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पद्य

पिता
कविता

पिता

डॉ. भगवान सहाय मीना जयपुर, (राजस्थान) ******************** पापा मैं ढूंढता हूं, दिन-रात पिता के पर्याय... शब्दकोशों में, पांडुलिपियों में, और दुनियाभर के ग्रन्थों में। लेकिन आज तक रत्तीभर भी, नहीं मिला पिता के समकक्ष। पिता की अद्भुत कहानी, सुशोभित है छंद अलंकारों से। कठिन है इसकी परिभाषा। परिवार और संतान के लिए, सर्वस्व त्याग कर्ता संन्यासी, कौन है बड़ा इस बैरागी से। असंख्य दुखों का भार, पिता कैसे सह लेते है। क्यों नहीं टूटकर बिखरते है ? कैसे दबा लेते है बेबसी, झलकती नहीं शिकन तक, अपने को वज्र कैसे बना लेते है। हर घर में निश्चित है कोना, जहां दुनिया-भर के सभी पिता, बरसकर "जी" हल्का कर लेते है। जिससे उनमें आ जाती है, लड़ने की हिमगिरि सी अटलता, और पुरुष का कवच धर लेते है। समाज की रीति-नीति से, लौह आवरण चढ़ा है, उनकी मोम सी आत्मा पर। सिसकती अधूरी ...
दीवारों की आड़
कविता

दीवारों की आड़

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** दीवारों की आड़ बड़ी है, आपस में मिल करती बात कभी समय था खुले थे आंगन समय बैठकर कर लेती थी गपशप, अब समय कैसा है आया? नहीं पड़ोसी नहीं है आंगन मन चित् की नहीं बात होती, बंदीशो की आवाज है होती, समय नहीं कटता लंबी है रात। अब समय विचित्र है बहना अकेला जीवन अकेला ही रहना, नहीं परिवार का है अब साथ, देश-विदेश में रहते बच्चे करती आस पड़ोस से बात, नहीं काम का मुझे सहारा जैसे तैसे जीवन कटता, खुशियां लंबी दूर दराज। नहीं दिवाली की रौनक है, नहीं है होली लाल गुलाल खाली घर फीका त्यौहार करती मन की बातें चार। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मं...
सच्ची इंसानियत
कविता

सच्ची इंसानियत

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** मानव सेवा सबसे बड़ी, इससे बड़ा कोई धर्म नहीं। दीन-दुखी का कष्ट हरे,1204 इससे बड़ा कोई कर्म नहीं। इंसानियत को भूल जाए, इससे बड़ा कोई जुर्म नहीं। मानव बन जो संकट हरे, उससे बड़ा कोई सुरम (श्रेष्ठ)नहीं। मन में रखे न द्वेष-भाव, इससे बड़ा कोई मर्म नहीं। औरों के हित जो जिए, इससे बड़ा कोई पर्व नहीं। मिटा दे जो खुद का अहंकार, इससे बड़ा कोई मार्ग नहीं। बांटे जो जग में प्यार सदा, उससे बड़ा कोई पुरुषार्थ नहीं। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का नाम : माया देवी जन्म दिनांक : १३/०७/१९९१ सम्प्रति : शिक्षक शिक्षा : दो बार स्नातकोत्तर, बीएड निवासी : गोरखाना तहसील नोहर ज़िला- हनुमानगढ़ (राजस्थान...
रोटी से आगे
कविता

रोटी से आगे

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** रोटी से आगे भूख लगी हो तो रोटी ही सबसे बड़ा सत्य लगती है। पर जीवन केवल रोटी से नहीं चलता। मनुष्य को सम्मान भी चाहिए, अपनापन भी, और यह विश्वास भी कि उसका होना किसी के लिए मायने रखता है। कई लोग भरपेट भोजन के साथ भी अधूरे रहते हैं। और कई लोग कठिन परिस्थितियों में भी मुस्कुराते हैं। क्योंकि शरीर की भूख अन्न से मिटती है, पर आत्मा की भूख प्रेम, सम्मान और संवेदना से। यही कारण है कि सभ्यता की सबसे बड़ी चुनौती रोटी देना नहीं, मनुष्यता बचाए रखना है। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि :...
जय मां ज्वाला
भजन

