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पद्य

जब से जली है इस अँधेरे, उर कुटी में वर्तिका…
गीतिका

जब से जली है इस अँधेरे, उर कुटी में वर्तिका…

भीमराव झरबड़े 'जीवन' बैतूल मध्य प्रदेश ******************** जब से जली है इस अँधेरे, उर कुटी में वर्तिका। नव पुष्पदल से सज गई है, प्रीत की हर वीथिका।।१ इस मन मरुस्थल में तृषा की, शेष है अब भी तड़प, आ मानसूनी मेह ने पल, में खिला दी मल्लिका।।२ गाने लगा है मन भ्रमर भी, गीत अब तो फागुनी, परिधान पुष्पों के पहन कर, आ गई जो वाटिका।।३ जब कोकिला ने कंठ में स्वर, भर दिए है काव्य के, नव छंद से नैना लड़ाने, चल पड़ी अब गीतिका।।४ जो तारिका मधु चूसने में, मग्न थी तन पुष्प से, इस गृहनगर की बन गई वह, आजकल संचालिका।।५ कुछ बिंब के तिनके लिए निज, नीड़ जो बुनती बया, उस छंद के नव नीड़ में नित, गुनगुनाती सारिका।।६ यह कृष्ण'जीवन' मग्न है बस, शारदे के द्वार पर, इस लेखनी ने राधिका बन, मन बनाया द्वारिका।।७ परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन' निवासी- बैतूल मध्य प्रदेश घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह ...
भूख
कविता

भूख

सूरज सिंह राजपूत जमशेदपुर, झारखंड ******************** मुझे बेशक गुनहगार लिखना साथ लिखना मेरे गुनाह, हक की रोटी छीनना। मैंने मांगा था, किंतु, मिला तो बस, अपमान, संदेश, उपदेश, उपहास, और बहुत कुछ। जिद भूख की थी, वह मरती मेरे मरने के बाद। इन, अपमानो, संदेशों, उपदेशो, उपहासो, से पेट न भरा, गुनाह न करता तो मर जाता मैं, मेरे भूख से पहले। मुझे बेशक गुनहगार लिखना लिखना, मैं गुनहगार था, या बना दिया गया। हो सके तो, लिखना, उस कलम की, मक्कारी, असंवेदना, चाटुकारिता, जिसकी नजर पड़ी थी, मुझ पर मेरे गुनाहगार बनने से पहले लेकिन, उसने लिखा मुझे, गुनहगार बनने के बाद। परिचय : सूरज सिंह राजपूत निवासी : जमशेदपुर, झारखंड सम्प्रति : संपादक- राष्ट्रीय चेतना पत्रिका, मीडिया प्रभारी- अखिल भारतीय साहित्य परिषद जमशेदपुर घोषणा : मैं सूरज सिंह राजपूत यह घोषित करता हूं...
आंखें बोलती है
कविता

आंखें बोलती है

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** मुंह से ज्यादा आंखें बोलती है दिल के सारे राज खोलती है किसी के प्रति उमड़ती है घृणा किसी के प्रति होता है प्यार आंख हर चीज बयां करती है मेरे यार उनकी आंखों की गहराई हम आज तक नाप न पाये जितना अंदर जाने की कोशिश की इसका कोई अंत न पाये आंखें काली या भूरी इन आंखों के बिना दुनियाँ है अघूरी किसी को दुखी देखकर भर आती है आंखें आंसुओं को समेटकर लाती है आंखें तुम्हारी आंखों से ज्यादा नशा नहीं मिलता मयखाने में बस तू मेरी हो जाय फिर क्या रखा है जमाने में आंखें हमारी होती है सपने किसी और के होते है किसी के प्यार में अक्सर हम यूं ही खोये होते है परिचय : डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" निवासी : चिनार-२ ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करता हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलि...
नया साल
कविता

