धूप छांव आते हैं
रमेशचंद्र शर्मा
इंदौर मध्य प्रदेश
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धूप छांव आते हैं !
पूरा असर दिखाते हैं !.. धूप छांव
मुट्ठी रेत उठाई हैं,
प्यास भी बुझाई हैं,
मृगतृष्णा नचाती हैं,
भ्रम जाल बिछाती हैं,
सूरज बनकर दावानल
कभी दिन-रात जलाते हैं !... धूप छांव
समय चक्र चलता है,
मानव मन छलता है,
सुख दुख का डेरा है,
राग द्वेष का घेरा है,
काल नियंता सबको
नियंत्रित धूरी घुमाते हैं !... धूप छांव
अनिश्चय सब फैला है,
दो दिनों का मेला है,
छल छिद्र भरे पड़े हैं,
हानि लाभ अटे पड़े हैं,
जिजीविषा के फेरे में
सब अपना दांव लगाते हैं !... धूप छांव
कर्म प्रधान माना है,
धर्म महान जाना है,
पुण्य सदा साथ चलेंगे,
बाकी सारे हाथ मलेंगे,
पाप संताप के झमेले में
सब सपना नया सजाते हैं !... धूप छांव
परिचय : रमेशचंद्र शर्मा
निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
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