जय मां ज्वाला

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** जग में कहां ऐसा, सबका नसीब है, ज्वाला के हाथों में, मेरी तक़दीर है।।टेक।। कांटों भरे हों चाहे, रास्ते हमारे, तोड़ के आएंगे, बंधन सारे। तेरी कृपा हो तो कांटा भी फूल है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। कोटि जतन करें पापी हारें, भक्ति की ज्योत मैया जलती जाए। हारा है जीवन मैंने, यही मेरी जीत है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। तेरे भवन में मैया, भक्त पुकारें, कष्ट निवारो मैया आए हैं द्वारे। आशाओं भरी है झोली, नैनों में नीर है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। जग में कहां ऐसा किसका नसीब है। ज्वाला के हाथों में मेरी तक़दीर है। परिचय : आशा शर्मा पति : श्रीहनुमान प्रसाद शर्मा निवासी : धरमपुरी सांवेर रोड इंदौर (मध्य प्रदेश) सम्प्रति : शिक्षिका हायरसैकैंडरी स्कूल साहित्यिक परिचय ...
खयालो में
कविता

खयालो में

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** आते हो यूँ हीं खयालो में हरदम सताते हो यूँ हीं खयालो में हरदम जानते हो कि खयालो की मन्जिल आसमां से दूर कहीं दूर, दूर तक नहीं हैं हां, फिर भी चाहते हो पालु उसे खयालो की फिजाओं में उडती फिरु। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "हिंदी रक्षक राष्ट्रीय सम्मान २०२३" से सम्मानित हैं। घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्...
रंगत से अधिक संगत को संभालिए
कविता

रंगत से अधिक संगत को संभालिए

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** रंगत तो पल में बदल जाए, संगत जीवन गढ़ जाती है, अच्छे लोगों की छाया में, किस्मत भी मुस्काती है। रंगत चेहरे की धूप-छाँव, समय के संग ढल जाती है, संगत सच्ची मिल जाए तो, राह नई बन जाती हैl रंगत बाहरी चमक-दमक, मन को कहाँ सजाती है, संगत सच्ची हो अगर, आत्मा भी महक जाती है। रंगत झूठी दिखावा है, जो क्षण भर में मिट जाती है, संगत सच्ची दीपक बन, हर अंधेरा हर जाती है। रंगत से मत धोखा खाना, यह तो आँख भरमाती है, संगत की पहचान करो, यही राह दिखलाती है। रंगत से रिश्ते ना जोड़ो, ये अक्सर टूट जाते हैं, संगत सच्ची निभ जाए तो, जीवन फूल खिलाते हैं। रंगत चाहे जैसी हो, दिल को क्या समझाती है, संगत अच्छी हो तो जीवन, खुशियों से भर जाती है। रंगत के पीछे भागे जो, अक्सर पछताते हैं, संगत सही चुनने वाले, मंजिल तक जाते हैं। रंगत त...
बेरोजगार हूँ साहब …
कविता

बेरोजगार हूँ साहब …

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** बेरोजगार हूँ साहब! मै बेईमान तो नहीं दिल में मेरे हजारों अरमान तो नहीं..!! नौकरी सबूत नहीं है अच्छे इंसान होने का इंसान हूँ मैं इंसानों से अलग तो नहीं..!! अपनी जिंदगी कि मैं लड़ाई लड़ रहा हूँ सपनों के लिए बस आशियाना बुन रहा हूँ..!! अपनों से गीला नहीं गैरो से शिकवा नहीं रोजगार की तलाश में दर-दर भटक रहा हूँ..!! भविष्य की चिंता मुझे सताती है हरपल जख्म मेरे रोज़ नए हो जाते है पल पल..!! सहम सा जाता हूँ लोगों का सवाल सुनकर ना पूछा कर क्या कर रहा है आज कल ? ना देश लूट रहा हूँ, ना देश चला रहा हूँ ना हत्या कर रहा हूँ, ना फरेब कर रहा हूँ..!! ना कोई गुनाह किया हूँ ,ना गुनहगार हूँ रोजगार की तलाश करता मैं बेरोजगार हूँ..!! आखिर ये सवाल क्यों पूछते है लोग मुझसे क्या रिश्ता है जमाने में उनका और ...
कहें सुधीर कविराय …
छंद