नया साल

रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** चलो फिर से एक नया साल आ गया उम्मीदें जगाने जैसे ख्वाब आ गया गुजरे हुए कल का जवाब आ गया ये साल कैसा होगा ये सवाल आ गया गये साल में जो नाकाम हुये थे उनके लिए उम्मीदों का सैलाब आ गया वक्त की मार से जो लहू-लुहान है उनके लिए जैसे ईलाज आ गया दो वक्त की रोटी जिनको नहीं नसीब जैसे पुराना वैसा नया साल आ गया रुपयों और पैसों का बिछौना हो जहाँ जैसा पुराना वैसा नया साल आ गया जिसका जैसा दिन था वैसा साल आ गया नया कुछ नहीं फिर भी नया साल आ गया लिखा है जो किस्मत में वो मिलेगा 'सुकून' नये साल का तो बस नाम आ गया चलो फिर से एक नया साल आ गया उम्मीदें जगाने जैसे ख्व़ाब आ गया परिचय : रश्मि श्रीवास्तव “सुकून” निवासी : मुक्तनगर, पदमनाभपुर दुर्ग (छत्तीसगढ़) घोषणा : मैं यह शपथ पूर्वक घोषणा करती हूँ कि उपरोक्त रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी ...
वो हमारी ज़िन्दगी में
ग़ज़ल

वो हमारी ज़िन्दगी में

शरद जोशी "शलभ" धार (म.प्र.) ******************** वो हमारी ज़िन्दगी में इस तरह छाने लगे। दिल किया उनके हवाले वो हमें भाने लगे।। हमने मिलने के लिए उनको बुलाया था यहाँ। हम यहाँ आए अभी हैं और वो जाने लगे।। हो गई वाबस्तगी कुछ ऐसी है उनसे हमें वो तसव्वुर में हमारे हर घड़ी आने लगे।। भूल बैठे हैं हमें वो इक ज़रासी बात पर। एक हम हैं जो उन्हीं के गीत बस गाने लगे।। होसले जिनके कभी होते नहीं मज़बूत हैं। सिर्फ़ आहट से ही ऐसे लोग घबराने लगे।। शायरी का इल्म जिनको है नहीं कुछ भी मगर। वो ग़ज़ल पढ़ने के ख़ातिर मंच पर जाने लगे।। बढ़ गए आगे 'शलभ' कुछ लोग झूठी चाल से। बेइमानी से वो अब सम्मान भी पाने लगे।। परिचय :- धार (म.प्र.) निवासी शरद जोशी "शलभ" कवि एवंं गीतकार हैं। विधा- कविता, गीत, ग़ज़ल। प्राप्त सम्मान-पुरस्कार- राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान ...
किसान का हाल
कविता

किसान का हाल

संजय जैन मुंबई ******************** सारे देश को जो अन्न देता खुद लेकिन भूखा सोता। फिर भी किसी से कुछ कभी नहीं वो कहता। क्या हालत कर दी उनकी देश की सरकार ने। कठ पुतली सरकार बन बैठी देश के पूंजीपतियों की। तभी उसे समझ न आ रही तकलीफे खेतिहर किसानो की।। सारे देश को जो अन्न देता खुद लेकिन भूखा सोता..।। जब भी विपत्ति देश पर आती अपना सब कुछ वो लगा देते है। भले ही तन पर न हो कपड़ा पर खेत को बोता है। सब कुछ गिरवी रख देता पर फर्ज न अपना भूलता। और सभी की भूख को खुद भूखा रहकर मिटता। ऐसे होते है अपने देश के सारे ये किसानगण।। सारे देश को जो अन्न देता खुद लेकिन भूखा सोता..।। बहिन बेटी और बीबी के सारे गहने रख जाते है। लाला साहूकार के पास और कभी-२ भूमि भी गिरवी रखी जाती किसान की। और नहीं छोड़ता हल चलाना अपने वो खेतो में। और छोड़ता देता अपने खेतो को ईश्वर के आशीष पर। फिर चाहे कुछ भी पैदा हो उस ईश्वर की...
भारतीय नववर्ष
दोहा

