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पद्य

नमन उन शहीदों को …
कविता

नमन उन शहीदों को …

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भारत आजाद कराने, दीवानों की वो टोली चली थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। न जाने कितने परवानों ने, सीने पर खाई गोली थी, मन में अडिग संकल्प लिए, उन्होंने ही क्रांति जगाई थी। इतिहास के पन्नों में पढ़ लेना, आजादी जिनकी दीवानी थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। माँ भारती की मुक्ति को, वीरों ने हँसकर कुर्बानी दी थी, कोई कैसे कह दे हमको, केवल अहिंसा से आजादी मिली थी? हाँ यह भी पढ़ना, कितनी 'लक्ष्मी' रणचंडी बन लड़ी थीं, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। स्वातंत्र्य-यज्ञ की वेदी पर, कितनी ही माँओं की गोद सूनी थी, न जाने कितनी बहनों ने, अपनी राखी वाली कलाई खोई थी। खदेड़ दिया फिरंगियों को, जमकर धूल चटाई थी, आजादी की किताबों से, हमने बस सुनी कहानी थी। जह...
रूप चाँदनी भा रही
दोहा

रूप चाँदनी भा रही

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** रूप चाँदनी भा रही, रही आज मन मोह। अंतर्मन में नेह है, हर पल है आरोह।। सन्नाटा छाया हुआ, चुप है हर आवाज़। सुर भी सब मायूस हैं, खामोशी में साज़।। हर दिल को तो भा रही, तेरी मृदु मुस्कान । हर दिल में रहती सदा, इसकी पावन आन।। आँसू लगते नेक हैं, जब हो मन में प्यार। रिश्तों की संजीवनी, अपनेपन का सार।। भटक न जाना बंधुवर, प्रभु दिखलाते राह। रखो सत्य उर में सदा, निकलेगी तब वाह।। अंधकार को मारकर, धारण कर उजियार। तभी बनेगी ज़िन्दगी, फूलों का संसार।। प्रभु को मानो हर समय, तभी बनेगी बात। बन जाएगी ज़िंदगी, सुख की तो बारात।। कभी न करना लोभ तुम, कभी न करना पाप। वरना है यह ज़िन्दगी, केवल तो अभिशाप।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मे...
कृत्य और बर्बादी
कविता

कृत्य और बर्बादी

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** यौवन कभी तो घटेगा, बिजली संयंत्र का बायलर कभी तो फटेगा, तब नहीं होगा मुझे किसी प्रकार का आश्चर्य, वो दिन भी होगा सामान्य दिन नहीं समझूंगा कोई विशेष तिथि पर्व, क्योंकि आग इस कदर जलाया जा रहा है, हर किसी के द्वारा घी का होम दे आग भड़काया जा रहा है, नहीं मतलब किसी को देश धर्म राग से, सब संतुष्ट है भड़कती हुई आग से, नहीं पड़ना फर्क कहां लगी है आग, हर कोई भड़का रहा अग्नि धवल आग, मतलब नहीं ये आग कब कहां किसे जलायेगा, जहां ए दौर में कैसा मंजर लाएगा, वस्तु स्थिति का सामना करने बैठा है हर कोई तैयार, ग्रस्त है मानसिक रोग से राष्ट्र यार किंचित हृदय स्पंदन नहीं हो रहा है, हर हिय एक बकवास ढो रहा है, जिए जा रहा लेकर मन में इक आस, संपूर्ण लग रहा सबको किसी का बकवास, कुकृत्य कुछ अंधों की आबा...
चिरई
आंचलिक बोली, कविता

चिरई

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) चिरई चुरगुन के चिंव-चिंव बोली अउ फुँदक-फुँदक के रेंगना हर घाते सुग्घर लागथे। प्राकृतिक सौंदर्य हर चिरई चुरगुन ले हवय। चिरई चुरगुन बिना जंगल झाड़ी अउ महल अटारी ह सुन्ना लागथे। फेर गरमी दिन म नदियाँ नरवा, तरिया, डबरी सबो ह सुखा जाथे त चिरई चुरगुन मन बूँद-बूँद पानी बर तरसत रहि जाथे। कतकोंन चिरई मन तो दाना-पानी बिना अपन परान ल तियाग देथे। ऐसना समय म चिरई चुरगुन के जीव ल बचाय बर उदिम कर सकथन अपन घर के छत छानी मा, बारी बखरी मा अउ जेन मेर रुख राई हे तेन मेर सकोरा म दाना पानी राख के चिरई चुरगुन के पियास ल बुझा स सकथन। जेकर ले लहकत घाम म उड़त परकी परेवना अउ जम्मों चिरई चुरगुन मन अपन पियास ला बुझा सके। आज कल तो सहर तो बहुत दूरिहा के बात आय गांव म घलोक आघु कस चिरई चुरगुन देखे बर नइ मिलय। दिनों दिन चिरई चु...
बैरन कोयल कूके प्रियतम
गीत