कहें सुधीर कविराय …

सुधीर श्रीवास्तव बड़गाँव, गोण्डा, (उत्तर प्रदेश) ******************** रोला छंद श्रम साधक मजदूर, रात दिन मेहनत करता। कब कहता मजबूर, रोज रोटी को खटता।। कहें मित्र यमराज, यही है इनका सावन। नहीं मानते हार, भाव रखते मन पावन।। कैसा इनका हाल, आप हम सब ही जानें। बात अलग है और, नहीं सरकारें मानें।। कहें मित्र यमराज, नहीं अब और रुलाओ। श्रम साधक मजदूर, मान-सम्मान बढ़ाओ।। अपनों का अब प्यार, आज कोई ना चाहे। बेईमानी की ओट, रोज ले बढ़ते राहें।। कहें मित्र यमराज, गजब है लीला न्यारी। अपने होते दूर, यही है माया भारी।। सहता है आरोप, बड़ा जो बेटा घर का। उसे नहीं है ज्ञान, भाग्य फल कैसा उसका।। यह कैसा है दस्तूर, हमें भी आप बताओ। क्या मेरा अपराध, बड़े होना समझाओ।। करते रहें प्रयास, हार को पीछे छोड़ो। पूरी होगी आस, जीत से रिश्ता जोड़ो।। कहें मित्र यमराज, दूर होंगी बाधाएँ। सदा जगाए ज...
किताब कब खींचेंगी तुम्हें…?
कविता

किताब कब खींचेंगी तुम्हें…?

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** किताब होती ही है पाठक वर्ग को खींचने वाले, होता है इनका नशा चाहे खा रहे हों निवाले, ये किताबों की ही ताकत थीं जो अपना मस्तिष्क गिरवी रख चलते रहे कुछ अति चालक लोगों के बताए हुए ऊल-जलूल राहों पर, पकड़ नहीं बन पा रही समान दिखते बाहों पर, खैर ज्ञान की ललक वालों को किताबें खींचती रहती है विद्यालय, मदरसे, कॉलेज की ओर, पढ़ते ही नहीं लगाना पड़ता अतिरिक्त जोर, ले जाता है ज्ञान विज्ञान की धरा पर, सच और झूठ समझने करता है असर, मगर अंधभक्ति में डूबे वंचित लोग, जातियता में फंसे बहुजन लोग, दिखावे में डूबे सर्वजन लोग, आस्था में डूबी दुनिया की शिक्षित आधी आबादी, कब सोचोगे धन व समय की बर्बादी, सभी धर्मों के सार को पकड़ो, मानवता और मेलमिलाप की तार में ज़कड़ो, पुस्तकों के चुंबकत्व में खींचे जाओ, नश...
गहरे बन जाते रिश्ते
कविता

गहरे बन जाते रिश्ते

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** रिश्ते अपने हैं या पराये पर ये रिश्ते ही रिश्ते की सशक्त डोर बनकर सच्चे गहरे रिश्ते बन जाते है। कब कहाँ कैसे किस मौड़पर कौन अपना बन जाये बस मिलकर रिश्ते बन जाते है न जाने यह किस अदृश्य चमत्कारी शक्ति का परिणाम रिश्ते की सशक्त सच्ची डोर सख्त बनाते है ये रिश्ते ही अपनों से अपनों के टूटकर बिछुड़कर दरकिनार हो जाते हैं, खून के रिश्ते अपने बनकर भी अपने से अपनापन के सगे रक्त के रिश्ते रहकर भी अपनापन का अहसास भाव अक्सर निभा नहीं पाते हैं। किसी अनजान गली मोहल्लों में किसी गांव से शहर में किसी महफ़िल, सभाओं, यात्रा में, किसी भी अनजान जगहों में खून के गहरे संबंध से गहरे रिश्ते बेजोड़ बबनाकर क्या खूब लोग बखूबी रिश्ते की परिभाषा निभाते रिश्ते का सच्चा अर्थ बताते हैं। रिश्ते में सच्चाई स्नेह प्रेम ममत्...
अमराई की छाँव
मुक्तक

