जंग जरूरी है
धैर्यशील येवले
इंदौर (म.प्र.)
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जंग जंग जंग
जरूरी है, जंग
स्वाभिमान के लिए।
परंतु,
जंग, छीन लेती है
मुस्कान।
टूट जाता है घोसला
चिड़िया का
जो ऊंचे चिनार की
टहनियों पर बना है।
हो जाता है पानी
सुर्ख नदियों का,
पिघलती है बर्फ
जाड़ो में भी,
और रिसने लगती है
आँखे, बून्द बून्द।
जंग जंग जंग
जरूरी है, जंग
स्वाभिमान के लिए
परंतु,
टूटी चूड़ियां
खनका नही करती
सिंदूर की लाली
मांग की हद तोड़ कर
उतर आती है,
वर्धियो पर
कस के चिपक जाती है
वर्धिया
बेजान जिस्मो पर।
फिर खो जाता है
सिंदूर अनंत में
हमेशा हमेशा के लिए।
अबोध बचपन
लाचार बुढापा
बेबस जवानी
टुकुर टुकुर
ताकते रहते है
उन बक्सों को
जो दूर कही से लाया होता है
घर के आंगन में।
सपने व सिंदूर
रिसते रहते है उसकी किनारों से
बून्द बून्द।
जंग जंग जंग
जरूरी है, जंग
स्वाभिमान के लिए
परंतु,
ढक लेते है धूल के गुबार
गेंहू की बालियों को
भर जाती है ...























