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गद्य

सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट
व्यंग्य

सरसों के चेपे और मेरी पीली टी-शर्ट

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आज मौसम ने जाने किस ज्योतिषीय गणना के बाद यह तय किया कि अब ठिठुरन को रिटायरमेंट दे देना चाहिए। सुबह की धूप में वह पुरानी खीझ नहीं थी, जो हड्डियों में उतरकर ऑर्थोपेडिक चेतना को भी कंपा दे। आज की धूप में वसंती उष्णता थी- हल्की, लुभावनी, आत्मविश्वासी। जैसे बसंत ऋतु ने प्रेस कॉन्फ़्रेंस कर घोषणा कर दी हो- “मैं आ चुकी हूँ, कृपया पीला परिधान धारण करें।” वसंती स्वर्णिम रंग ने मुझे भी अपने प्रभाव में ले लिया। अलमारी खोली तो महीनों से अंदर-बाहर होती, मौसम विभाग की अनिश्चितताओं की शिकार, एक आग्नेय वर्ण की पीली टी-शर्ट कोने से झाँकती मिली। वह मुझे देख रही थी- थोड़ी उम्मीद, थोड़ी शिकायत भरे लहजे के साथ। जैसे कह रही हो- “कब तक मुझे सिर्फ बसंत पंचमी की प्रतीक्षा में रखोगे? मैं भी सार्वजनिक जीवन चाहती...
बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए
व्यंग्य

बधाई हो… शर्मा जी अंकल बन गए

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बधाई हो... शर्मा जी आख़िरकार अंकल बन ही गए। मोहल्ले में आज यही बड़ी खबर है। कल ही गली में खेलती एक बच्ची ने मुस्कराकर उन्हें पुकारा “अंकल!” और शर्मा जी के जीवन में उम्र का यह प्रमोशन स्थायी रूप से दर्ज हो गया। यह बात जैसे ही उनकी पत्नी तक पहुँची, वह हँसते-हँसते दोहरी हो गईं। बोलीं- “मैं तो कब से कह रही हूँ कि आपकी उम्र ‘भैया’ वाली नहीं रही, पर आप ही मानते नहीं।” शर्मा जी ने दर्पण में खुद को देखने की कोशिश की वही रंगी हुई मूँछें, गहरे श्याम रंग की डाई से रंजित बालों की अंतिम बस्ती खुले दालान के किनारे बसी हुई। मगर सच्चाई यह कि जवानी के रंग-रोगन का असर अब शरीर की दीवारों पर नहीं टिकता। समय अपने हस्ताक्षर छोड़ ही देता है। उन्होंने जवानी को बचाए रखने के क्या-क्या जतन नहीं किए विदेशी डाई, घ...
वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान
आलेख

वाककला जीवन की प्रगति के मोड़ में भरती मुस्कान

ललित शर्मा खलिहामारी, डिब्रूगढ़ (असम) ******************** इंसान कलाओं के भंडार में पारंगत है। वह उपयोग कहां कब किस तरीके से कला को दर्शाता है उसका निखार लाता है यह व्यक्ति का व्यक्तिगत विषय है। इसमें व्यक्ति का व्यक्तित्व साफ झलकता है । कला का रूप प्रत्यक्ष होता है। व्यक्ति अपनी प्रतिभा का परिचय देने में सक्षम संबल होता है। अपने अंदर छुपी कला कब कहां किस रूप में उभारता है यह अपनेआप में पेचीदा प्रश्न है। यह जरूर है कि अवसर सुअवसर में श्रोता ही कला का निर्णयकारी सहित मूल्यांकन करता है। यकीनन मानिए तालियां की गड़गड़ाहट में वाक कला प्रमाणित करती है कि वक्ता के भावनात्मक विचार श्रोताओं के ह्र्दयमन में स्पर्श कर गए है। व्यक्ति की प्रतिभा औऱ उसकी कला जब प्रकट होती है तो वह निश्चित चर्चित होती है। यह बयां करती है कि वाक कला में पारंगत है। इंसान वाक कला कौशलता में बोलकर खरा उतरता है। वाक कला ...
नन्हें साथी
पुस्तक समीक्षा

