उपजाऊ रेत
भीमराव झरबड़े 'जीवन'
बैतूल (मध्य प्रदेश)
********************
कविता के गाँव हुई, उपजाऊ रेत।
लहकने लगे हैं अब, छंदों के खेत।
शब्दों के सागर से, चुन-चुन के रत्न।
सजा रहा आँगन को, धैर्य का प्रयत्न।
पढ़ें गीत सोहर के, चिंतन अनिकेत।।
लहकने लगे हैं अब, छंदों के खेत।।१
बाल रहे द्वार दीप, प्रमुदित अनुप्रास।
संधि करे नैनों से, चपल सब समास।
शिल्प कथ्य साध रहा, व्याकरणिक प्रेत।।
लहकने लगे हैं अब छंदों के खेत।।२
लगे रंग रोगन में, सधे अलंकार।
लीप रहे भाषा की, खुरदुर दीवार।
रसिक व्यंजना परसे, नौरस समवेत।।
लहकने लगे हैं अब छंदों के खेत।।३
परिचय :- भीमराव झरबड़े 'जीवन'
निवासी : बैतूल मध्य प्रदेश
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।
आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के सा...


