भारतीय नववर्ष

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** नवल किरण धारण किए, आया है नववर्ष। सदा सहायक हों प्रभो, बना रहे उत्कर्ष।। नवल वर्ष में माँ करो, हम सबका कल्याण। हरो सकल संताप-दुख, हों हर्षित मन-प्राण।। आई विपदा अब टले, भागें सारे रोग। हिल-मिल कर हम सब रहें, बना रहे संयोग।। संकट भारी आ पड़ा, सकल विश्व है त्रस्त। कोरोना की मार से, सभी हुए भय- ग्रस्त।। नवल वर्ष की माँ मिले, यह अनुपम सौगात। हम सब मिल कर दे सकें, कोरोना को मात।। करो दया हे मातु अब, सब जन हों खुशहाल। हाथ पसारे हैं खड़े, माता तेरे लाल।। परिचय : रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' उपनाम :- 'चंद्रिका' पिता :- श्री रामचंद्र गुप्ता माता - श्रीमती रामदुलारी गुप्ता पति :- श्री संजय गुप्ता जन्मतिथि व निवास स्थान :- १६ जुलाई १९६७, तहज़ीब व नवाबों का शहर लखनऊ की सरज़मीं शिक्षा :- एम.ए.- (राजनीति शास्त्र) बीएड व्यवसाय :- गृहणी प्रकाशन :- रा...
नया वर्ष मुबारक हो
कविता

नया वर्ष मुबारक हो

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** नये वर्ष का नया सूर्य यूं किरणे नई बिखेरे। गमके अंधियारे मिट जाएं खुशियां डाले डेरे।। सुख सागर में जीवन नौका बढे निरंतर आगे। बगियामें गुल खिलने वाले रहें न कोई अभागे।। समृद्धि की अमर बेल फिर जीवन पे छा जाये। फिरअभावकी असि नकोई जख्मकभी देपाये।। नूतन स्वर सुख के फूटे कानों में अमृत घोलें। जीवन कानन में अवसर के मोर पपीहे बोलें।। प्यारमिले सागर से गहरा मीत मिले सुखदायी। दूर रहे तन मन से दर्दों की काली परछाई।। इतनीमिले संपदा निशदिन घर छोटापड़ जाये। पांव उठानेसे पहले मंजिल चलकर खुद आये।। नवगतिनवलय अवचेतन मनको करदें स्पंदित। मनवीणा की मधुररागिनी तनकरदेआल्हादित।। आराधन करते करते आराध्य बने आराधक। फर्क मिटे दोनों में दाता कौन, कौन है याचक।। पीकर अमर प्रेम की हाला देह अमर हो जाये। जीवन मरण चक्र से जीवन ऊपर हो मुस्काये।। परिचय :- अख्तर अली ...
सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में
कविता

सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** तन में हो उत्साह और आशाएँ मन में। सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में। बाधाओं से हार न मानें। पथ की कठिनाई पहचानें। आवश्यकताओं को जानें। जो करना है मन में ठानें। विजय पताका फहराएं फिर नील गगन में। सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में। कवच सुरक्षा का हो सक्षम। रहें नहीं आशंका या भ्रम। न हो आक्रमण कोई निर्मम। चाहे कैसा भी हो मौसम। रहें सुरक्षित सभी विश्व रूपी उपवन में। सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में। हो कोई धनवान या निर्धन। आबादी हो या हो कानन। बाहर हो अथवा घर-आँगन। करें सभी नियमों का पालन। रहें मनुज सब अपने-अपने अनुशासन में। सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में। नारी हो अथवा वह नर हो। सतत् सत्य ही का सहचर हो। जो अंदर हो वह बाहर हो। सदा ध्यान में परमेश्वर हो। नित्य आचरण में, वचनों में अथवा मन में। सकारात्मक सोच रहे सबके जीवन में। भावशून्यता ...
नागरिक की अभिलाषा
कविता

नागरिक की अभिलाषा

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** अखबारों में न हो कोई सनसनीखेज खबर टी वी चैनलों पर न हो अनावश्यक मुद्दों पर निरर्थक बहस। हर सवार चलता रहे रोड पर नियमानुसार बाएं पैदल चले फुटपाथ पर सायकल दौड़े उसके ट्रेक पर हो खड़े रेहड़ी ठेले वाले अपने नियत स्थान पर निगम कर्मी ट्रैफिक कर्मी हो सच्चे जन सेवक नागरिक करे उनका अभिवादन हस हस। नेताजी के कार्यक्रम न हो सड़क पर न मने भाई साहब का जन्मदिन सड़क पर न हो दुल्हेराजा कि बारात हावी सड़क पर बे वजह न बजाए कोई हॉर्न कचरा न फेंके सड़क पर खाके पॉपकॉर्न हो जाये बंद दस बजे रात्रि में बजता जो डीजे ज्यास्ति में शहर के हर कोने में हो अनुशासन के दरस हर कोई बोल पड़े वाह वाह बरबस। सरकारी कार्यालय हो सुविधा के साथ सहयोग पूर्ण नागरिको का कार्य हो चुटकियों में पूर्ण सुशासन का सपना हो सम्पूर्ण हर हाथ को काम हो हर पेट मे अन्न हो बुझे सभी की प्यास जन जन की बस य...
अमर शब्द
कविता

