संस्कार
माया मालवेन्द्र बदेका
उज्जैन (म.प्र.)
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दीदी आप भजन गाइये ना, कितना अच्छा गाती है'।
सरला जी उसे देख मुस्कुराई कुछ बोली नहीं।
वह अभी इस शहर में नई नई आई थी। धीरे धीरे पास पड़ोस से परिचित हो रही थी। सामूहिक मायका और सामूहिक ससुराल परिवार की आदी, वह सभी को अपने घर जैसा मानती थी।
कभी भजन कभी कथा कभी कुछ और कार्यक्रम में आपस में मिलने लगे।
उसको सभी के साथ मिलकर अच्छा लगा और सभी ने प्यार से उसे अपनाया।
उसकी उम्र से बड़ी कई महिलाएं थी, वह उनका सम्मान करती थी।
ऐसे ही स्वभानुसार उसने आज भी कह दिया चलिए दीदी आप सब आज हमारे यहां चाय बनाती हूं। आप सभी का आना नहीं हुआ अब तक।
एक दो छोटी थी वह कुछ नहीं बोली, लेकिन जिन्हें दीदी कहकर सम्बोधित किया, वह एकदम तमतमा गई और बोली__
'यहां दीदी कोई नहीं सबका नाम लेकर बुलाया कीजिए'।
हम बुढ़ा नहीं गये है।
वह हतप्रभ थी की बड़े लोग प्यार और सम...





