बैरन कोयल कूके प्रियतम

मीना भट्ट "सिद्धार्थ" जबलपुर (मध्य प्रदेश) ******************** बैरन कोयल कूके प्रियतम, प्रीति गगरिया छलकाती। कंगन खनकें नथनी डोले, सजनी चलती बलखाती।। अधर गुलाबी कंपन करते, कुंतल लट मुख पर आए। घूँघट पट से झाँके गोरी, छम-छम पायल झनकाए।। अल्हड़ यौवन ललचाता मन, चंचल चितवन शरमाती। प्रेम-वलय उर बगिया पलती, कलियाँ लेतीं अँगड़ाई। कत्थक करती मोहक मणियाँ, झूला झूले तरुणाई।। डाल-डाल मधुमासी डेरा, चतुर चमेली इतराती। करें सुवासित मस्त बयारें, गुल मकरंद लुटाते हैं। अठखेली करते भँवरे हैं, प्रेमिल उर मुस्काते हैं। मन में निश्छल प्रेम पला है, कामदेव छवि बहकाती। मनभावन गीतों की लड़ियाँ, रस पीयूष भरी प्याली। बौराते हैं बौर प्रीति के, कहती होठों की लाली।। प्रेम पताका फैली नभ तक, चूमे माथा लहराती। परिचय :- मीना भट्ट "सिद्धार्थ" निवासी : जबलपुर (मध्य...
नोहर की बदलती आबोहवा
कविता

नोहर की बदलती आबोहवा

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** भूल गए बिहानी का वैभव, भूला वो सम्मान यहाँ, भगतसिंह के नाम पे सिसक रहा ईमान यहाँ। परशुराम चौक की गरिमा, अब धुएं में खोई है, नोहर की ये पावन माटी, आज अकेले रोई है। वो गोल गटा कुआं जहाँ, जुटती थी टोलियां कभी, आज वहां सट्टे की लत ने, छीनी सबकी खुशियां सभी। शिवाजी स्टैंड की चौखट पर, कैसा ये मंजर आया है, नोहर की गलियों के साये में, डोडों का व्यापार समाया है। न लाज रही बुजुर्गों की, न खौफ रहा अब शासन का, हर नुक्कड़ पर खेल चल रहा, नशीले उस राशन का। जहाँ गूंजते थे नारे आज़ादी और क्रांति के, वहां सौदा हो रहा है आज, समाज की शांति के। घर की दहलीज लांघ कर, अब नारी भी कदम बढ़ाती है, चंद रुपयों की खातिर वो, ज़हर घरों तक लाती है। मैली हवा में हाथ धोना, अब दस्तूर बन गया, जो शहर कभी था हीरा, वो आज नासूर...
कुण्डलिया छंद
कुण्डलियाँ, छंद

कुण्डलिया छंद

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** कुण्डलिया छंद सबसे ज्यादा आजकल, अपने लगते भार। कलयुग का यह सार है, लगभग हर परिवार। लगभग हर परिवार, सुनें हम यही कहानी। सभी सुनाते आज, कथाएं आप जुबानी। कहें मित्र यमराज, शिकायत नहीं किसी से। सभी दुखी हैं आज, मगर हम अच्छे सबसे।। अंर्तमन की पीर का, होता गहरा घाव। आज छोड़कर कल उसे, आप दीजिए भाव। आप दीजिए भाव, रंग चेहरे मत लाना। नाहक उसको आज, नहीं दो पानी दाना। इसका रौरव छंद, तोड़ देता है हर तन। कहें मित्र यमराज, गजब होता अंर्तमन।। दिखता है दृश्यमान जो, करता सबको तंग। जो हो रहा समाज में, आज बहुत बदरंग।। आज बहुत बदरंग, जमाना कैसा आया। कलयुग के दौर ने, जगत को है भरमाया।। कहें मित्र यमराज, सत्य भी खूब है बिकता। मान लीजिए आप, झूठ ही आगे दिखता।। आया मुश्किल समय है, होते सब बेहाल। सूर्यदेव इतने कुपित, तप...
पहचान जाहिर हो
कविता

