गड़बड़ हे भई
राजेन्द्र लाहिरी
पामगढ़ (छत्तीसगढ़)
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(छत्तीसगढ़ी कविता)
छाता ओढ़ के सुरुज ल ढांकय
देखव ए अत्याचारी मन,
जोर जुलुम के बेवस्था ल पकड़े
हावय देखव समाजिक बीमारी मन,
हजारों साल के धत धतंगा
करके नई अघाए हें,
संकट खतरा कहि कहि के
गरीब गुरबा ल सताये हें,
नाक कटाय के डर नई हे कोनो
नाक इंखर तो पइसा हावय,
अकेल्ला रहिथंव मोर कोनो नई हे
सुखाय नहीं जऊन भंइसा हावय,
कुकुर बिलाई छेरी बछरू
कतको के नजर म देवता आये,
शरम बेच लोटा धर मांगय
बइठे ठाले तीन तेलइ के खाये,
हांसी आथे पढ़े लिखे मन उपर
तर्क वितर्क ले दुच्छा हावय,
गहना धर के मुड़ी ल अपन
अनपढ़ जोगी जगा हाथ देखावय,
मया पिरित नही हे देस से जेला
ओहर का सियानी करही,
ए डारा ले ओ डारा तक
बेंदरा कस धतंग धियानी धरही,
कांदी खाये पेट के भरभर
पगुरा के वोला पचाही जी,
चिंता फिकर का करना हे
चारा दूसर लाही जी।
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