अमर शब्द

अमोघ अग्रवाल गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) ******************** एक घर घर का एक कमरा कमरे की दीवार दीवार जिस पर टंगी है एक बड़ी तस्वीर तस्वीर में कोई मानव नहीं बस चार शब्द दिख रहे है जिसमें लिखने वाले ने लिखा है शब्द अमर रहेंगे इंतज़ार परिचय :- अमोघ अग्रवाल साहित्यिक नाम : "इंतज़ार" पिता : स्व. बी. के. अग्रवाल माता : श्रीमती आशा अग्रवाल जन्म : ०५ सितंबर १९९१ निवासी : गढ़ाकोटा, सागर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.ई. कार्यरत : निजी व्यवसाय लेखन : शांत, करुण, श्रृंगार रस, कविता, कहानी, हाइकू, टांका और अन्य सम्मान : "शतकवीर" सम्मान, "काव्य कृष्ण" सम्मान, निरंतर १२ घंटे काव्य में सम्मान, राष्ट्र कवि गुरु सत्त नारायण सत्तन जी द्वारा दो बार सम्मानित। रंजनकलश इंदौर ईकाई मीडिया प्रभारी, कई पत्र पत्रिकाओं में रचना प्रकाशित। और अन्य सम्मान। साहित्यिक गतिविधियां : वर्ष २०१२ से ...
वे सब नारी थीं
कविता

वे सब नारी थीं

मित्रा शर्मा महू - इंदौर ******************** वे सब नारी थीं फिर भी मर्दानी कहलाई कभी लक्ष्मीबाई कभी दुर्गावती के रूप में शत्रुओं को मुँह की खिलाई। तलवार लेकर खड़ी हो गई कोई भय उसे बाँध न पाया रणचंडी कहो या दुर्गा कहो कोई राक्षस बच न पाया। पन्ना धाय बन जन्मी तो पुत्र का बलिदान किया कोई क्या उससे छीनता पद्मावती ने जौहर किया। स्वतंत्रता की वीरांगना चलती रही बलि पथ पर गाती रही आग के गीत लाठी गोली से ना घबराई। भारत भूमि की वीर बेटियाँ आसमान से टक्कर लेती हैं आंधी, तूफान से खेलती देश की आन पर मरती हैं। परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल) आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, ह...
हिलोरे ले रहा हर्ष… आया नववर्ष…
कविता

हिलोरे ले रहा हर्ष… आया नववर्ष…

प्रियंका पाराशर भीलवाडा (राजस्थान) ******************** आया नववर्ष हिलोरे ले रहा हर्ष जो बीत गया कुछ खास नहीं अब कुछ अच्छा होने की आस नई कुछ दूर हुए तो कुछ है पास बीता कल है यादों का एहसास कुछ बिगड़ा तो कुछ गया सँवर फिर से सुख दुःख का वही भँवर नए वर्ष के नए संकल्प योजनाओं के कई विकल्प आकांक्षाओं की तुलना में समय है अल्प नववर्ष की नई सुबह मन के सारे विवादों की सुलह नये साल के आगमन पर मुरझाया मन भी जाए खिल क्योंकि समय तो है परिवर्तनशील नववर्ष का प्रथम दिवस जैसे सूखी धरती पर पावस जीवन में भर आए मधुरस सी मिठास आगाज है नए साल का पाए फतह हर क्षेत्र मे कमाल का नववर्ष का प्रथम प्रभात लाए सर्व जन के लिए खुशियों की सौगात नववर्ष का है हार्दिक अभिनंदन स्वागत परिचय :- प्रियंका पाराशर शिक्षा : एम.एस.सी (सूचना प्रौद्योगिकी) पिता : राजेन्द्र पाराशर पति : पंकज पाराशर निवासी : भीलवाडा (राजस्थान)...
दिलों में रहने का रास्ता ढूंढ
कविता

