशन से बहुत डर लगता है। अच्छा खासा मर्द जनाना लगता है।। नाक-कान छिदवाकर वो बालो को बढ़ता है। पहनकर नारी परिधान आकर्षित करता है। बहुत गजब का आजकल का ये फैशन है। तभी तो अच्छा खासा मर्द जनाना लगता है।। फैशन का यह दौर सुहाना लगता है। अच्छा खासा मर्द जनाना लगता है।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैनेजर के पद पर क...
भारत माँ का वंदन
कविता

भारत माँ का वंदन

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, म.प्र. ******************** अंधकार में हम साहस के, दीप जलाते हैं। आज़ादी के मधुर तराने, नित हम गाते हैं।। चंद्रगुप्त की धरती है यह, वीर शिवा की आन है राणाओं की शौर्यभूमि यह, पोरस का सम्मान है संविधान है मान हमारा, जन-जन का अरमान है भारत माँ का वंदन है यह, जन-गण-मन का गान है वतनपरस्ती तो गहना है, हृदय सजाते हैं। आज़ादी के मधुर तराने, नित हम गाते हैं।। शीश कटा,क़ुर्बानी देकर, जिनने फर्ज़ निभाया अपने हाथों से अपना ही, जिनने कफ़न सजाया अंग्रेज़ों से लोहा लेने, जिनने त्याग दिखाया अधरों पर माता की जय थी, नित जयगान सुनाया हँस-हँसकर जो फाँसी झूले, वे नित भाते हैं। आज़ादी के मधुर तराने, नित हम गाते हैं।। सिसक रही थी माता जिस क्षण, तब जो आगे आए राजगुरू, सुखदेव, भगतसिंह, बिस्मिल जो कहलाए जिनका वंदन, अभिनंदन है, जो अवतारी थे सच में थे जो आग...
महाशिवरात्रि
गीत, भजन

महाशिवरात्रि

विरेन्द्र कुमार यादव गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) ******************** चलो भक्तों शिव के शिवाले, शिवलिग पर जल चढ़ाले। शिव शंभू को मनाने शिवाले चले, चलो सभी चले जल चढ़ाने चले। चलो भोले बाबा को मनाने चले, शिवलिग पर सभी जल चढ़ाने चले। गंगधारी बम भोले को मनाने चले, चलो भोले भंडारी को मनाने चले। मस्ती में झूमते गाते नंगे पैर चले, चलो भक्तों त्रिपुरारी के धाम चले। सुबह चले, दोपहर चले और शाम चले, हम शिव-भक्त लगातार झूमते चले। आओ चले जटाधारी को मनाने चले, जब निकले, भोले का ही नाम निकले। भक्तों चले भोले-बाबा को मनाने चले, झूमते-गाते हम शिव के शिवाले चले। औघड़दानी को, भोले को मनाने चले, चलो शिव-भक्तों हम जल चढ़ाने चले। त्रिपुरारी, त्रिशूलधारी को मनाने चले, चलो भक्तों शिवाले जल चढ़ाने चले। परिचय :- विरेन्द्र कुमार यादव निवासी : गौरा बस्ती (उत्तर-प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह ...
उठो नारी तुम्हें अब उठाना होगा
कविता

उठो नारी तुम्हें अब उठाना होगा

सपना दिल्ली ************* उठो नारी तुम्हें अब उठाना होगा नारी क्यों तू हारी तोड़ चुप्पी अपनी आवाज़ उठानी होगी बहुत सह लिया तुमने अब नहीं सहेगी बहुत जिया अपनों के लिए तुम्हें अब अपने लिए भी जीना होगा.... देखा जाएगा जो भी होगा यह ख़ुद को सिखा री ख़ुद को न समझ तू कमज़ोर बिना तेरे सृष्टि का अस्तित्व मिट्टी में मिल जाएगा ज़ोर से कह, मचा शोर दुर्गा भी तू चंडी भी तू ममता की मूरत भी तुझसे री ... इस धोखे में न रहना तू तेरी लाज़ बचाने को कृष्ण बन कोई आएगा तुझे बचाएगा बन काली  अपनी लाज़ ख़ुद ही बचानी होगी विश्वास कर तू सब कुछ करने जोगी और न बन बावरी.... रुकना नहीं, झुकना नहीं तोड़ विवशताओं के बंधन सारे बस आगे ही बढ़ते जाना है अपनी मंज़िल को पाना है कर  ख़ुद पर  यकीन अपने सपनों को कर नवीन अपना सम्मान तुम्हें पाना होगा अपना गीत गाना होगा दूसरों के लिए ही तो जीती रही हो अब तक ख़ुद के लिए अब जीना होगा देखा जाएगा...
काहे का अभिमान रे मानव
कविता