अमराई की छाँव

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** अमराई की छाँव सुहाती, मृदु अहसास कराती। शीतलता देकर के हमको, भावों में ले जाती। तपन भले ही पीड़ादायक, पर अमराई भाये, मोहक छाँव मनुज के तन को, राहत से सहलाती।। अमराई की छाँव स्वर्ग-सी, सपनों में ले जाती। मधुर हवा तो गीत सुनाकर, सबको है दुलराती। मौसम को खुशहाल बनाती, मस्ती को है देती, बहुत सुहानी होती छैयाँ, मंगल भाव सजाती।। अमराई की छाँव खोजकर, सीखो समय बिताना। खुशियों से दामन को भरकर, उत्फुल्लित हो जाना। अमराई की बात निराली, आकर्षण यौवन पर, हरियाली से नेह लगाकर, उसके ही हो जाना।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी : मंडला, (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एम.ए (इतिहास) (मेरिट होल्डर), एल.एल.बी, पी-एच.डी. (इतिहास) सम्प्रति : प्राध्यापक व विभागाध्यक्ष इतिहास/प्रभारी प्राचार्य श...
उँगलियाँ
कविता

उँगलियाँ

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** बोझिल मन विचारों से द्वंद कर रहा था इसी उधेड बुन में अचानक उँगलियाँ छील ली हमने !! पुरानी यादों को रफू करने की उम्मीद जागी थी, रिश्तों की ऊधडती सियन को सिलने की तमन्ना हुई थी, कुछ स्मृतियों के बटन टांकने थे, स्वयं को इनमे भुलाकर अंगुलियां छील ली हमने!! काश हम भी खुशनुमा पट्टियों को इन घावों पर बाँध पाते, दौड़ते-भागते ज़ख्मों को सूकून की छाँव में सुला पाते, पल-पल रंग बदलते सम्बन्धों की तरह खुद को बदल पाते, इन्हीं नादानियों में अंगुलियाँ चोटिल कर ली हमने ! छिली उंगलियों का दर्द सवाल कर रहा था, रोज-रोज क्यूँ जख्मी होती हैं हम ऐसे, क्यों नहीं डरा पाते दर्द को किसी मासूम परिंदे की तरह, क्यूँ नही रंग भर पाते बेरंग जीवन मे इन्द्रधनुषी रंगों की तरह? तभी हल्की सी आहट से ...
प्यास का रेगिस्तान
कविता

प्यास का रेगिस्तान

इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" गोरखाना, नोहर (राजस्थान) ******************** नलों में पानी नहीं, धूप का कोई सानी नहीं। गंदा ही पानी सही, मगर पीने को पानी नहीं। झुलस रही है धरती सारी, जैसे तपती कोई भट्टी हो, कंठ सूखकर काँटा हुआ, चाहे गूँजती कोई पुकार खट्टी हो। बूंद-बूंद को तरसती आँखें, बादल अब मिलते नहीं, पत्थर दिल है ये मौसम भी, ज़ख्म यहाँ अब सिलते नहीं। सूख गए हैं ताल-तलैया, सूख गई है मन की आशा, घड़े पड़े हैं औंधे मुँह, मौन खड़ी है सबकी प्यासा। अमृत सा वो शीतल जल, अब केवल इक कहानी है, मृगतृष्णा की राहों में, बस यादों का ही पानी है। नलों में पानी नहीं, धूप का कोई सानी नहीं। गंदा ही पानी सही, मगर पीने को पानी नहीं। परिचय :-  इंद्रजीत सिहाग "नोहरी" उपनाम : "नोहरी" पिताजी का नाम : श्री भानीराम सिहाग माताजी का नाम : कांता देवी अर्धांगिनी का ...
अनुभुति
कविता