नन्हें साथी

सुधा गोयल द्वारा लिखित 'नन्हें साथी' पुस्तक की विवेचना समीक्षक :- नील मणि मवाना रोड (मेरठ) *************** अदम्य नारी रत्न सम्मान एवं कोहर प्रसाद पाठक स्मृति बाल साहित्य श्री सम्मान से सुशोभि श्रीमती सुधा गोयल जी का बाल साहित्य-संग्रह नन्हें-साथी मेरे हाथों में होना अपने आप में एक सुखद अनुभव है। १०७ पृष्ठों में सजी ३७ बाल कहानियों की यह पत्रिका बाल मन की दुनिया का ऐसा आईना है, जिसमें बच्चे अपने बचपन की शरारतें, जिज्ञासाएँ और संवेदनाएँ साफ़ देख पाते हैं। एक के बाद एक छोटी, मनोरंजक और दिलचस्प कहानियाँ बच्चों को बाँधे रखती हैं। यह संग्रह केवल मनोरंजन नहीं करता, बल्कि संवेदनशीलता, नैतिक मूल्यों और सुसंस्कृत समाज की नींव भी रखता है। पढ़ते-पढ़ते रुकने का मन नहीं होता- हर कहानी अगली कहानी की ओर सहज ही खींच ले जाती है। शब्दों की चंचलता मन मोह लेती है। भाषा सरल, स्पष्ट और कहीं-कहीं हल्...
मुंह पर थप्पड़
लघुकथा

मुंह पर थप्पड़

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ********************  यह जानते ही मानसी ने जयंत को फोन किया। पहले तो जयंत ने मानसी का फोन अटैंड नहीं किया, और जब फोन उठाया तो सीधे जवाब देने की बजाय टालमटोली करता रहा, और जब मानसी ने सीधे-सीधे सवाल किया कि, "जयंत तुम यह बताओ कि वह तुम्हारे जो चाचाजी दहेज की सूची दे गए हैं, तो वह क्या तुम्हारी जानकारी में है?" "हां है तो...।" "क्या, तुम उससे सहमत नहीं ?" "नहीं।" "मतलब असहमत हो?" " नहीं, मैंने ऐसा तो नहीं कहा।" "मतलब यह कि वह सूची मेरे पापा व चाचा ने बनाई है, तो सहमत न होते हुए भी मुझे मानना पड़ेगा ...। और फिर इसमें बुराई भी क्या है, आख़िर तुम्हारी शादी आय.ए.एस. से जो हो रही है। इसमें तुम्हारे जीवन के शान व सुख-सुविधा से गुज़रने की गारंटी भी तो है।" "मतलब, यह तुम लोगों का अंतिम फैसला है ?" "हां ...ऐसा ही समझो ...।' "और हमारे प्यार का ...
सतरंगी दुनिया- १७
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १७

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** आपका भव्य महल हो या छोटी-सी झोपड़ी, घर उसी को कहते हैं जहां शांति और सुकून मिले। *यदि आप खुश रहना चाहते हैं तो दूसरों के जीवन में अपनी जगह ढूंढना बंद कर दो।* हमें अपनी ज़िंदगी का आनंद अपने तरीके से लेना चाहिए, लोगों की खुशी के चक्कर में तो शेर को भी सर्कस में नाचना पड़ता है। स्टेटस ज़िंदगी का हो या मोबाईल का, स्टेटस ऐसा रखें कि लोग कॉपी करने पर मजबूर हो जाएँ। जब बुरा करने के बाद भी बुरा ना लगे तो समझना चाहिए कि बुराई अब हमारे चरित्र में आ गई है। आज तो मेरा तकिया और बिस्तर भी बोल पड़ा, "मालिक थोड़ा उठकर बैठ जाओ या छत पर घूम लो, हमें भी थोड़ा साँस लेने दो। एक नगर सेठ के यहाँ इन्कमटैक्स का छापा पड़ा। सारे खातों की जांच हुई। एक जगह सेठ ने लिख रखा था कि पाँच लाख की जलेबियाँ कुत्तों को खिलाई। इन्कम टैक्स वालों ने इस खर्च के लिए...
मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद
व्यंग्य