काहे का अभिमान रे मानव

ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) धवारी सतना (मध्य प्रदेश) ******************** काहे का अभिमान रे मानव, काहे का अभिमान। जल्दी ही है होने वाला इस माया का अवसान, रे मानव, इस माया का अवसान।। क्या अभिमान करे है तू, इस तन, मन और यौवन का। पर तुझको कैसे ज्ञान नही, नश्वरता मय इस जीवन का।। कितने आये राजा महाराजा, कितने आये साधू सन्त। क्या कभी बचा वे पाये खुद को क्या नही हुआ है उनका अंत।। या दौलत की बात करे तू यह भी तो है कितनी चंचल। कितनी भी अकूत सम्पदा, पर कभी रहे न स्थिर, अचल।। केवल तेरे कर्म हैं सच्चे, और सभी के प्रति अपनापन। इससे ही तू करले प्रेम, यही है तेरा जीवन धन।। अतः बचा ले इनको तू, और इन्हीं का रख तू ध्यान। और अपने तन और अपने धन का, कभी न करना तू अभिमान।। परिचय :- ममता श्रवण अग्रवाल (अपराजिता) निवासी - धवारी सतना (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सु...
भगवान शिव
कविता

भगवान शिव

रूपेश कुमार (चैनपुर बिहार) ******************** जहाँ सारा दुनिया जिसकी शरण मे, नमन है उस भगवान शिव के चरण मे, हम बने उस महाकाल के चरणों की धूल, आओ हम-सब मिल कर चढ़ाये उनके चरणों में श्रद्धा के फूल! महाकाल की हमेशा बनी रहे मुझ पर छाया, पलट दे मेरी किस्मत की काया, मिले मुझको सब कुछ इस दुनिया में हमेशा, जो कभी किसी को न मिल पाया इस जीवन में! महाकाल जब आएंगे मेरे द्वार, मेरे जीवन के गोद में भर देंगे सारी खुशियां, कभी रहे न जीवन में मेरे दुखः-दर्द, मेरे चारों तरफ हमेशा हो जाए सुख ही सुख! प्रभु शिव का नारा लगा कर हम, सारी दुनिया में हो गए हैं प्यारे-न्यारे, मेरे दुश्मन भी मुझसे बार-बार बोले, मेरे प्यारे भगवान महाकाल के भक्त हो गए हो तुम सबसे न्यारे! परिचय :- रूपेश कुमार शिक्षा - स्नाकोतर भौतिकी, इसाई धर्म (डीपलोमा), ए.डी.सी.ए (कम्युटर), बी.एड (महात्मा ज्योतिबा फुले रोहिलखंड यू...
छत्रपति  श्री शिवराया
कविता

छत्रपति श्री शिवराया

धैर्यशील येवले इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** गतिहीन राष्ट्र को जो दे गति वो शिवराया है वो छत्रपति।। जीजा माता के संस्कार से दूर रहा जो सदा विकार से स्वामी समर्थ का रहा आशीर्वाद कोंडोबा की शिक्षा निर्विवाद लिए स्वराज का स्वप्न वो भगवा है जिसकी संस्कृति वो शिवराय है वो छत्रपति।। हिंदवी का जो सागरमाथा है पराक्रम शौर्य की महागाथा है सुरक्षित रखा जिसने हिंदुत्व राष्ट्र निर्माण का किया कर्तुत्व माँ तुलजा के आशीर्वाद से भवानी में रही धार और गति वो शिवराया है वो छत्रपति।। नर केसरी तानाजी की आन बाजी प्रभु के प्राणों की शान विधर्मी को घर मे घुस मारा डूबते सनातन को उसने तारा आगरा के परकोटे रोक न पाये जिसके व्यक्तित्व में वो गति वो शिवराया है वो छत्रपति।। शत-शत नमन हे पितृपुरुष निर्भय हो घूम रहे स्त्रीपुरुष अगर न होता आपका पराक्रम नष्ट हो जाता सनातन धर्म समरसता के महायज्ञ में जिसने दी ...
रश्मियां भोर की।
कविता