अनुभुति

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** कष्ट साध्य कष्ट सीमा कष्ट जीवन का मन्थन् कष्ट कुण्ठा कष्ट तृष्णा कष्ट जीवन का चन्दन। कष्ट फुहार दुख बरखा की कष्ट जीवन की हैं संगिनी कष्ट कन्दराओ का घुप्प अंधेरा कष्ट जीवन का कहर बवन्डर। कष्ट अगवानी करता सुख की कष्ट जीवन का हैं सम्बल कष्ट कमल किचड़ में खिलता कष्ट जीवन की सागर लहर कष्ट के निर्वाण में सुख की अनुभूति है परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले ३० वर्षों से धार के कवियों के साथ शिरकत करती रही आकाशवाणी इंदौर से भी रचनाएं प्रसारित होती रहती हैं आप राष्ट्र...
सशक्त लेखनी
कविता

सशक्त लेखनी

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** लेखनी जब सत्य की अग्नि में तपकर निकलती है, तो सोई हुई चेतना भी जागकर संभलती है। शब्दों की शक्ति तलवार से भारी होती है, सशक्त लेखनी ही समाज की प्रहरी होती है। कलम जब अन्याय के विरुद्ध आवाज उठाती है, हर मौन आत्मा में नई हिम्मत जगाती है। लेखनी केवल अक्षरों का श्रृंगार नहीं होती, यह मानवता की राह दिखाने वाली ज्योति होती। जिसके शब्दों में संवेदना और सम्मान होता है, उसकी लेखनी से ही राष्ट्र का उत्थान होता है। परिचय :- सुषमा शुक्ला जन्म : २५ अप्रैल निवास : आबिदजान (अफ्रीका) मूल निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) शिक्षा : एमए राजनीति शास्त्र बरकतुल्लाह भोपाल विश्वविद्यालय लेखन विधा : कविता, हायकु, पिरामिड, लघु कथा लेखन : लेखन के क्षेत्र में कोविद में जीवनसाथी की प्रेरणा से लेखन का कार्य शुरू किया। धर्म...
जय महाकाल
स्तुति

जय महाकाल

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** विकराल काल, त्रिनेत्र विशाल, नरमुंड माल, गले सर्पों का हार, हे दिगंबर वेष, अंग भस्म का लेप, शिव जटाजुट, उद्विग्न गंग, कर्पूर अंग, बिच्छू है कर्ण, शीश अर्धचंद्र, डमरू की धुन। शिव हे नटराज, भंयकर तांडव, भस्म रमैया शमशान में वासन, भक्तन प्रतिपालक, तारक संहारक, ऐसे हैं ब्रह्माण्ड के नायक, जय महाकाल, जय महाकाल, जय महाकाल, जय महाकाल। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "साहित्य शिरोमणि अंतर्राष्ट्रीय समान २०२४" से सम्म...
जनगणना- प्रथम चरण
कविता

जनगणना- प्रथम चरण

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** जनगणना प्रगणकों की सूची जारी, प्रशिक्षण की मजबूत तैयारी, प्रशिक्षकों ने बताया कि कार्य में पूरी तरह जान डालना है, एक-एक तथ्य खोज निकालना है, न रह जाए कोई कमी, आबंटित हुआ है आपका क्षेत्र आपकी जमीं, घर-घर हर घर जाना है, मुखिया से शालीनता से बतियाना है, पूछना है निर्धारित चौंतीस सवाल, आंखों देखी का रखना है खयाल, कमरे कितने गर एक भवन, मुखिया को करना है उत्तर का चयन, है आवासीय भवन या ग़ैर आवासीय, है उस घर में कितने निवासी, मालिक है या फिर किरायेदार, रहते हैं कितने परिवार, भोजन पकने का क्या है आधार, बिजली ढिबरी क्या प्रकाशित करता यार, शौचालय लिखना भूल न जाना, दीवाल देख कर है बतलाना, साइकिल, बाइक या फिर है कार, होगा तो न लिखना निराधार, पानी पीने का जो स्रोत बताए, एचएलओ एप अंकित कर जाए, अंत में मो...
आदमी के भीतर
कविता

