मै कामगार हूँ
गोविंद पाल
भिलाई, दुर्ग (छत्तीसगढ़)
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बहुत उम्मीदें बांधी थीं हमने तुमसे
हम भी देखे थे कितने सारे सपने,
अपना समझकर सत्ता पर बिठाया
पर तुम नहीं निकले कभी अपने।
समझने की कभी कोशिश नहीं की
कैसे बनायें रखें हमारा स्वाभिमान,
जब बुनियादी हक ही हमें न मिले
तो समझो ये मानवता का अपमान।
हम तो कामगार है हम कामचोर नहीं
पर हमें उचित रोजगार और काम दो,
खैरात बांट बांट कर पंगु बना दिये हो
अब हमें कामचोर का न बदनाम दो।
अशिक्षित अनपढ़ और गंवार हूँ भले ही
पर मैं आत्मसम्मान के लिए लड़ता हूँ,
हो सकता है तुम ढेरों पुस्तक पढ़े होंगे
पर मैं तो जिन्दगी का किताब पढ़ता हूँ।
हैसियत की बातें मत करो तुम मुझसे
पूंजी है मेरी जिंदादिली की खुद्दारी,
उॠण होने के लिए बहाता हूँ पसीना
नहीं कर सकता हूँ धरती माँ से गद्दारी।
पर शोषण के खिलाफ ऊंगली उठाता हूं
जो हक के लिए संघर्ष करना है जरूरी,
इंसानियत का तका...























