समाज की धुरी
मालती खलतकर
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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वह झुकती है हरदम झुकती है
कहीं कचरा विनती कहीं गोबर व टोरती
कहीं लकड़ी छिलती कहीं लकड़ी उठाती
कहीं घन चलाती कहीं शिशु पीठ पर बांध थी
वह झुकती है तो सभी उसे और झुकाने
अवसर ढूंढते हैं
वह झुकती है क्योंकि वह नारी है
उसे संज्ञा अबला की है
वह अक्सर दिखती आंखों में आंसू लिए
आंचल में शिशू ढाके सिर पर बोझ लिए
वह जाती दिखाई देती है खेतों नदियों किनारे
पगडंडी पर शराबियों से खुद को बचाती
वह झुकती है झूला झूलते टोकनी उठाते
उपले थापती वह झुकती कमान कि तरह
ऊपर उठ पुनः तार-तार होने के लिए
पुनः धरा पर जाने की हिम्मत जुटाने के लिए
वह है झुकती है समाज परिवार के लिए
क्योंकि वह जानती है वह झुकेगी
तो परिवार समाज झुकेगा सुदृढ बनेगा
कहीं सहारा कंधे का कहीं लकड़ी का
कहीं चौखट पर चंडी बनकर खड़ी
मैंने उसे देखा है आंखों में डर लिए
अपने आप को छुपाते हुए
दीवार दी...

