पहचान जाहिर हो

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ********************1132 सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित्र अब दरों दीवार पर सिर पटकना होगा, तथाकथित आत्माओं, भूतों की तरह अतृप्त हो इधर-उधर भटकना होगा, जिस तरह हाथी के दांत खाने के और दिखाने के और होते हैं, उसी तरह लोगों को अपनी संतुष्टि जताने उछलना कूदना मटकना होगा, बंधे नहीं हो मोटी जंजीरों में, आशावादी हो अपनी अनदेखी तकदीरों से, मगर सिर फंसाए हो अंधभक्ति में, आश्वस्त हो इसकी शक्ति में, तो तैयार हो ये सोच कि मूत्र पी गोबर गटकना होगा, तब तक स्वीकार्य नहीं हो, अंधत्व की सारी अदाएं शिरोधार्य नहीं हो, इन अदाओं के साथ पूरी तरह तैयार हो, देश को खोखला करने वाले अब अय्यार हो, तैयार किये गये हो छांट चुनकर, बर्बाद ए मस्तिष्क को भरोसा है तुम पर, स्वतंत्र रहने के लिए नियमों को झटकना होगा सिर्फ रोने से काम नहीं चलेगा मित...
आंगन
कविता

आंगन

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हर दरख्त सूना है सूनी हर शाम बिछा दि ए राहो मे हर पलक औ पांव। तुम बहुत दूर हो तन्हाई है पास अंबर पर पसर गऐ खग वृन्दो के पांख। सूना है आगंन सूनी-सूनी बगीया सूने-सूने घर द्वारे सूना सब सन्सार। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर...
वो जगह सुहानी
कविता

वो जगह सुहानी

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** वो जगह जहां बचपन में खेलते-कूदते वो जगह जहां भेदभावपूर्ण मस्त रहते वो क्या दिन थे आपस में सँगठित रहते वो क्या हंसी खुशी थी जो अतुलनीय थी कितना अपनापन था परायापन का अहसास तक नहीं होता वो जगह गांव की थी क्या राजा क्या महाराजा क्या जनता जहां आदर प्रेम का संसार दीखता वो जगह जहां एक पोखरा था वो जगह जहाँ प्रेमबन्धन था नाचते, कूदते, खेलते पोखरा के पानी में आंनद की डुबकियाँ में खेलते बचपन के आंसू भी भरपूरन आंनद से आनंदित लगते वो जगह जहां एकजुटता में एकजुट की बातें करते दुःख-सुख की घड़ियां आती वो जगह जहां सब अकेले नहीं रहते वो जगह जहां दुखद घड़ी में सहारा बनते वो जगह जहां हर एक दूसरे का सहारा रहते परिचय :- ललित शर्मा निवासी : खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) संप्रति : वरिष्ठ पत्रकार व लेखक घोषणा पत...
बोलती आंखें
कविता

बोलती आंखें

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** बोलती आँखें कहानियाँ सुनाएँ, बिना शब्द सब कह जाती, चमकती आँखों की रौशनी में, हर भावना झिलमिलाती। गहराई वाली आँखों में, सागर सा राज छिपा होता, जो डूबे इनकी लहरों में, वो खुद से भी मिल जाता। पनीली आँखों की नमी में, दर्द भी मोती बन जाता, हर आँसू चुपके से दिल का, कोई राज बता जाता। कवियों ने इन आँखों को, चाँद-सितारों से सजाया, कभी काजल की धारा बोली, कभी इश्क़ का रंग चढ़ाया। कभी इन्हें नयन-कमल कहा, कभी प्रेम का दीपक माना, कभी विरह की अग्नि बताई, कभी स्नेह का मधुर तराना। इनकी भाषा अनोखी होती, शब्दों से परे ये बोलें, कभी हँसी के फूल खिलाएँ, कभी दुख के बादल घोलें। आँखें ही दिल का आईना, हर सच्चाई दिखलाती, जो छिप जाए लबों से, वो चुपके से कह जाती। बोलती, चमकती, गहरी, पनीली-हर रूप निराला होता, आँख...
समय नहीं है
कविता