दिलों में रहने का रास्ता ढूंढ

कालूराम अर्जुन सिंह अहिरवार ग्राम जगमेरी तह. बैरसिया (भोपाल) ******************** दिलों में रहने का रास्ता ढूंढ पास तो पराए भी बैठ जाते हैं खुशबू बनकर कर महक ने की कोशिश कर फूल तो कागज के भी खिल जाते हैं ताउम्र साथ चलने की कोशिश कर हमसफ़र एक मिल चलने वाले तो हजारों मिल जाते हैं दो कदम चल कर मंजिल तक पहुंच मुश्किलों से हार कर बैठे जाने वाले तो हजारों मिल जाते किताबों से दिल लगा कर देखो यार लोग तो दिल लगाने वाले लाखो मिल जाते हैं अपने सपनों को पूरा कर सपने देखने वाले तो हजारों मिल जाएंगे प्रकृति की तरह कुछ देना सीख बाहे फैलाकर लेने वाले तो हजारों मिल जाएंगे स्वयं खुश रहकर औरों को हंसाने की कोशिश कर बेवजह रुलाने वाले तो हजारों मिल जाते हैं खुशबू बनकर महक गुलाब की तरह फूल तो कागज के भी खिल जाते हैं हो सके तो सच्चा प्यार कर साथी बेवजह धोखा देने वाले तो लाखों मिल जाते नदी की तरह ताउम्र चल मु...
सत्कर्म
कविता

सत्कर्म

रेखा दवे "विशाखा" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** द्वन्द भरे इस जीवन में, कुछ पाया, कुछ ना पाया। जो पाया वह प्रसाद बना, ना पाया वह अवसाद बना। द्वन्द भरे इस जीवन में, कुछ पाया, कुछ ना पाया। कभी राग मिला, कभी विराग मिला। कभी जीत मिली, कभी हार मिली। जब जीत मिली तब प्रीति मिली। जब हार मिली, तब रिक्त रही। जब रिक्त रही, तब सत्कर्मो कि सुध मिली। जब सुध मिली, तब दृढ हुई। दृढ़ हुई, संकल्प लिए। संकल्प लिए, कटिबद्ध हुई। सत्कर्म को स्वीकार किया। स्वीकार किया, सत्कर्म किये। यही जीवन का आधार बने। आधार बने, अविराम रहे। अविराम रहे, अनुराग बढ़े। अनुराग बढ़े, आनंद मिले। आनंद जीवन का ध्येय बने। द्वन्द भरे इस जीवन में, कुछ पाया, कुछ ना पाया। परिचय :- श्रीमती रेखा दवे "विशाखा" शिक्षा : एम.कॉम. (लेखांकन) एम.ए. (प्राचीन इतिहास एवं अर्थ शास्त्र) निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) वर्तमान में : श्री माधव ...
सलाम लिखता है शायर तुझे
कविता

सलाम लिखता है शायर तुझे

होशियार सिंह यादव महेंद्रगढ़ हरियाणा ******************** सलाम लिखता है शायर तुझे, तुम्हारे हौसले रखेंगे सदा याद, महामारी २०२० की झेली मार, फिर भी ना की कोई फरियाद। सलाम लिखता है शायर तुझे, युद्ध के नायक तुम कहाते हो, दुश्मन का सीना तुमने चीरा है, तुम दुश्मन का खून बहाते हो। सलाम लिखता है शायर तुझे, तुमने काव्य लिख डाला बड़ा, सुनकर दुश्मन हौसले है पस्त, दुश्मन के इरादे हुये है ध्वस्त। सलाम लिखता है शायर तुझे, तुम्हारी मेहनत रंग लाई जगत, कोरोना की खोज डाली दवाई, कितने लोगों की जान बचाई। सलाम लिखता है शायर तुझे, तुमने जन में अलख वो जगाई, दिन रात सेवा कर की भलाई, भूखे नंगों की कई जान बचाई। सलाम लिखता है शायर तुझे, युद्ध में तुमने न पीठ दिखाई, मारे दुश्मन एक एक हजारों, दिखा डाली जग की सच्चाई। सलाम लिखता है शायर तुझे, खेतों में करता रहता है काम, मेहनत के आगे कायल नाम, किसान को मिले सच्...
पास होकर भी आशकार नहीं
ग़ज़ल

