विरह का सावन
सूर्यपाल नामदेव "चंचल"
जयपुर (राजस्थान)
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घनघोर घटा और कारी बदरिया सावन बरस ही जाए
भीगे बदन मोरा मन भी भीगे मिलन अगन लगी जाए
छाए बदरवा न आए सजनवा सूखी अंखियां बहती जाए
सावन की झड़ी दिल ऐसे पड़ी याद सताए बस तू नहीं आए।
खामोश तनहा बैठी रही तेरा इंतजार आंखों में लिए
बारिश की झड़ी मिलन की कशक अब बढ़ा देगी
तस्वीर लिए दिल में थी तेरी विरह वेदना दबाने के लिए
क्यू आज फिर लगा कि सावन की बूंदे दर्द को जगा देगी
बारिश की फुहार मुकम्मल थी अश्क छुपाने के लिए,
सैलाब जो बने दरिया का रंज ओ गम ही बहा देगी।
बनके हमराज रस्में निभाई थी सारी वफ़ा के लिए,
क्यों आज फिर लगा कि तेरी मोहब्बत रुला देगी।
रिमझिम झड़ी ही काफी थी हूक उठाने के लिए,
छा जाए सावन तो आग जुदाई की ही जला देगी।
जज्बातों की तस्वीर जो उकेरी तेरे इश्क के लिए,
क्यों आज फिर लगा कि मेरी तन्हाई दबा देगी।
परिच...
