समय नहीं है

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बड़े परिवार चार लोगों में सिमट गए घण्टों की दूरी मिनिटों में सिमट गई फिर भी आज इंसान के पास समय नहीं है। महीनों इंतजार के बाद अपनों का चेहरा देखना नसीब होता था, आज वो चेहरे मिनटों में दिखाई दे जाता है फिर भी इंसान के पास समय नहीं है। राशन, पानी, जमीन, को पाने के लिए घंटों, धूप में कतार में खड़े रहना पड़ता था आज मोबाइल पर सब काम कुछ ही पल में होता है फिर भी इंसान रोता है समय नहीं है। कहीं भी जल्दी पहुचने की रेस में सारे नियम कानून तोड़ अपनी अलग गति बनाता है, फिर भी यही कहता है यार समय नहीं है। घंटों मोबाइल पर चैटिंग, यू ट्यूब, सीरियल चलाता है लेकिन बूढे माँ बाप से मिलने उनसे बात करने का समय नहीं है। एक दिन यही इंसान वृद्ध- असहाय अकेला हो जाता है कोई इसको देखने पूछने न...
एक नई शुरुआत करें
कविता

एक नई शुरुआत करें

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* माह में एक बार ही सही कभी कोई ऐसा दिन या एक ऐसी रात बहुत जरुरी है जो सिर्फ खुद के लिए हो खुद की खुशी के लिए हो. जिसमें कोई रोक टोक कोई हिचक न हो जो भाए उसके ही साथ खुलकर जीना जो मन करे, दिल कहे दुनिया को भूलकर सारी जिम्मेदारियां एक तरफ रखकर बस चुरा लेना कोई चरम आनंद का लम्हा वक्त की डायरी से. बस खुद के लिए अपनी मस्ती में मस्त होकर ख्वाहिशों को खुलकर जीना जरूरी है बेहद. तो इस भागदौड़ वाली समझौतों से भरी जिंदगी इसकी उलझनों से लिपटी जद्दोजहद को बिल्कुल परे धकेलकर खुद की परवाह में एक नई शुरुवात करें. अपने लिए माह में एक दिन या एक रात तृप्ति पल जरूर चुराएं नीरस जिंदगी में कुछ जगमगाहट भरने के लिए खुलकर जीने के लिए मन को छोटी छोटी बेसुमार खुशियों से भरने के लिए.....! ...
दादी का गांव
कविता

दादी का गांव

डॉ. आभा माथुर उन्नाव (कानपुर) ******************** सुबह हो गई मीठी-मीठी लाली छाई चारों ओर चीं-चीं, चूं-चूं, काँव-काँव का सारे नभ में छाया शोर आशु उठा अँगड़ाई लेकर जल्दी उसे नहाना है नाश्ता कर बस्ता लेकर जल्दी स्कूल जाना है तभी उसे आ गई याद कल दीदी की कही बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की छुट्टी है मन उड़ गया सैर करने लगा गगन में मन उड़ने "पक्षी चूँ-चूँ क्यों करते हैं? क्या यह हमसे कुछ कहते हैं?" उसने पूछा कौए भाई तुम काँव-काँव क्यों करते हो? जो कहना है स्पष्ट कहो, संकेतों में क्यों कहते हो?" कौआ बोला काँव-काँव आशु चलो दादी के गाँव गाँव में दादी रहती हैं राह तुम्हारी तकती हैं कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है आशु गया मम्मी के पास बोला "मम्मी सुन लो बात कल से गर्मी की छुट्टी है एक मास की मस्ती है दादी के घर जाना है नदी में ख़...
सत्य की पुकार
कविता

