सच से ऊबते लोग
सूर्यपाल नामदेव "चंचल"
जयपुर (राजस्थान)
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पानी से पानी का चरित्र पूछते हैं लोग,
आईना देख शर्म से पानी में डूबते हैं लोग।
लाखों की भीड़ में खुद को ही ढूंढते हैं लोग,
क्यों आज फिर लगा कि सच से ही ऊबते हैं लोग।
खुदगर्ज हैं कि अरमानों में ही टूटते हैं लोग,
मतलबपरस्ती में लोगों की खुशी लूटते है लोग।
गुनाहों को अपने आसानी से भूलते है लोग,
क्यों आज फिर लगा कि सच से ही ऊबते हैं लोग।
मुश्किलों में अपनी जी जान फूंकते है लोग,
कठिनाइयों में लोगों की खुशी से झूमते हैं लोग।
शर्मसार हो खुद जब फिर आंखें मूंदतें है लोग,
क्यों आज फिर लगा कि सच से ही ऊबते हैं लोग।
कामयाबियों को अपनी सरेआम चूमते हैं लोग,
सफलताओं को दूसरे की शक से घूरते हैं लोग।
फल कर्मों का मिल जाए तो रूठते है लोग,
क्यों आज फिर लगा कि सच से ही ऊबते हैं लोग।
परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल"
शिक्षा : ...




















