वह यादें
दीपाली शुक्ला
कसारडीह दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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वह यादें.......
ठहरी हुई है रफ़्तार आज सामने वाली सड़क में,
पर वह तो मुझे उन गहराइयों से मिलने बुलाती है,
वह यादें समंदर से बनी है या समन्दर यादों से पता नहीं,
उथल पुथल तो इसलिए मची है कि वह जरिया किसे बनाती है
कभी तहरीर की नाव मुझे मंज़िलों तक पहुंचाती है,
तो कभी तस्वीरों की उड़ान सीधे वहां छोड़ जाती है,
कभी पतंगों के धागे के साथ चढ़ जाती हूँ,
तो कभी आंसुओं की धार में ही दूर बह जाती हूँ,
कभी धुल भरी साईकल स्कूल छोड़ने जाती है,
कभी मिटटी की खुश्बू कागज के नाव बनाती है,
कभी वो गुड़िया उन गर्मियों में ले जाती है,
तो कभी गर्मियाँ उन खिलौनों की बात बताती है,
कभी पुरानी किताब के अन्दर से दुनिया पाती हूँ,
कभी उसके भीतर सालों बिताकर घंटों में लौट आती हूँ,
कभी उन यादों को मुझ जैसा पाती हूँ, तो
कभी उसका जादुई ताज पहन कायनात से खो जाती हूँ...

