सत्य की पुकार

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** मेरे भीतर का संत मुझसे कुछ कहता है। कहता है उठो देखो नया सूरज निकला है। शास्त्र का प्रकाश फैला है, शास्त्र पढ़ो। शास्त्रों को गुनों, सुनो और समझो। शास्त्र जीवन का निर्माण करते हैं, सँवारते हैं। वे उजाले का सबको नित दान करते हैं। सत्य लेकर संघर्ष करो, तो मंज़िल पाओगे। नित सुख-आनंद के नग़मे, नित गाओगे।। सूरज की नियत गति भी तो यही सिखाती है। जगहित का भाव सतत् फैलाती है।। शास्त्र लेकर हरदम बढ़ना ही होगा। बाधाएँ राहों में उनसे लड़ना ही होगा।। काँटे ही तो फूलों का मोल बताते हैं। जो योद्धा हैं तूफ़ाँ से नित भिड़ जाते हैं।। चलना है तो चलो भले कदम थक जाते हैं। मंगलगान सुनाओ क्यों पग रुक जाते हैं।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इत...
मुड़ता कलम का रुख
कविता

मुड़ता कलम का रुख

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** परेशां अरमानों का रुख मोड़ दिया, कलम का वो निर्भीक दौर ही छोड़ दिया, सच की स्याही अब बोझिल लगने लगी, इसलिए झूठ का सहारा थाम लिया। झूठ लिखो तो वाह-वाह के फूल खिलें, सच लिखो तो शब्दों के कंठ ही सिलें, इतना भारी हो गया है झूठ का ताज, सच दम तोड़े, नीचे गिरते ही मिलें। हाथी अब हवा में उड़ने लगे हैं, बाज़ों के पर भी झुकने लगे हैं, थूकों से लड्डू बंधने लगे जहां, वहां सच के दीप भी बुझने लगे हैं। झांसे की चादर में लिपटी हकीकत, विज्ञापन ही बन बैठा है अब इबादत, जीवन की राहों में भ्रम का ये जाल, सपनों को सच मान खोती है चाहत। चांद को धरती पे लाने की बातें, हर आका करता है मीठी सौगातें, पर इन मीठी बातों के नीचे दबकर, सांसें भी पूछें- कहाँ हैं हकीकतें? जैसे-तैसे पटरी पर आती जो जिंदगी, ऐलानों की आंध...
छल की छाया
कविता

छल की छाया

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** अंतर्मन की गहराई में जो मोती प्रतीति के पलते हैं, थाह समंदर सी उद्गारों की शांत चित्त को धरते हैं। चेहरों के कुछ भ्रम जाल से मर्यादा जब कुंठित होती, पल में छल की छाया से क्षदम रावण भी सीता को हरते हैं। व्याकुल धाराएं उत्पात मचाती सागर सौम्य रसातल मिलते हैं, अक्षम्य कुटिल और छल के जो खेल विसात पर चलते हैं। छल के आडंबर में आकर धर्म कर्म भी भ्रमित होते, अपने ही अपनों में छल से चाल शकुनि सी चलते हैं। छल के क्षणभंगुर बुलबुले पल में उठते मिटते हैं, निष्कलक निष्पाप आत्मा, प्रतिबिंब निर्दोष उभरते हैं। मन मिलन में, भूल जलन से प्रेमगंध के पुष्प हैं खिलते, मन मस्तिष्क स्वासों की डोरी से रिश्ते विषम भी बंधते हैं। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यव...
कुछ स्त्रियाँ
कविता

कुछ स्त्रियाँ

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* तुम्हारी किताबों से इतर हैं तुमारी क़लम उनको रच नही पाई कुछ स्त्रियाँ सिमोन की लेखनी से भी बच गयीं और अमृता भी उनको स्याही से उकेर नही पाई कुछ स्त्रियाँ जिनके बारे में अरस्तू नही जान पाया जबकि वो आधा ब्रम्हांड जान चुका था वो कुछ स्त्रियाँ जिनको पिकासो रंग नही पाया अपनी कूची से और न ही लियोनार्डो उनकी मुस्कान को मोनालिसा बना पाया वो कुछ साधारण सी स्त्रियाँ जिनको प्रेमचंद देख नही पाये और जो महादेवी की लेखनी से भी चूक गयीं वो अलबेली गुलाबी स्त्रियाँ रेगस्तानी, झुरमुटी बालों वाले रेतीले से लड़कों के माथे चूमती उन पर बिखर बिखर जाती हैं वो कुछ अनगढ़ सी सुरीली स्त्रियाँ अपने होने का शगुन जिंदगी को देती हैं खुद अपनी बलाएं उतार कर पेड़ पर खोंस आती हैं उन्होंने उतार दिए तुम्हारी आ...
आदेश
कविता