मीटर टेप के साये में – दो पहाड़ों का संवाद

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** दो पहाड़ एक बड़का भैया, एक छुटका भैया बरसों से बगल-बगल खड़े थे। एक ही माँ, पृथ्वी, की संतान, क़द-काठी में फर्क, पर दायित्व में बराबरी। दोनों ने ही धरती को थामे रखा, हरियाली की चादर ओढ़ाए रखी। मगर इंसान की आदतें कहाँ बदलती हैं। उसने छुटके के कान भरने शुरू किए- तेरी जगह अब यहाँ नहीं; तुझे जान-बूझकर छोटा रखा गया; असली बेटा तो बड़का है। चल, तुझे शहर ले चलते हैं वहाँ नाम बदलेगा, पहचान बनेगी। छुटका बातों में आ गया। उसे भरोसा दिलाया गया कि “पहाड़” नाम का कलंक हटेगा। कहा गया तू नव-निर्माण की नींव है; तेरे ऊपर इमारतें उठेंगी; तू काम आएगा। पहली बार उसे लगा कि खड़ा रहना नहीं, उपयोगी होना ज़रूरी है। “बड़के भैया… सुना है हम दोनों का बिछोह होने वाला है,” छुटका चुप्पी तोड़ता है। आवाज़ में उत्सुकता है...
नई दृष्टि
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नई दृष्टि

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** जनरेशन जेड (जेन जी) वह पीढ़ी है जिसका जन्म लगभग १९९७ और २०१२ के बीच हुआ है। यह पीढ़ी डिजिटल नेटिव्स कहलाती है क्योंकि वे इंटरनेट और स्मार्टफोन के साथ बड़े हुए हैं और तकनीक के साथ सहज हैं। वे विविधता, सामाजिक न्याय और वर्क लाइफ बैलेंस को महत्व देते हैं। आज जेन जी शब्द हर चर्चा का केंद्र है - विज्ञापन से लेकर शिक्षा नीति तक, हर जगह इसका जिक्र होता है। प्रौद्योगिकी-प्रेमी: जेन ज़ेड के लोग स्मार्टफोन, सोशल मीडिया और ऑनलाइन शॉपिंग जैसी तकनीक के साथ पूरी तरह से सहज हैं। हाल ही में यूट्यूब में एक नई रिपोर्ट पेश की है कि भारत में ६८ फ़ीसदी जेन जी वीडियो से सीखे हुए हाव-भाव और बॉडी लैंग्वेज का इस्तेमाल कर रहे हैं। यूट्यूब आप जेन जी के लिए सिर्फ वीडियो देखने का प्लेटफार्म नहीं बल्कि डिजिटल संस्कृति सीखने और सोशल कनेक्शन का केंद्र बन चुका है। ...
हुक्का-वार्ता
व्यंग्य