पास होकर भी आशकार नहीं

नवीन माथुर पंचोली अमझेरा धार म.प्र. ******************** पास होकर भी आशकार नहीं। जिंदगी तुझ सा राज़दार नहीं। तेरा वुजूद है सब यहाँ लेक़िन, ख़ास तेरा किसी से प्यार नहीं। जितनी मर्जी तेरी, सफ़र तेरा, तुझपे साँसों का इख़्तियार नहीं। जिस जगह तू शुमार रहती है, कोई उस हद के आर-पार नहीं। वक़्त के साथ ही रज़ा तेरी, इसलिए तेरा एतबार नहीं। परिचय :- नवीन माथुर पंचोली निवास - अमझेरा धार म.प्र. सम्प्रति - शिक्षक प्रकाशन - देश की विभिन्न पत्रिकाओं में गजलों का नियमित प्रकाशन, तीन ग़ज़ल सन्ग्रह प्रकाशित। सम्मान - साहित्य गुंजन, शब्द प्रवाह, राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान घोषणा पत्र : प्रमाणित किया जाता है कि रचना पूर्णतः मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प्रकाशित करवा सकते है...
नववर्ष पर ‘रजनी’ के दोहे
दोहा

नववर्ष पर ‘रजनी’ के दोहे

रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्रिका' लखनऊ ******************** १ स्वागत नूतन वर्ष का, भले विदेशी चाल। वसुधा ही परिवार है, रहें सभी खुशहाल।। २ बदल गया है साल फिर, मत बदलो तुम यार। संग तुम्हारे ही बँधी, जीवन की पतवार।। ३ देते रहना तुम पिया, साथ साल दर साल। मिले तुम्हारे संग में, खुशी मुझे हर हाल।। ४ नए साल में कर रही, प्रियतम यह मनुहार। बाँह तुम्हारी थाम कर, करूँ प्रेम विस्तार।। ५ नवल वर्ष में माँ करो, हम सबका कल्याण। हरो सकल संताप- दुख, हर्षित हों मन-प्राण।। ६ आई विपदा अब टले, भागें सारे रोग। हिल- मिल कर हम सब रहें, बना रहे संयोग।। ७ संकट भारी आ पड़ा, सकल विश्व है त्रस्त। कोरोना की मार से, सभी हुए भय-ग्रस्त।। ८ नवल वर्ष की अब मिले, यह अनुपम सौगात। हम सब मिल कर दे सकें, कोरोना को मात।। ९ करो दया अब मातु तुम, सब जन हों खुशहाल। हाथ पसारे हैं खड़े, माता तेरे लाल।। परिचय : रजनी गुप्ता 'पूनम चंद्र...
यह जिन्दगी है जनाब
कविता

यह जिन्दगी है जनाब

रमेश चौधरी पाली (राजस्थान) ******************** यह जिन्दगी है जनाब, ऐसे ही नहीं महकेगी, इन फूलों की खुशबू से फूलों की खुशबू से, महक सकता है वातावरण पर जिंदगी तो महकेगी इन काटो की सूलो से, यह जिन्दगी है जनाब तन मन को प्रसन्न कर देगे, यह फूलो की सुंदरता पर जिंदगी को प्रसन्न नहीं कर पाएंगे यह फूलो की कोमलता यह जिंदगी है जनाब इसे फूलों की शया से नहीं सवारी जा सकती है, इन्हें तो काटो की शया से सजाना होगा, यह जिन्दगी है जनाब, कभी तो खुशियां समाई नहीं जाती, कभी तो खुशियां मनाई नहीं जाती, यह जिन्दगी है जनाब, झाड़े की रजाई छोड़ के, सूर्य की गर्मी तोड़ के, खड़े हो जावो अपने सपनों पर, जब तक ना झुको तब तक सपने अपने न हो जाएं। यह जिन्दगी है जनाब, कभी अपनों की तनहाई सताएगी कभी इश्क के लम्हें तड़पपाएंगे, यह जिन्दगी है जनाब, यह रीट के ख़्वाब बोहत बड़े है, इसे पाने के लिए बोहत खड़े है, छोड़ दो अपनी...
वर्ष २०२०- कुछ खोया, कुछ पाया
कविता