रश्मियां भोर की।

मित्रा शर्मा महू, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** सुबह की लाली धरा पर उतर रही बसंत की उमंग भर रही रश्मियां भोर की। पीले पीले सरसों के खेत महक रहे ओस की बूंद चमक रहीं पत्ता-पत्ता सौंदर्यमय हो रहा उन्मुक्त हवा बह रही चारों ओर फागुन के गीत गुनगुनाने लगी रश्मियां भोर की। गुदगुदाने लगी सताने लगी याद प्रियतम की भ्रमर को बुलाने लगी रश्मियां भोर की। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिये, अणु डाक करने के बाद हमे हमारे नंबर ९८२७३ ६०३६० पर सूचित अवश्य करें …🙏🏻 आप...
मेरी बेटी
कविता

मेरी बेटी

आनंद यादव पुर्णिया (बिहार) ******************** यूंही छुप-छुप के जो आंसू बहाए, उनसा मत बनना, मेरी बेटी... जमाने के डगर पे तुम नहीं चलना ! जमाना ये डराएगा, जमाना रंग दिखाएगा, हां करना सामना, इस छली दुनिया से नही डरना ! जमाने में मिलेंगे कई तुमको रोकने वाले, जमाने में, मिलेंगे कई तुमको टोकने वाले, नहीं रुकना नही थमना नहीं तुम कभी भी झुकना मेरी बेटी... तुम अंतिम सांस तक, उस गगन तक बढ़ना ! मेरी बेटी, क्या कहते हैं सभी सोचा नहीं करते, मेरी बेटी, फरिश्तों पर, भरोसा नहीं करते, जमाने में यही वो लोग है, जो पीठ सहलाते, मगर तुम याद रखना वक्त पर धोखा यही करते ! प्रखर जो रवि सा हो, तेज खुद में वैसा तुम भरना जिसका नाम ले हो चौड़ा सीना, काम वो करना ; मेरी बेटी, जमाना बुरा है, बस युक्ति से चलना मेरी बेटी.. जो आंचल साफ है, मत मैला तुम करना ! मेरी बेटी जमाने के डगर पे तुम नहीं चलना, जमाना ये डराएगा, मगर...
आंख के हर आंसू की, अपनी एक अलग कहानी है
गीत

आंख के हर आंसू की, अपनी एक अलग कहानी है

हंसराज गुप्ता जयपुर (राजस्थान) ******************** गीता रामायण वेद महावीर, गुरु ग्रंथ कबीर की वाणी है, खोना पाना आना जाना, यह जीवन बहता पानी है, संग रहने, सुख दुख सहने की, कहने की रीत पुरानी है, आंख के हर आंसू की, अपनी एक अलग कहानी है !१! हार जीत खुशी आघात प्रीत, जो शब्द नहीं कह पाते हैं, भाव भरे निज आंखों से, गिरते आंसू कह जाते हैं, टप टप गिरते आंसू ही, उस पल की अमिट निशानी है, आंख के हर आंसू की, अपनी एक अलग कहानी है !२! बिना मां के बच्चों की व्यथा, कितनी मायें बन जाती हैं, सौतेली मां चाची ताई, मौके पर काम ना आती हैं, सब जानते हो तुम श्याम प्रभु, क्या छुपी है, जो समझानी है, आंख के हर आंसू की, अपनी एक अलग कहानी है !३! भूखे मां-बाप का दर्द नहीं, वे भोजन बांटने जाते हैं, माँ के दूध की शर्म नहीं, कुत्ते बिल्ली को दूध पिलाते हैं, अपमान पी आशीष दें जो, वे ...
जंग इसी को कहते हैं
कविता

