क्या करोगे जानकर
श्रीमती विभा पांडेय
पुणे, (महाराष्ट्र)
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क्या करोगे जानकर
मेरे बारे में।
समझ नहीं पाओगे।
इसीलिए
तुम अपनी सुनाओ।
अपने जीत का
कोई गीत गुनगुनाओ।
मेरे हृदय के छाले देख घबराओ मत,
वो तो अपनों ने दिए हैं,
वो ही तो हार हैं मेरे गले का।
नहीं , मत लगाओ मोल इस हार का
तुम इतने बड़े सौदागर नहीं।
नहीं समझ पाओगे इनकी कीमत
क्योंकि
अभी समय और रिश्तों की चक्की में,
तुम पिसे नहीं ,
नफरतों के सील-बट्टों से
तुम घिसे नहीं।
ये रिश्ते ना, बड़े अजीब होते।
दूर के ढोल जैसे
सुहावने से प्रतीत होते हैं।
पर जब उतरो इस सागर में,
तब सच्चाई दिखती है।
उसमें तैरती गंद को देख
बड़ी तकलीफ़ होती है।
मृगतृष्णा हैं सारे
भ्रम के हैं बादल ये कारे।
बस स्वार्थ तक ही सीमित,
होते कई रिश्ते हमारे।
इसीलिए
मत पूछो मुझसे कुछ भी
अंदर तक जला है दिल
फूट पिघलेगा।
सुनाओ अभी अपनी कहानी
क्योंकि
अभी कोरा है रिश्ता,
यहीं से अभी
समय...
























