पिता
डॉ. भगवान सहाय मीना
जयपुर, (राजस्थान)
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पापा मैं ढूंढता हूं,
दिन-रात पिता के पर्याय...
शब्दकोशों में, पांडुलिपियों में,
और दुनियाभर के ग्रन्थों में।
लेकिन आज तक रत्तीभर भी,
नहीं मिला पिता के समकक्ष।
पिता की अद्भुत कहानी,
सुशोभित है छंद अलंकारों से।
कठिन है इसकी परिभाषा।
परिवार और संतान के लिए,
सर्वस्व त्याग कर्ता संन्यासी,
कौन है बड़ा इस बैरागी से।
असंख्य दुखों का भार,
पिता कैसे सह लेते है।
क्यों नहीं टूटकर बिखरते है ?
कैसे दबा लेते है बेबसी,
झलकती नहीं शिकन तक,
अपने को वज्र कैसे बना लेते है।
हर घर में निश्चित है कोना,
जहां दुनिया-भर के सभी पिता,
बरसकर "जी" हल्का कर लेते है।
जिससे उनमें आ जाती है,
लड़ने की हिमगिरि सी अटलता,
और पुरुष का कवच धर लेते है।
समाज की रीति-नीति से,
लौह आवरण चढ़ा है,
उनकी मोम सी आत्मा पर।
सिसकती अधूरी ...














