
सूर्यपाल नामदेव “चंचल”
जयपुर (राजस्थान)
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अंतर्मन की गहराई में जो
मोती प्रतीति के पलते हैं,
थाह समंदर सी उद्गारों की
शांत चित्त को धरते हैं।
चेहरों के कुछ भ्रम जाल से
मर्यादा जब कुंठित होती,
पल में छल की छाया से
क्षदम रावण भी सीता को हरते हैं।
व्याकुल धाराएं उत्पात मचाती
सागर सौम्य रसातल मिलते हैं,
अक्षम्य कुटिल और छल के
जो खेल विसात पर चलते हैं।
छल के आडंबर में आकर
धर्म कर्म भी भ्रमित होते,
अपने ही अपनों में छल से
चाल शकुनि सी चलते हैं।
छल के क्षणभंगुर बुलबुले
पल में उठते मिटते हैं,
निष्कलक निष्पाप आत्मा,
प्रतिबिंब निर्दोष उभरते हैं।
मन मिलन में, भूल जलन से
प्रेमगंध के पुष्प हैं खिलते,
मन मस्तिष्क स्वासों की
डोरी से रिश्ते विषम भी बंधते हैं।
शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट)
व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता
निवासी : जयपुर (राजस्थान) ।
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