वर्ष २०२०- कुछ खोया, कुछ पाया

श्रीमती विभा पांडेय पुणे, (महाराष्ट्र) ******************** वर्ष २०२०- कुछ खोया, कुछ पाया। कहते हैं बड़ा बुरा था ये साल। लोग घरों में बंद, आवाजाही पर, पार्टी पर, घूमने-घुमाने पर व्यर्थ के दिखावे में बर्बाद होती जिंदगानी पर रोक। यार ऐसे भी कोई जीता है? सच में बड़ा बुरा था ये साल। सच में बुरा तो था पर गरीबों के लिए, यतीमों के लिए उन रोज कमाकर खाने वालों के लिए। क्योंकि रोजगार बंद, रोजगार के साधन बंद। जिंदगी उनकी उलझकर रह गई थी। लेकिन सच पूछिए तो यही वह साल भी था जब परिंदे जी भर कर बिना डर आसमान में उड़े। न धुआं, न शोर। पशु भी आदमी नामक प्राणी से कुछ समय के लिए मुक्ति पाए। प्रकृति ने नई दुल्हन-सा श्रृंगार किया। नदियां नहाई, स्वच्छ हुई। पेड़-पौधे जैसे नवजीवन पाए, धरा ने फिर अपना धवल रूप धरा। मनुष्य भी मनुष्य के करीब आया, न जाने कितने हाथों ने दूसरों के घर आशा का दीप जलाया। घर गुलज़ार हुए, ...
विनती
कविता

विनती

डॉ. पंकजवासिनी पटना (बिहार) ******************** ओ नववर्ष! है तुझसे ये इल्तिजा... करना तुम ये दिल से दुआएँ : नववर्ष में समूल मिटे कोरोना! मिले सबको हर्ष अपार!! मिटें सारे कल्मष-तम-अंधकार! मिटें सबके क्लेश दुख औ मनोविकार!! और हो सबका सर्वतोभावेन उत्कर्ष!!! सूखे पपराते होठों पर भी आए मुस्कान औ तरावट! दुखियों और गरीबों की झोली भी भरी हो खुशियों के खनकते सिक्कों से!! धानी संग पिया बिताए कुछ जज्बाती पल! दिनभर टकटकी लगाए बूढ़े मांँ-बाप संग... गुजारे बेटे-बहुएंँ कुछ खुशनुमा लम्हें!! आदमी का आदमी पर बढता जाए विश्वास! न तोड़े कोई पीड़ितों के मन की सुख-आस! भोली आंँखों से कोई छीन न ले पावन-उजास!! महामारी के वैश्विक घोंसले सारे जाएँ उजड़... अनैतिकता औ घृणा सब मन के जाएँ समूल उखड़... मिटे चहुँओर फैली हिंसा-प्रतिहिंसा ... मिटे दुर्भावना व्यभिचार का हर मनसूबा! हिलें छल-वैमनस्य की सब चूलें! ईर्ष्या-प...
आ अब लौट चले …
कविता

आ अब लौट चले …

निर्मल कुमार पीरिया इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** ना शेष रहा कहने सुनने को, क्यो व्यर्थ ठिठौली करते हो ? गर जाना ही था दुर समय से, क्यो पल पल जीते मरते हो ? हर पग पर बिछते स्वप्न मेरे, क्यो राह कंटीली करते हो ? चुन रहा नादा था कंकर पत्थर, क्यो बाण शब्द से भेदते हो ? था हिमशिखर-सा मौन ओढ़े, बन रविकर क्यों बिखराते हो ? हिम विचरता अपने जल में ही, तत्वों को क्या पृथक कर पाते हो? श्रद्धा-भक्ति-तप और मुक्ति, जीव दर्शन किसको समझाते हो ? प्रेम-तृषा प्रथम जग में प्रियवर, पुर्ण आहुति विलय तभी पाते हो... परिचय :- निर्मल कुमार पीरिया शिक्षा : बी.एस. एम्.ए सम्प्रति : मैनेजर कमर्शियल व्हीकल लि. निवासी : इंदौर, (म.प्र.) शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौलिक, स्वरचित और अप्रकाशित हैं आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं फोटो के साथ प...
सुख के नगमे ही गाए हैं
गीत