आदमी के भीतर

सुरेन्द्र कल्याण बुटाना करनाल (हरियाणा) ******************** आदमी के भीतर एक और आदमी रहता है। वह बाज़ार नहीं जाता, न किसी पद की इच्छा करता है। वह बस चाहता है कि दुनिया थोड़ी कम कठोर हो। लेकिन समय की धूल उसके चेहरे पर जमती रहती है। और एक दिन बाहर वाला आदमी सफल हो जाता है, पर भीतर वाला चुपचाप मर जाता है। परिचय :-  सुरेन्द्र कल्याण बुटाना जन्म : २१ जून १९९५ निवासी : ग्राम बुटाना, जिला जिला करनाल (हरियाणा) प्रकाशित कृतियां : हिंदी कहानी पुस्तक "प्रतिज्ञा दोस्ताना (गज़ब दोस्ताना)", हरियाणवी कविता संग्रह "समाज" शामिल हैं। रुचि : हिंदी एवं हरियाणवी भाषा में काव्य लेखन के साथ पटकथा लेखन, संवाद लेखन तथा स्वतंत्र फिल्म निर्देशन में भी रुचि रखते हैं। विशेष : आपकी रचनाओं के केंद्र में मानवीय संवेदना, सामाजिक यथार्थ, ग्रामीण जीवन, करुणा,...
उन्नति का दीप
कविता

उन्नति का दीप

सुषमा शुक्ला आबिदजान (अफ्रीका) ******************** उत्तरोत्तर उन्नति का दीप, संघर्षों से जलता है, प्रखर लेखनी का हर अक्षर, यश का पथ बनता है। काँटों वाली राहों में भी, जिसने हिम्मत थामी है, उसकी लेखनी ने जग में, अपनी छाप निभाई है। शब्दों में जब सत्य जगे, तब सम्मान स्वयं आता, संघर्षों की तपती धूप, यश का चंदन बन जाता। मेहनत की स्याही से जब, सपनों को आकार मिले, प्रखर विचारों की गाथा, हर मन को उपहार मिले। गिरकर फिर उठ जाना ही, उन्नति का आधार बना, लेखनी की दृढ़ता से ही, जीवन का विस्तार बना। यश की सीढ़ी चढ़ने को, धैर्य जरूरी होता है, संघर्षों का हर अनुभव, लेखन में मोती होता है। जिसने पीड़ा को शब्दों की, शक्ति बना कर गाया है, उसकी प्रखर लेखनी ने, जग में मान बढ़ाया है। उत्तरोत्तर उन्नति वहीं, जहाँ कर्म निरंतर हो, लेखनी में तेज वही, जिसमें संघर्ष समंदर हो ...
उद्गम कहाँ
कविता

उद्गम कहाँ

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उथदी का उद्गम कहाँ गिरि गवहर की गहराई कहाँ तक अथाह अन्तरिक्ष की अन्तर सीमा कहाँ कहाँ है गिरि पर खड़े वृक्ष श्रृंगों की सीमा कहाँ सरिता की जितनी गहराई कौन जाने। जल में अपने प्रतिबिम्ब को निहारते रवि, चन्द्र को कौन पकड़े विद्युत की कडकती आवाज को कैसे रोके झुला-झुलते पवन के वैग को कौन रोके। कपसिले बादल के टुकड़े के साथ चांद का छुपना निकलना कौन देखें ओस बिन्दु का चमकना वर्षा की रिमझिम फुहारों में भिगना कौन नहीं चाहता रात्री में टिमटिमाते जुगनुओं के समूहों और आकाश में चमकते तारे एक ह पीत वर्ण, एक रजत वर्ण धन्य है प्रकृति हमारी जो प्रतिदिन नित नये खेल खेलती है मानव खिलाडी है निरन्तर चलता रहता है इस जीवन के लिएं। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए...
सूरज ठंडा  हो जाता है
कविता

सूरज ठंडा हो जाता है

आशा शर्मा धरमपुरी, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बैसाख और ज्येष्ठ मास की तपन है। तन-मन झुलसे हुए, आकाश की ओर देख रहे हैं। पेड़-पौधों को, पशु-पक्षियों को, बादलों की प्रतीक्षा है। आषाढ़ मास आ गया है, बादलों ने आ आकर नर्तन किया है। कोई श्वेत, कोई मटमैले, कोई श्याम रंग में उमड़ रहे हैं। वायुमंडल में भी हलचल है, शीतल वायूके झोंको की राह सृष्टि तक रही है। सूर्य उदित है, पर प्रकाश धुंधला सा है, बादल गड़गड़ाहट के साथ संदेश दे रहे हैं। दामिनी ने चमक कर कहा, अब बरसों, तपन से सब झुलस रहा है। बूंद-बूंद गिरते-गिरते, मूसलधार बारिश होने लगी है। अब तो सृष्टि शीतलता से प्रसन्न हैं, क्यों कि सूरज भी जल से, मित्रता करके शीतल हो गया है। उदित भी है शीतल भी है, परंतु प्रसन्न भी है। शीतलता की आवश्यकता, सूरज को भी तो है, वहथक गया है। इसीलिए सूरज ठंडा हो गया है...
मोहब्बत
कविता