जंग इसी को कहते हैं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* मेरी बात पर गौर देकर कहना कुछ लोगों का है कहना मीडिया भी यही कहता और दिखाता है की सेना ने कई सालों से जंग नहीं देखी है। कोई इनकों लेकर आये और जम्मू कश्मीर तथा सीमांत का दौरा कराये जहां पर हजारों की गिनती मे सैनिक घायल होते है जो आंतकवादियो और देश द्रोहियों से लड़ते हैं। इनके परिवार गम के आसूं पीते है मुसीबत और तंगी की जिंदगी जीते हैं और दोस्तों आप कहां रहते हैं शायद जंग इसी को कहते हैं। आइये आपको सियाचिन की सैर कराये बर्फ से ढके हुए पर्वत व नदियाँ दिखाये जहाँ का तापमान माइनस ४० डिग्री सेल्सियस है क्या आप जानते हैं ? लेकिन हमारा सैनिक यहां पर निरंतर रहता है और दुश्मन की गोलियों को अपने सीने पर सहता है इनमें से आधे तो सर्दी का शिकार हो जाते है सीमा से अंदर न आ जाये दुश्मन इसलिए कई तो अपने हाथ या पैर गंवाते है शायद जं...
तेरे ही सपने आते हैं
गीत

तेरे ही सपने आते हैं

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** रात दिवस सोते जगते बस, तेरे ही सपने आते हैं। तू क्या रूठी रूठ गए सब, नैना सावन बरसाते हैं।। तेरी आदत पड़ी हुई है, पीछा नहीं छुड़ा पाता हूँ। पलपल-पगपग पर तेरे ही, साए से मैं बतियाता हूँ।। अधर लिए पर अमृत तेरे, मुझे दूर से तरसाते हैं। तू क्या रूठी रूठ गए सब, नैना सावन बरसाते हैं।। अभी यहां थी, अभी वहां थी, मन कैसे समझाऊं अपना। छलिया वक्त छल गया मुझको, चैन कहां से लाऊं अपना।। पीछे दौड़ न नश्वर जीवन, के नश्वर पल समझाते हैं। तू क्या रूठी रूठ गए सब, नैना सावन बरसाते हैं।। ख्वाबों में तू राह बताती, जो चाहे वो करवाती है। जिस्म भले दो होकर रह लें, जान जुदा कब हो पाती है।। यादों के बादल आ आकर, के दिश-दिश से टकराते हैं, तू क्या रूठी रूठ गए सब, नैना सावन बरसाते हैं।। कहां छुपाऊं मैं पागलपन, तुझे देखती आंखें मेरी। मेरी आंखों में तुझको पा, खोज ...
नाजुक उम्र है तुम्हारी
कविता

नाजुक उम्र है तुम्हारी

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सूरत मनमोहक प्यारी, आगे बढऩे की तैयारी, देवजन की राजदुलारी, नाजुक उम्र है तुम्हारी। सदा आगे यूं ही बढऩा, अच्छे से तुम यूं पढऩा, बस यही दुआ हमारी, नाजुक उम्र है तुम्हारी। पढ़ लिख आगे बढऩा, परहित के करना काम, आएगा एक दिन ऐसा, होगा पूरे जगत में नाम। मां बाप का करो नाम, जन कीमत एक छदाम, आनंद से घर में रहना, घर होता है सुंदर धाम। सुख दुख आए जीवन, डगमग जब करे नैया, उस प्रभु का रख याद, वो ही है जगत खेवैया। बिछुड़ जाए सारे साथी, यादें बन आती बाराती, बस आगे यूं ही बढऩा, चाहे ना हो घोड़े हाथी। सच की है राह कठिन, सुख नहीं दुख ही गिन, बनेगी तब जग पहचान, यूं बनना है तुम्हें महान। देंगे दगा जगत के लोग, पाप कर्म लगते हैं भोग, चुगली चाटा बुरे कहाते, कैंसर भांति होते ये रोग। जाना हो धरती से कभी, रो रोकर आंसू बहे सभी, ऐसा दिन जब भी आये, मान...
नारी का निश्चय
गीत