हुक्का-वार्ता

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** चौपाल पर दो हुक्के पड़े थे। दोनों पुराने थे इतने पुराने कि इतिहास उन्हें पहचानता था, पर वर्तमान उनसे कतराता था। एक की चिलम में बीते ज़माने की राख जमी थी, दूसरे की नली में राजनीति की नमी। हवा ठंडी थी, पर माहौल में गरमाहट थी वो गरमाहट जो सिर्फ जाति और सत्ता के मेल से पैदा होती है। हुक्का नंबर एक ने गला साफ़ किया- “सुना है भाई, सरकार फिर से लोगों को उनकी जाति याद दिलाने में लगी है।” हुक्का नंबर दो ने गुड़गुड़ाहट भरी- “तो इसमें नई बात क्या है? भूल गए थे क्या लोग?” हुक्का नंबर एक भावुक हो उठा- “हाँ यार, लगता है हमारे दिन फिरेंगे। एक ज़माना था जब हमारी कितनी पूछ थी! हर जाति का अलग हुक्का, अलग शान। ऊँची जात वालों के हुक्के तो जैसे राजमहल की शोभा मीनाकारी, फुँदे, चाँदी की नली। जमींदार जब म...
सतरंगी दुनिया- १६
व्यंग्य

सतरंगी दुनिया- १६

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ********************  आप गलती करके सुन रहे हैं तो आप ऑफिस में हैं, और अगर आप बिना गलती के सुन रहे हैं तो आप निश्चय ही घर पर हैं। दुनिया की हर चीज ठोकर लगने से टूट जाती है, लेकिन कामयाबी एक ऐसी चीज है जो कि ठोकर खाकर ही मिलती है। गरीब मांगे तो भीख, अमीर मांगे तो चंदा, करोड़पति मांगे तो डोनेशन और अरबपति मांगे तो सब्सिडी। यहाँ सभी लोग अपने हिसाब से भीख मांगते हैं। मुहुर्त के चक्कर में मत पड़िए, बिना मुहुर्त के पैदा होकर जीवनभर 'शुभ मुहुर्त' के चक्कर में फंसा इंसान एक दिन बिना मुहुर्त के प्राण त्याग देता है। पुरूष की आदत होती है हमेशा महिलाओं के बीच घुसने की, इसलिए शायद 'फीमेल' शब्द में 'मेल' आता है और 'वुमेन' में 'मेन' आता है। झूठ बोलने से पाप लगता है और सच बोलने से आग। अब आप ही बताइए, आप क्या बोलेंगे ? जिसका कोई नहीं होता, उसका खुदा होता ह...
खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली
व्यंग्य

खेल शुरू बजाओ ताली, खेल ख़त्म बजाओ ताली

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** एक कवि सम्मेलन में हमें आगे की पंक्ति में बैठा दिया गया। यह आयोजकों की कृपा कम और हमारी जुगाड़-साधना का प्रतिफल अधिक था। वीआईपी दीर्घा का टिकट हमने कबाड़ से खोज निकाला था, पर मंच पर बैठे कवि महोदय ने हमारे भीतर का सारा वीआईपी-पन झाड़कर बाहर कर दिया। इतनी तालियाँ बजवाई गईं कि क्षण भर को आत्मा कांप उठी कहीं पिछले जन्म में हम पेशेवर तालीबाज़ तो नहीं थे? फिर सांत्वना मिली नहीं, वीआईपी दीर्घा में वही बैठ सकता है जो समय-असमय ताली बजाने में पारंगत हो। मन में यह भी संतोष रहा कि यदि इस जन्म में ठीक से तालियाँ बजा दीं, तो शायद अगले जन्म में घर-घर ताले बजाने वाली योनि में जन्म न लेना पड़े। कवि ने इशारों-इशारों में यह आश्वासन भी दिया था। नेता और कवि में एक अद्भुत समानता है दोनों तालियों के भूखे होते...
तांत्रिक चौराहा
व्यंग्य

