निर्झर
मालती खलतकर
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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निर्झर निरन्तर,
निर्झर निर्मल
निर्झर निशब्द नही
निर्झर नमित हे धरा को
निर्झर, निर्भय
नित प्रवाहित।
कभी लगता
निर्झर श्वेद है
लगता कभी निर्झर
बर्फ का झाग है
निर्झर, झरझर बहता
लगता, लक्ष्य की
ओर भाग रहा
उस लक्ष्य की ओर
जिसका उसे
ठौर ज्ञात नही।
धरा को नमन
करता निर्झर
सरगम के स्वर
गाता निर्झर
कही दिखता, पाषाणो
को तोडता निर्झर
कहीं पाषाणो
को पीछे छोड
सीमा लाथता निर्झर
वृक्ष को अपनी ओर
झुकाता सा निर्झर
निर्झर की फुहारो का
आनंद लेते चक्षु
कही तन मन को
भिगोता निर्झर ।
निर्झर लगता कही
प्रकृति के गले के हार सा
कही प्रतित होत
पकृति की पायल सा
रूनझुन, रूनझुन गीत गाता
क्या कहु इस निर्झर को,
जन जन को है लुभाता।
परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी...






