नारी का निश्चय

संजय जैन मुंबई (महाराष्ट्र) ******************** गिरती रही उठती रही फिर भी चलती रही। कदम डग मगाए मगर पर धीरे धीरे चलती रही। और मंजिल पाने के लिया खुदसे ही संघर्ष करती रही। और अपने इरादो से कभी पीछे नहीं हटी।। गिरती रही उठती रही...।। ठोकरे खाकर ही मैं दुनियां को समझ पाई हूँ। हर किसी पर विश्वास का फल भी भोगी हूँ। लूट लेते हैं अपने ही अपने बनकर अपनो को। क्योंकि गैरो में कहाँ इतनी दम होती है।। गिरती रही उठती रही..।। दुनियांदारी का अर्थ तभी समझ आता है। जब कोई विश्वास अपना अपनो का तोड़ देता हैं। और अपने फायदे के लिए अपनो को ही डस लेता है। फिर इंसानियत की दुहाई देकर खुदको महान बना लेता है खुदको महान बना लेता है।। गिरती रही उठती रही फिर भी चलती रही..।। परिचय :- बीना (मध्यप्रदेश) के निवासी संजय जैन वर्तमान में मुम्बई में कार्यरत हैं। करीब २५ वर्ष से बम्बई में पब्लिक लिमिटेड कंपनी में मैन...
तिरंगे के खातिर
कविता

तिरंगे के खातिर

रवि यादव कोटा (राजस्थान) ******************** जहाँ तिरंगे के खातिर वो सूली पर, चढ़ जाते हैं, जहाँ तिरंगे की खातिर, हंसते-हंसते मर जाते हैं, जहाँ तिरंगे के खातिर, जीवन अर्पण कर जाते है, जहां तिरंगे की खातिर भारत, दर्पण बन जाते हैं, उसी तिरंगे का भारत में, ऐसा हालात बना देखो, कहीं जलाकर फेंका है, ऐसा आघात करा दे, रोते होंगे राजगुरु, सुखदेव भगतसिंह आंखों से, जिनके लिए दिया जीवन, जलते देखा उन हाथों से, भगत सिंह कहते है....... हमने उसके लिए सदा, माँ-बाप को पीछे छोड़ा है, इसकी आजादी के हित, अपनों से चेहरा मोड़ा है, भूखे प्यासे रहकर भी, शोणित से नित श्रंगार किया, खुद हुए चुपचाप मगर, अपने हिस्से का प्यार दिया, परिवार हमारे भी थे, गर सोच बनाते जीवन में, छोड़ के आजादी सपना, गर मौज बढ़ाते जीवन में, गुलाम दासता जीते फिर, ऐसा आबाद नहीं होता, गर सोच जो ऐसी रखते तो, भारत आजाद नही होता।। परिचय - रवि ...
आलोक
कविता

आलोक

जया आर्य भोपाल म.प्र. ******************** बुझा हुआ है दिल का कोना आलोकित उसको कर दें, वक्त फागुनी आ गया है दिल का दिया जला ले। खोलें खिड़की और दरवाज़े खुली हवा में जी लें, वक्त फागुनी आ गया है मन आलोकित कर लें। सूरज ने भी किरण बिखेरी कीट पतंगे झूमे ईश्वर ने दुनिया रच डाला हम सब संग संग जी लें। नहीं भरोसा है राहों का अगले पल क्या होगा, जीवन के इस पगडंडी को हम आलोकित कर दें। परिचय - जया आर्य जन्म : १७ मई १९४७ निवासी : भोपाल म.प्र. शिक्षा : तमिल भाषी अंग्रेज़ी में एमए. उपलब्धि : ग्रेड १, हिंदी उदघोषक आकाशवाणी मुम्बई, जगदलपुर और भोपाल में कार्यरत। अध्यक्ष शांतिनिकेतन महिला कल्याण समिति। प्रख्यात उद्घोषिका होते हुए उभरते हुए उदघोषकों को प्रशिक्षित किया। जेलों में कैदियों पढ़ने लिखने हेतु प्रेरित किया, जेल मंत्री से सम्मानित। झुग्गी इलाकों में ९५० महिलाओं और बच्चो को साक्षर व्यावसायिक प्रशिक्ष...
सृष्टि की जननी
कविता

