मच्छर और मैं
पवन मकवाना (हिंदी रक्षक)
इंदौर मध्य प्रदेश
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खाली बैठा
घर में खुद से
हो दो चार रहा था
जाने क्यूँ
गुस्सा मेरा
आसमाँ सातवें
पार रहा था।
इलेक्ट्रिक मॉस्किटो बेट से
घर के मच्छर मार रहा था।
या यूँ कह लो उन
तुच्छ प्राणियों को
इस भव सागर से तार रहा था।
कलयुगी वैतरणी
पार करके उनको
खुद को कृष्ण
मान रहा था।
तभी एक छोटा मच्छर
मेरे कान में
धीरे धीरे
सरकने लगा।
माथा ठनका
मन घबराया
दिल जोरों से
धड़कने लगा।
वो जोरों से दहाड़ा
कान में मेरे
मेरा सर मानो
फटने लगा।
उसने जो काटा
कान में मेरे
सर चकराया
बाँयां बाजू फड़कने लगा।
फिर जादू क्या हुआ
परमात्मा जाने
मैं मच्छर भाषा
समझने लगा।
अब मैं बैठा था
घर के कोने
मच्छर भी थे
ओने - पोने
पर आ गए अचानक
सैंकड़ों मच्छर।
मुझे समझाने लगे
की सुन बे ओ खच्छर।
हम दुश्मन नहीं
सोश्यलिस्ट हैं।
देश में समानता लाने में
बस हमीं फिट हैं।
अमीरों -और गरीबों में
हम फर...




