तांत्रिक चौराहा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “ज़रा बचकर चलो… कितनी बार कहा है, चौराहे के बीच से मत जाया करो!” यह वाक्य मेरे कानों में हर सुबह वैसे ही पड़ता है, जैसे अलार्म बस फर्क इतना है कि अलार्म बंद किया जा सकता है, श्रीमती जी को नहीं। मॉर्निंग वॉक पर आगे-आगे मैं और पीछे-पीछे चौकन्नी निगाहों से मेरी चाल पर नज़र रखती हुई श्रीमती जी मानो मैं किसी आतंकी संदिग्ध गतिविधि से घिरा हुआ हूँ। हमारी वॉकिंग रोड के बीचोंबीच एक चौराहा है। नगर पालिका ने उसका कोई नाम नहीं रखा, इसलिए हमने रख दिया “तांत्रिक चौराहा”। शहर के तमाम भूत-प्रेत, बाधाएँ, टोटके, यंत्र-तंत्र और अतृप्त आत्माएँ यहीं आकर लोकतांत्रिक ढंग से डंप की जाती हैं। जैसे रेलवे कॉलोनी को जनता ने अनधिकृत रूप से मॉर्निंग वॉक ट्रैक बना लिया, वैसे ही इस चौराहे को तांत्रिकों ने अधिकृत कर्मस्...
भारतीय सेना दिवस
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भारतीय सेना दिवस

प्रिया कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारतीय सेना के शौर्य, बलिदान और समर्पण को सम्मान देने के लिए हर साल १५ जनवरी को भारतीय सेना दिवस मनाया जाता है। १९४९ में इसी दिन, फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने, जो भारत के सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था। भारतीय सेना देश की सीमाओं की रक्षा करने और देश के अंदर शांति और सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीय सेना के जवान अत्यधिक ठंड, गर्मी, रेगिस्तान, पहाड़ों और घने जंगलों जैसी कठिन परिस्थितियों में दिन-रात काम करते हैं। वे देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। भारतीय सेना दिवस पूरे भारत में बड़े गर्व और सम्मान के साथ मनाया जाता है। मुख्य परेड नई दिल्ली में होती है, जहाँ सैनिक अपना अनुशासन, शक्ति और आधुनिक सैन्य उपकरण द...
सतरंगी दुनिया – १५
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सतरंगी दुनिया – १५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** जितना अगूंठा हमारा फोन पर चलता है, अगर उतना माला पर चले तो हमें भगवान अवश्य मिलेंगे। 'भला करने से भला होता है' इस कहावत से तो मेरा विश्वास ही उठ गया है, क्योंकि मैं अपनी प्रेमिका को डेयरी मिल्क, फाईव स्टार और फिर किट-कैट देता था। उसी प्रेमिका से मेरी शादी हो गयी। अब वो मुझे टिफिन में टिंडे, लौकी और करेले दे रही है। लोग अपने मोबाईल पर डी.पी. लगाते हैं। डी.पी.- मतलब दिखावटी फोटो। एक लड़की कह रही थी मैं बचपन में बहुत ताकतवर थी। मैंने पूछा- तुम्हें कैसे पता ? उसने कहा- मेरी मम्मी कहती है जब मैं रोती थी तो पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। हमें भगवान और डॉक्टर को कभी नाराज नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब भगवान नाराज होता है तो डॉक्टर के पास भेजता है और जब डॉक्टर नाराज होता है, तो वो भगवान के पास भेज देता है। जब कोई बटोरने की जगह ब...
गणतंत्र दिवस
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गणतंत्र दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** २६ जनवरी १९५० को हमारे देश को संविधान मिला, जिसने हर भारतीय को समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान दिया। आजादी हमें १९४७ में मिली, लेकिन उसे सही दिशा देने का काम हमारे संविधान ने किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनके साथियों ने ऐसा संविधान बनाया, जो हमें सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी सिखाता है यह ऐतिहासिक क्षणों में गिना जाने वाला समय था। इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें देश के हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार दिया गया है। इस दिन १९५० में हमारा संविधान लागू हुआ था। तब से भारत एक गणतंत्र देश बन गया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कितने त्...
स्वतंत्रता
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स्वतंत्रता

