दीपावली
शरद जोशी "शलभ"
धार (म.प्र.)
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आदतन इस हादसे पर भी बजा लें तालियाँ।
अब उजालों को अँधेरे दे रहेे हैं गालियाँ।।
सूर्यवंशी दीप करते जुगनुओं की चाकरी।
गीत ग़ुम नेपथ्य में, मंचस्थ मुखरित गालियाँ।।
पाप के कुछ पेड़ पुरखों ने उगाए थे कभी।
छीन लेतीं पंछियों के प्राण जिनकी डालियाँ।।
भर दिए आँसू दीयों में, मन गई दीपावली।
मन बहुत भारी रहा हल्की हथेली थालियाँ।।
दीप रखती थी हमारे द्वार भी जब ज़िंदगी।
कौंधती है याद में अक्सर गई दिवालियाँ।।
"शलभ" की ग़ज़लें कि जैसे चाँद के रूमाल पर।
बुन रही है एक लड़की उँगलियों से जालियाँ।।
परिचय :- धार (म.प्र.) निवासी शरद जोशी "शलभ" कवि एवंं गीतकार हैं।
विधा- कविता, गीत, ग़ज़ल।
प्राप्त सम्मान-पुरस्कार- राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर (hindirakshak.com) द्वारा हिन्दी रक्षक २०२० राष्ट्रीय सम्मान एवं विभिन्न साहित्यिक संस्थाओं द्वारा वाणी भूषण, साहित्य सौ...