सुख के नगमे ही गाए हैं

अख्तर अली शाह "अनन्त" नीमच ******************** जीवन लक्ष्य रखा आंखों में हमने बस, इसीलिए सुख के नगमे ही गाए हैं। वक्त चाल से अपनी ही चलता हरपल, हमको तो बस अपने फर्ज निभाने थे। जैसा आया मौसम भोग लिया हमने, आलस ने पर ढूंढे कई बहाने थे।। अपने मन का होतो सुख ना हो तो दुख, मन पर अंकुश ने ही सुख बरसाए हैं। जीवन लक्ष्य रखा आंखों में हमने बस, इसीलिए सुख के नगमे ही गए हैं।। अलविदा बीस, इक्कीस विदाई देता है, नहीं शिकायत तुमसे तुम इतिहास बने। याद करेंगे लोग तुम्हें ना भूलेंगे, वे सारे तुम जिनके खातिर खास बने।। कुछ व्यक्ति भगवान बने जीवन देकर, कुछ ने सेवा कर जीवन उजलाए हैं। जीवन लक्ष्य रखा आंखों में हमने बस, इसीलिए सुख के नगमे ही गए हैं।। घर में रहकर जीने का आनंद लिया, छोड़ी भागम भाग तो राहत पाई है। काम "अनंत" दूसरों के आए तब ही, दूर गई दु:ख दर्दो की परछाई है।। जनहित से जो भटक गए रहबर अपने,...
आगंतुक
कविता

आगंतुक

धैर्यशील येवले इंदौर (म.प्र.) ******************** आइए श्रीमान आशा करते है आप वैसे न होंगे जैसे बिता साल था वो साक्षात काल था। आपसे हमे बस इतना चाहिए सुख, शांति, सद्बुद्धि सहयोग, उन्नति के साथ भाईचारा चाहिए। मत लाना अपने साथ राग, द्वेष, ईर्ष्या, क्रोध जगाए जो मन मे वितृष्णा का बोध। पवन स्वच्छ हो धरती उगले सोना समय पर आए ऋतुएँ प्रकृति का संतुलन रहे बना । माना कि हम स्वार्थी व उदण्ड है मिल चुका हमे कर्मो का दण्ड है। कण-कण में जीवन हो हर आत्मा पावन हो सभी के सामने भरी थाली हो चंहु और खुशहाली हो हर हाथ कर्मशील हो हर व्यक्ति धैर्यशील हो नूतन वर्ष स्वागत, वंदन, अभिनंदन तुम्हारा, छोटी सी आशा करना पूरी ह्रदय खंडित न करना हमारा। परिचय :- धैर्यशील येवले जन्म : ३१ अगस्त १९६३ शिक्षा : एम कॉम सेवासदन महाविद्याल बुरहानपुर म. प्र. से सम्प्रति : १९८७ बैच के सीधी भर्ती के पुलिस उप निरीक्षक वर्तमान म...
आया नूतन वर्ष
कविता

आया नूतन वर्ष

रशीद अहमद शेख 'रशीद' इंदौर म.प्र. ******************** भला मनाए कोई कैसे, दुखद समय में हर्ष। गया नहीं कोरोना जग से, आया नूतन वर्ष। लाखों लोग हुए हैं पीड़ित, लाखों गए सिधार। लाखों कारोबार हुए ठप, लाखों हैं बेकार। अवरोधित हो गया धरा पर, सभी ओर उत्कर्ष। गया नहीं कोरोना जग से, आया नूतन वर्ष। वैक्सीन की खोज हो रही, विविध चल रहे शोध। मास्क और नियम पालन का, सबसे है अनुरोध। महारोग से विश्व कर रहा, अविरल है संघर्ष। गया नहीं कोरोना जग से, आया नूतन वर्ष। कैसे प्रेषित करें बधाई, कैसे हो सुखगान। तन-मन दोनों मलिन हुए हैं, खड़े कई व्यवधान। कोरोना से हुआ जगत में, कहाँ नहीं अपकर्ष। गया नहीं कोरोना जग से, आया नूतनवर्ष। परिचय -  रशीद अहमद शेख 'रशीद' साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद’ जन्मतिथि~ ०१/०४/१९५१ जन्म स्थान ~ महू ज़िला इन्दौर (म•प्र•) भाषा ज्ञान ~ हिन्दी, अंग्रेज़ी, उर्दू, संस्कृत शिक्षा ~ एम• ए• (हिन्द...