आदेश

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** शमशान की राख को सीने से लिपटाए फिरता हूँ, महाकाल का भगत हूँ उनका नाम लिए फिरते हूँ, मैं चुपचाप सभी की सुनता हूँ किसी को कुछ बोलता नहीं। आदेश है माँ महाकाली का बेमतलब इसलिए किसी को सताता नहीं। गुर्राता है कोई तो मैं चुप रहता हूँ फिर भी बेमतलब किसी को मौत की नींद सुलाता नहीं। खामोशियां है बहुत दफन मेरे इस सीने में मगर अपनी माँ काली के अलावा किसी को सुनाता नहीं। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता को लाइक करें ...🙏🏻😊💐💐💐 रा...
सियान बबा
कविता

सियान बबा

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) पहुँना के संदेशा देय कउँवा हर उड़ागे। बड़े-छोटे के नाता ल मनखे हर भुलागे।। घर के सियान बबा के कोनों नइ सुनय। सुन घलों लिहि त कोनों नइ गुनय।। मनखे हर मनखे ले आज दूरिहा होगे। बेईमानी के कमाई आय के जरिया होगे।। बबा संग ठिठोली करइया कोनो नइ हे। सगा बरोबर अब तो कुरूर करिया होगे।। जुन्ना जिनिस आज फिर ले नवा होगे। खातिरदारी म जरूरी मंद महुँवा होगे।। बबा के गोहार ल आज कोनो नइ सुनय। कान रहिके मनखे हर आज कनवा होगे।। परिचय :- प्रीतम कुमार साहू, गुरुजी (शिक्षक) निवासी : ग्राम-लिमतरा, जिला-धमतरी (छत्तीसगढ़)। घोषणा पत्र : मेरे द्वारा यह प्रमाणित किया जाता है कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। कृपया लिंक को टच कर रचना पढ़ें एवं कमेंट बॉक्स में अपने विचार रख कविता ...
राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)
छंद

राम वनगमन (आल्हा/वीर छंद)

नरेंद्र सिंह मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) ******************** (आल्हा/वीर छंद) राम संग भी लक्ष्मण सीता, वन में जाने को तैयार। कौशल में सब लगे विलखने, छाती मुक्का दे-दे मार।। कैसे अब तो राज चलेगा, बुरा नगर का होगा हाल। यही सोचकर जनता प्यारी, रो-रो कर हो रही निढाल।। उधर महल में राजा दशरथ, हाय राम कर रहे पुकार। अंतिम साँसे गिन-गिन राजा, भोग रहे थे कष्ट अपार।। जीव-जंन्तु भी चौंक रहे थे, झेल रहे सदमे की मार। कोहराम सर्वत्र मचा था, सबके नयन बहाये धार।। इक कैकेई का मुखमंडल, चमक रहा था मानो खास। कुल कलंकिनी चहक रही थी, मानो उसके उर उल्लास ।। मना रही थी जल्दी वह तो, राम चले जाए वनवास। राज तिलक हो शीघ्र भरत का, कोई बाधा रहे न पास।। परिचय :-  नरेंद्र सिंह निवासी : मोहनपुर, अतरी, गया जी (बिहार) सम्प्रति : सेवनिवृत्त वरिष्ठ प्रबंधक (प...
पृथ्वी दिवस
कविता

पृथ्वी दिवस

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मात्र एक दिन जिसको हमने नाम दिया "पृथ्वी दिवस" पर क्या कोई एक दिन पर्याप्त है हमारी उस "माँ" के लिए, जो हर पल, हमारी साँस में, वायु, जल अन्न, बनकर धड़कती है, हमारे जीवन मे। कभी थकती नहीं, कभी हारती नहीं, हम निरन्तर उसको रौंदा करते हैं, अद्भुत रंगों से सजी धरती का हम रक्त बहाया करते हैं, फिर भी वो हमे देती ही जाती है "जीवन"।। इस माँ ने हमें अनमोल उपहार दिए, रंग-बिरंगे, वन-उपवन, जीव-जंतु, पशु-पक्षी। कुछ नादानी, कुछ विकास की धुन... हमने इन चीजों को नष्ट किया। पर्वत-नदियां वन-उपवन सबका सीना छलनी किया, जीवों का संहार किया।। माँ की छटपटाहट को भी ना समझ सके, हजारों बार वो चीखी पहाड़ क्रोध से गरजे, फिर भी हम इस "माँ" का आँचल रक्तरंजित करते रहे। धरती माँ का कर्ज है हम पर ...
नफ़रत दिलों में
ग़ज़ल