मोहब्बत

किरण विजय पोरवाल सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) ******************** गम लाख छुपाए हमने है पर कमबख्त यह आंखें रह ना सकी। ओझल तो किया था हमने वो पर सामने आकर ठहर गए। क्या मन की बातें उनसे कहे कुछ शब्द नहीं थे होठों पर। क्या हम बोले क्या वह बोले बस निकल गए अपने पग पर। जब नहीं मिले बातें थी, मिलने पर भूल गए सारी बस प्यार के मीठे पल दो पल बन गए इश्क की यादें हैं। वह है नन्द का छोरा जो हमे दर्श दिखाकर चला गया। ओझल होगया वह अखियो से बस प्यार जताकर चला गया। परिचय : किरण विजय पोरवाल पति : विजय पोरवाल निवासी : सांवेर रोड उज्जैन (मध्य प्रदेश) शिक्षा : बी.कॉम इन कॉमर्स व्यवसाय : बिजनेस वूमेन विशिष्ट उपलब्धियां : १. अंतर्राष्ट्रीय साहित्य मित्र मंडल जबलपुर से सम्मानित २. अंतर्राष्ट्रीय शिक्षक संचेतना उज्जैन से सम्मानित ३. राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर...
उसे राजा बनाना होगा
कविता

उसे राजा बनाना होगा

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** गधे को गधा मत बोलो, वह भी प्यार का हकदार है, उसकी भी अपनी दुनिया, उसकी अपनी सरकार है। इज्जत अगर न दोगे तुम, इज्जत कहाँ से पाओगे, दिन-रात खटते रहोगे, और “गधा” कहलाओगे। गुस्से से भर जाओ तो, गुस्सा बाहर निकालो जी, मन फिर भी शांत न हो तो, गधों की परेड करा लो जी। राजनीति में आने का, सब गधों को अधिकार है, क्या जंगल, क्या ये समाज, सबको यह स्वीकार है। बंदर-भालू को मदारी, इशारों पर नचवाता है, लेकिन स्वाभिमानी गधे को, वह कभी नहीं झुकाता है। जंगल-भक्ति दिखलाने को, सब पशुओं को आना होगा, अगर चढ़ जाए भक्ति सिर पर, गधे को राजा बनाना होगा। परिचय :-  राजेन्द्र लाहिरी निवासी : पामगढ़ (छत्तीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं...
समय का पन्ना
कविता

समय का पन्ना

विजय गुप्ता "मुन्ना" दुर्ग (छत्तीसगढ़) ******************** बुढ़ा बच्चा स्वभाव सरीखा अक्सर हम सुनते आए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। रट्टू तोता जैसा डायलॉग रोज कोई दोहराता है। गिनी चुनी सोच प्रशंसा लाभ जग को सुनवाता है। जागो उठो सुनो सभी ट्रंप चाल का भय दिखलाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। दुनिया लोहा मान समझौता रूप स्वीकार किया। फिर धीरे से आँख दिखा छवि में बट्टा लगा दिया। झेंप खीझ बेचैनी मिटाने फर्श पे ही लुढ़कते जाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। बरसों बरस की साख मिटती कैसे दुनिया ने जाना। जल थल नभ अंतरिक्ष शक्तिमान का बहक जाना। एक खिलौना खेलने बच्चे को ट्रंप इक्का ललचाए। जिद और अकल दोनों अब अंबर तक उड़ते जाए। रट्टू तोता कुछ तय शब्दों से अपनी शान दिखाता। अपनी बोली में फिर निज उर बोली भी फिसलाता। समर्थ राष्ट्र अर्थ तंत्र शस्त्र प्रगति...