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** ओशो कहते हैं- जीवन जीने के केवल दो ढंग हैं: एक मालिक बनकर और दूसरा गुलाम बनकर। गुलामी में जिया गया जीवन, जीवन नहीं- केवल समय काटना है। यदि जीना है, तो मालिक बनकर जियो, अन्यथा मर जाना ही बेहतर है। यह कथन कठोर अवश्य लगता है, पर इसमें जीवन का गहरा सत्य छिपा है। मालिक बनने का अर्थ किसी पर शासन करना नहीं है। यह बाहरी सत्ता की नहीं, भीतर की सत्ता की बात है। असली गुलामी बाहर नहीं, हमारे अपने मन में है- आदतों की गुलामी, भय की गुलामी, तुलना की गुलामी, अपेक्षाओं और समाज की राय की गुलामी। मालिक बनने की यात्रा भी मन से ही शुरू होती है। सवाल यह नहीं कि हमें कहाँ पहुँचना है; असली सवाल यह है कि हम कहाँ से शुरू कर रहे हैं- भय से या बोध से। मन के आनंद का स्वाद ही मंज़िल का पता देता है। जिस क्षण व्यक्ति किसी कार्य को करते हुए सहज आनंद अनुभव करता है, उस...
नौकरिहा दामाद
आंचलिक बोली, कहानी

नौकरिहा दामाद

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी कहिनी) गाँव के गउटियाँ कहत लागें दुकलहा करा कोनो जिनिस के कमी नइ रिहिस। खेत, खार, धन दउलत, रुपिया, पइसा सबों जिनिस रिहिस। सादा जीवन उच बिचार के रद्दा म चलत दुकलहा अउ दुकलहिन मजा म जिनगी बितावत रहय। फेर संसो के बात ए रिहिस कि उँकर एके छिन बेटी चँदा जेकर बर नौकरिहा सगा देखत-देखत चार बछर होगे रिहिस। चँदा के उमर चालीसा लगे बर दु बछर कम रिहिस। सगा मन ठिकाना नइ परत रिहिस। ऐसना बेरा म पचास एकड़ खेत के जोतनदार बने रोठहाँ सगा धर के सुकलहा हर अपन मितान दुकलहा करा आनिस। फेर दुकलहा हर ये कहिके सगा मन ल मुँहाटी ले लहुँटा दिस के लइका के कुछु नौकरी चाकरी नइ हे कहिके। मोर बेटी ह अतेक पढ़े लिखे हे त नौकरिहा दामाद होना चाही। पाछु सुकलहा हर कहिस घलोक देख मितान खेती किसानी का नौकरी ले कम आय ! मनखे के चाल चलन अउ चरित ह ...
खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण
व्यंग्य

खेद है – एक राष्ट्रीय भावना का आधुनिक संस्करण

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** बड़े खेद की बात है कि इस संसार में दो ही चीज़ें सर्वत्र उपलब्ध हैं सड़कों पर खुदा और लोगों की ज़ुबान पर खेद। आजकल खेद बड़े ठसक के साथ प्रकट किया जा रहा है। जहाँ देखो, वहीं खेद। ट्रेन लेट हो जाए तो खेद, ट्रेन रद्द हो जाए तो गहरा खेद, और अगर समय पर आ जाए तो भी एहतियातन खेद क्योंकि इतनी चमत्कारी घटना पर शक होना स्वाभाविक है। रेलवे विभाग तो तब तक आपको डिब्बे में बैठने ही नहीं देता, जब तक सौ बार खेद प्रकट न कर ले। यात्री को भरोसा दिलाना ज़रूरी है कि लापरवाही हुई है, पर भावना सच्ची है। सोशल मीडिया ने खेद को लोकतांत्रिक बना दिया है। पहले खेद करने के लिए घटना चाहिए थी, अब बस नेटवर्क चाहिए। कोरोना काल में तो खेद की ऐसी बाढ़ आई कि कोई अगर गलती से मुस्कुराता हुआ फोटो डाल दे, तो लोग टिप्पणी में RIP ...
स्वामी विवेकानन्द की जयंती
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स्वामी विवेकानन्द की जयंती