नफ़रत दिलों में

निज़ाम फतेहपुरी मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** वज़्न- २२१ २१२१ १२२१ २१२ अरकान- माफ़ऊल फ़ाइलात मुफ़ाईल फ़ाइलुन नफ़रत दिलों में अक़्ल पे छाई ग़ुबार है। हम आ गए कहाॅं पे ये कैसा दयार है।। बरसो बरस जो साथ रहे वो बदल गए। रिश्तो में कैसे आज ये आई दरार है।। मुझसे बिछड़ गए वही अपने थे जो कभी। आ जाओ पास मेरे की दिल बेकरार है।। घबरा न साथ वक़्त के चलना है सीखना बूढ़ा है पेड़ देख लो उस पे बहार है।। झूठों मे होड़ चल रही झूठा बड़ा है कौन। झूठों से बोले झूठ जो झूठा अपार है।। दुनिया में आया कैसे वो पैदा हुआ न जो। ऐसा अजूबा मुझको दिखा पहली बार है।। जो वो कहेंगे सच वही बाक़ी निज़ाम झूठ। मानो न मानो बात तुम्हें इख़्तियार है।। परिचय :- निज़ाम फतेहपुरी निवासी : मदोकीपुर ज़िला-फतेहपुर (उत्तर प्रदेश) भारत शपथ : मेरी कविताएँ और गजल पूर्णतः मौ...
ईश्वर की करुणा
स्तुति

ईश्वर की करुणा

प्रेम नारायण मेहरोत्रा जानकीपुरम (लखनऊ) ******************** कोई भी सत्कर्म करे तू, प्रभु खाते में लिख लेता है। नहीं उधार वो रखता कुछ भी, तुरत तुझे फल दे देता है। कोई भी सत्कर्म... ईश्वर ने मानव देकर , बहुत बड़ा उपकार किया है। बुद्धि और विवेक भी देकर, मानव जीवन धन्य किया है। जब दुष्कर्म भाव आता, वो अंतर में डर भरता है। कोई भी... प्रभु सुमिरन और मानव सेवा, मित ये नर तन तूने पाया। वो बन गया दुलारा प्रभु का, जिसने सन्मार्ग अपनाया। जो धन व्यय करता दीनो मित, उनको और अधिक देता है। कोई भी... सृष्टि प्रभु की, तू भी प्रभु का, वो सबका पालन करता है। भक्त प्रहलाद की रक्षा करता, हिर्नाकश्यप वध करता है। पूर्ण समर्पण जो कर पाए, मां बनकर चिंता करता है। कोई भी ... परिचय :- प्रेम नारायण मेहरोत्रा निवास : जानकीपुरम (लखनऊ) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी ...
हंसती हुई औरत
कविता

हंसती हुई औरत

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ******************** हंसतीं हुई औरत अच्छी लगती है जैसे खिल गये हो गुलमोहर फैल गई हो सुगंधित बयार या सूरज की लालिमा या हंस रहा हो चांद समेट कर सारी धरती को अपने आगोश में असंख्य सितारे नभ में जगमगा उठे हों और दीपावली के दीप सी लौ अंधेरे को चीरकर उजास फैलाने आ गई हो। जब औरत हंसतीं है हंसते हैं उसके कान के झुमके मोतियों का कंठहार मांग का सिंदूर माथे की बिंदिया गाल में पड़े गढ़्ढे आंखों में प्यार के नगमे। जब औरत हंसतीं है हंसता है घर आंगन द्वार और रिश्ते हंसता है वक्त भी उन नगमों के लिए जिन्हें औरत हंसते हुए छेड़ देती है। स्तब्ध रह जाती है प्रकृति उस गुनगुनाहट को सुनकर इसलिए औरत जब हंसतीं है धरा गगन भी गुनगुनाने लगते हैं तुमने देखा है हंसतीं औरत को। हंसतीं हुई औरत अच्छी लगती है। परिचय :- सुधा गोयल निवासी : बुलंद श...