सृष्टि की जननी

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हो! पंचतत्व की वाहिनी तो, इस सृष्टि की जननी भी तुम, हर भाव समाहित हैं तुझमें, नव रसों की पोषनी भी तुम... बहता हैं निर्मल आब तुझमे, (वात्सल्य भाव) मन पुलकित हैं सुन रागिनी, (लोरी/ममत्व) हर ताप छूपा उर में महकी, (सहनशीलता ) थिरकी बन कभी तु मोरनी... (अर्पण/समर्पण) सप्त रंगों की तूलिका तुम, (निपूर्णता) उकेरे आँगन बनी दामिनी, (प्रगतिशील) स्याह हुआ, छाया तम तो, (मुसीबत) खिली बन तू फिर चाँदनी... (सृजनशील) नारी हो! या प्रकृति हो तुम, तू ही अवनि, तू ही जननी, कृति अंनत की, सबसे सुंदर, तुम ही हो, वो जीवनदायिनी... परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि र...
औरत की परिभाषा
कविता

औरत की परिभाषा

डॉ. मिनाक्षी अनुराग डालके मनावर जिला धार (मध्य प्रदेश) ******************** ऊंचे ऊंचे सपनों की उड़ान भरती है कभी डरती है कभी सहम् सी जाती हैं जीवन जीने का जो तरीका सिखाती है मुश्किलों में भी आशाओं का जो दीपक जलाएं रखती हैं यही नारी की परिभाषा कहलाती है.... मान सम्मान की जो हकदार होती हैं यह दुनिया जिसकी कर्जदार होती है कठिन मार्ग पर भी जो हंस के गुजरती हैं हर इच्छा को अपना जुनून बनाती हैं यही नारी की परिभाषा कहलाती है नारी है तो दो कुलों की शान है नारी से ही घर की रौनक हैं नारी ही अभिमान है नदी के दो छोरो को जो जोड़ना जानती है यही नारी की परिभाषा कहलाती है परिचय : डाॅ. मिनाक्षी अनुराग डालके निवासी : मनावर जिला धार मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने...
महिला दिवस
कविता

महिला दिवस

मधु टाक इंदौर मध्य प्रदेश ******************** "नारी रिश्तों की गरिमा है" मौन को जो शब्द दे सके ऐसी मुखरित वाणी है।। समूचे समंदर को एक बूंद में समाहित करना ही महिला दिवस की सार्थकता है नारी ईश्वर प्रदत्त एक नायाब तोहफ़ा है जगत नियंता द्वारा रचित नारी मात्र शब्द नहीं है झांसी की रानी लक्ष्मी बाई है नारी रानी पद्मनी के जौहर की पीड़ा है नारी राजपूताना गौरव पन्ना धाय है नारी असहाय देवकी की करूण गाथा है नारी नारी संसार है जगत जननी है नारी तीरथ है नारी मोक्ष है मैं इस मंच से यह विचार रखना चाहूँगी कि ईश्वर को भी धरा पर जब अवतरित होना होता है तो उसे भी नारी की कोख का सहारा लेना पड़ता है।। "आज महिला स्वविवेक से चुनौतियों को स्वीकार कर चौखट से चाँद तक जा पहुँची है" हर मौसम की बहार है नारी गुणों को बीच कचनार है नारी तन मन को जो कर दे शीतल मेघों से छलकी फुहार है नारी फूलो...
महिलाएं क्या चाहती हैं।
कविता

महिलाएं क्या चाहती हैं।

प्रीति शर्मा "असीम" सोलन हिमाचल प्रदेश ******************** महिलाएं तो बस सम्मान चाहती है। बदलें में हर रिश्ते से, फर्ज निभाती हुई भी जब अपमान ही पाती है। महिलाएं तो बस सम्मान चाहती है।। शक्ति स्तंभ होते हुए भी, समर्पित कर देती हैं खुद को। वह प्रेम में कहां.... कोई व्यापार चाहती हैं। महिलाएं तो बस सम्मान चाहती हैं। बेटियां पराई है। बहू भी पराई है। वह अपने होने का एक अलग एहसास चाहती हैं। महिलाएं तो बस सम्मान चाहती हैं। ना देह से आंकी जाए। ना वस्तु समझ कर जांची जाए। जो सृजक है पूरे संसार की, अपने संसार का अधिकार चाहती हैं। महिलाएं तो बस सम्मान चाहती हैं।। परिचय :- प्रीति शर्मा "असीम" निवासी - सोलन हिमाचल प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने प...