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को 'अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से १२ जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयंती (जयन्ती) का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्व और उद्देश्य :- राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का महत्व और उद्देश्य आज के युवाओं को भविष्य में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें अपने देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ और जागरूक बनाना है। राष्ट्रीय युवा दिवस युवाओं को समर्पित एक विशेष दिन है। इस दिन का उद्देश्य युवाओं में समझ, प्रशंसा और ज़िम्मेदारी को बढ़...
सेतु का काम करती हिन्दी
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सेतु का काम करती हिन्दी

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** आज हम बड़े ही रोचक विषय पर बात करेंगे जी हाँ हिन्दी न केवल भाषा वरन भारतीय संस्कृति और एकता का प्रतीक हैं। हम सभी जानते है हिन्दी के जनक और जननी कौन है? जी भारतेन्दु हरिशचंद्र जी का नाम तो सुना ही होगा वो न केवल हिन्दी के जनक कहलाते बल्कि दुनिया में आधुनिक साहित्य के जनक कहलाते हैं। वहीं जननी संस्कृत जी पर हिन्दी आज भी सबसे सरल, प्रिय, विकसित भाषा है जिसे राज भाषा का दर्जा प्राप्त है, वैश्विक स्तर पर हिन्दी ने अपनी पहचान यूँ ही नहीं बनाई, आज ना केवल भारत में अन्य देश में भी हिन्दी भाषा प्रचलित है। यह तो हम हिन्दी के विकास और पहचान कैसे बनाई उसको जाने पर हिन्दी का योगदान देश के विकास में और देश को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाता रहा, हिन्दी संघ की भाषा है जो हमें जोड़े रखती हैं। यह वो मज़बूत कड़ी है जो हमें जड़ों से जोड...
लेखकों की पिकनिक
व्यंग्य

लेखकों की पिकनिक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** इस बार पुस्तक मेले में किताबों की नहीं, लेखकों की पिकनिक तय हुई। निर्णय सर्वसम्मति से लिया गया प्रगतिशील, प्रगतिवादी, प्रतिक्रियावादी, विवादप्रिय, सर्ववादी और सर्वनाशवादी सभी लेखक संघों ने मिलकर ठाना कि जब साल भर साहित्य में एक-दूसरे को स्वाद चखाते ही रहते हैं, तो क्यों न एक दिन सचमुच स्वाद खुद भी चखा जाए। अध्यक्षता का भार स्वाभाविक रूप से परम श्रद्धेय परसादी लाल जी ‘जुगाड़ी’ को सौंपा गया जो एक साथ परजीवी, बहुजीवी, बुद्धिजीवी, आलोचक, समीक्षक और विमोचक हैं। पहले उन्होंने अपनी मरणासन्न व्यस्तता का हवाला देकर आने से इनकार किया, पर प्रथम श्रेणी यात्रा-भत्ते की अग्रिम राशि ने उनमें तुरंत साहित्यिक प्राण फूँक दिए। नियम तय हुआ हर लेखक घर से बना खाना लाएगा। खुद न बना सके तो किसी और का उठा लाए, ...
वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)
व्यंग्य

वर्ष २०२६ में बारह राशियों का हास्यफल (राशिफल)

