भारत का कीर्ति नाद
गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण"
इन्दौर (मध्य प्रदेश)
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ऋषि मुनियों का देश यहाँ पर मेघ सुधा बरसाते।
स्वर्ग त्याग देवता कुटी में बसने को ललचाते।।
कवियों की यह धरा जहाँ भावना अछल उठती है।
यहाँ सृजन के लिए स्वयं लेखनी मचल उठती है।।
अविनाशी वह ब्रह्म यहाँ नव लीलाएँ रचता है।
ले-ले कर अवतार स्वयं माँ की गोदी भरता है।।
नदियाँ गातीं गीत यहाँ हर झरना भजन सुनाता।
इसीलिए प्राणों से प्यारी लगती भारत माता।।१।।
जिसके बच्चे बचपन से ही रण रचना करते हैं।
जबड़े पकड़ बबर सिंहों के दाँत गिना करते हैं।।
कच्ची कली खेलती हँसती मर्दानी बन जाती।
अबला बाला रण में झाँसी की रानी बन जाती।।
मरे हुए पति को जीवित करने को अड़ जातीं हैं।
यहाँ नारियाँ सत के बल पर यम से भिड़ जातीं हैं।।
यहाँ प्रकृति की हंँसी देखकर मुकुलित मन इतराता।
इसीलिए प्राणों से प्यारी लगती भारत म...



