आशीष तिवारी "निर्मल" रीवा मध्यप्रदेश ******************** मेष राशि : हर साल की तरह २०२६ भी तुम से मजे ही लेकर जाएगा...अमीर बनने का सपना तुम्हारा केवल सपना ही रह जाएगा। तुम बस आमिर खान की फिल्में देखो, आमिर खान भी इसी लिए फ्लॉप हो रहा है क्योंकि तुम्हारे जैसे पनौती दर्शक हैं उसके ....प्रेम संबंधों के मामलो में लकी रहोगे कोई रुचि ही नहीं लेगी तो ब्रेकअप का भी दूर दूर तक आसार नहीं है...खैर तुम्हारी वाली ऐसा होने भी नहीं देगी....सबको तुम्हारी बहन बना देगी....स्वास्थ्य के प्रति सचेत रहना, शनि की तीसरी दृष्टि के कारण किसी कन्या पर दृष्टिपात करते हुए धरे पकड़े जाओगे और बुरी तरह जुतियाए भी जा सकते हो.!! वृषभ राशि : जैसी राशि वैसे ही बैल जैसी पर्सनालिटी है और बुद्धि भी। कर्म करने जाते हो और कांड करके आते हो। अच्छा बनने के प्रयास में हमेशा गोबर कर आते हो...आर्थिक स्थिति में सुधार के आस...
विजय दिवस
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विजय दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर साल १६ दिसंबर को मनाया जाने वाला विजय दिवस, भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह १९७१ के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की पाकिस्तान पर विजय का प्रतीक है। यह एक ऐतिहासिक संघर्ष था जिसने न केवल भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की भी पुष्टि की। यह दिन हमारे उन सैनिकों के बलिदान और वीरता का स्मरण करता है जिन्होंने आधुनिक इतिहास की सबसे निर्णायक विजयों में से एक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध में ३० लाख से अधिक लोगों की जान गई और १०० लाख बांग्लादेशी निर्वासित हो गए।26 मार्च को बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, और इसी दिन से इस युद्ध की भयावहता शुरू हुई थी। लगभग नौ महीने बाद, १६ दिसंबर को, अंततः सब कुछ समाप्त हो गया। पूर्वी और पश्चिमी पाकि...
कंजूस मक्खीचूस
व्यंग्य

कंजूस मक्खीचूस

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** अख़बार में ख़बर आई कि एक अमीर महिला को “दुनिया की सबसे कंजूस करोड़पति” घोषित किया गया है। करोड़ों की मालकिन, मगर खाने-पीने पर खर्च जैसे उसकी जान निकल जाए। कंजूस शब्द का अर्थ तो सब जानते हैं, पर कंजूसी का दर्शन वही समझे जिसने ऐसे जीवों को पास से देखा हो। मानो इनके डीएनए में ही ‘सेविंग’ का जीन बैठा हो। कंजूस लोग धन को संग्रह करते हैं, उपभोग नहीं। मगर यह भी कहना होगा कि ये लुटेरों और सूदखोरों से फिर भी भले हैं- क्योंकि कम से कम किसी का लूट नहीं करते, बस खुद को ही नहीं खिलाते। इनका आदर्श वाक्य है- “चमड़ी जाए पर दमड़ी न जाए।” गाँव में हमारे एक मास्टर साहब थे, जिनकी कोई संतान नहीं थी। अमीरी ऐसी कि सूद पर सोना गिरवी रखते, पर मिठाई सिर्फ़ दिवाली पर। एक किलो इमरती सालभर के लिए पर्याप्त। जैसे ही ...
मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश
आलेख

मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश

 दिव्याना कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ********************  मानवाधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष १० दिसंबर को विश्व भर में मनाया जाता है यह दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा १९४८ में अपनाई गई सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पत्र की याद दिलाता है, जो सभी मनुष्यों को जन्मजात अधिकार प्रदान करता है ,जिसमें ३० अनुच्छेदों के माध्यम से जीवन, गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद न्याय की शुरुआत: द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहताओं, जैसे होलोकॉस्ट और नरसंहार, ने वैश्विक स्तर पर न्याय की नई व्यवस्था की मांग को जन्म दिया। मित्र राष्ट्रों-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ ने १९४५ में नूर्नबर्ग में अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण (IMT) की स्थापना की, जो युद्ध अपराधियों को व्यक्तिगत रूप से दंडित करने का पहला मॉडल बना। इन मुकदमों ने १९४८ में संयुक्त राष्ट्र...