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गद्य

स्वयं ही स्वयं को पहचानिये
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स्वयं ही स्वयं को पहचानिये

माधवी तारे लंदन ******************** बचपन से एक मराठी गीत रेडियो पर सुनना अच्छा लगता था। सुधीर फडके जी के स्वरों में वह गीत बहुत मधुर लगता। उसका अर्थ कुछ ऐसा था कि मानव जन्म में ही मनुष्य से देवत्व प्राप्त करने किया जा सकता है यही तुलसी रामायण का एक मुख्य तत्व है। यह लेख भी कुछ ऐसे ही विचारों से भरपूर है। हम अक्सर देखते हैं कि मनुष्य को स्वर्ण की बहुत चाह होती है। और इसी से आंका जाता है कि व्यक्ति कितना संपन्न है। इस शरीर के सौंदर्य में स्वर्ण और चांदी चार चांद लगाते हैं। लेकिन हम ये अक्सर भूल जाते हैं कि इस ईश्वर प्रदत्त शरीर की कीमत सोने चांदी से कहीं अधिक है और बहुत मूल्यवान है। लेकिन मनुष्य चौर्यमयी सोने का अधिक जतन करता है और शरीर रूपी सोने को बिलकुल भूल जाता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि अनेक योनियों में भटकने के बाद हमें मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है। सोने की लंका के गुणग...
नौकरी- क्यों करी
व्यंग्य

नौकरी- क्यों करी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** पहले के ज़माने में हमारे युवा मुल्क जीतने, फतेह करने निकलते थे। यात्राएँ करते थे, या फिर किसी के प्यार में पागल होकर फ़रहाद-मजनूँ-महीवाल बन जाते थे- क्रमशः शीरीं, लैला और सोनी की तलाश में भटकते रहते थे। वे इब्ने-बतूता, वास्को-डी-गामा और राहुल सांकृत्यायन की तरह सभ्यताओं, संस्कृतियों, द्वीपों-महाद्वीपों की खोज में निकलते थे। लेकिन आज की तारीख़ में युवाओं ने इन सबको अलविदा कह दिया है- अब तो एक ही खोज बची है- वो है नौकरी। कोई पूछे कि नौकरी क्यों करी? तो हम कहेंगे-गरज पडी इसलिए करी। और गरज है कि- बिन नौकरी छोकरी नहीं आती। विद्या ददाति सरकारी नौकरी, सरकारी नौकरी ददाति सुंदरी कन्या। बड़ी हसीन है ये नौकरी। ये जिधर भी निकले, इठलाती-बलखाती, भाव खाती ..नौकरी इतना भाव खाती है की एक बार मिल जाने...
सतरंगी दुनियां
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सतरंगी दुनियां

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** क्या कड़वे पौधे से मीठे फल आ सकता है? जी हां धैर्य एक कड़वा पौधा है पर फल हमेशा मीठे ही आते है। अपना बैंक बैलेंस देखकर खुश मत होइए जनाब, ऊपर वाला हिसाब तो आपके कर्मों का करेगा। चार लोग क्या कहेंगे? अक्सर कोई भी काम करने से पहिले हम सोचते है। चार लोग आपकी आपकी तेरहवीं पर कहेंगे "पूड़ी गरम लाना।" इसलिए उन चार लोगों में अपना अमूल्य समय बर्बाद न करें अपने कार्य में व्यस्त रहें। समय सबसे बलवान है। आप कुछ भी योजना बना ले पर होता वही है जो समय चाहता है। एक महिला सरकारी कार्यालय पहुंची और विधवा पेंशन का फार्म भरने लगी क्लर्क ने पूछा आपके पति को मरे कितना समय हुआ है? महिला ने बताया वो अभी बीमार है। फिर आप विधवा पेंशन का फार्म क्यों भर रही है? अरे भाई सरकारी काम में बहुत समय लगता है। जब तक मेरी पेंशन पास हो जायेगी तब तक शाय...
प्रकृति पूजक आदिवासी
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प्रकृति पूजक आदिवासी

मोहर सिंह मीना "सलावद" मोतीगढ़, बीकानेर (राजस्थान) ******************** विश्व आदिवासी दिवस ९ अगस्त को पूरे विश्व में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। भारत में सबसे पहले से रहने वाले आदिम लोगों के बंशज आदिवासी ही है। भारत की २०११ की जनगणना के अनुसार लगभग ११ करोड़ आबादी हैं जो भारत की लगभग 8.५ प्रतिशत हैं। आदिवासियों का जीवन धरती, जल, जंगल, वन्य जीवों के साथ एवं संपूर्ण मानवता के साथ परस्पर पूरक और संरक्षित है। भारत देश में आजादी के ७५ वर्ष बाद भारत के सर्वोच्च पद पर प्रथम आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू जो कि सबसे कम उम्र की प्रथम राष्ट्रपति भी है। आदिवासी शब्द दो शब्दों से आदि और वासी से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है उस देश के मूल निवासी अगर सिर्फ भारत की बात की जाए तो १० से ११ करोड़ की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है आदिवासी समुदाय में मुंडा, संथाल, मीणा, भील, गरासिया, उरांव आदि अन...
एक राष्ट्र, एक चुनाव- बेरोज़गारी के बढ़ते भाव
व्यंग्य

एक राष्ट्र, एक चुनाव- बेरोज़गारी के बढ़ते भाव

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** देश में "वन नेशन, वन इलेक्शन" का पुछल्ला बड़े जोर-शोर से उछाला जा रहा है। जाहिर है, जब सभी अपनी राय उंडेल रहे हैं, तो भला मैं क्यों चुप रहूँ? राय देने में रत्ती भर भी गुरेज नहीं है अपुन को… कोई माने या न माने। मुझे तो देश के युवाओं की रोज़ी-रोटी पर लात मारने जैसा लग रहा है यह! ज़रा उन लोगों की सोचो जो चुनावों के चूल्हे पर ही अपनी दो जून की रोटी सेंकते हैं । उनकी तो रोज़ी-रोटी ही छिन जाएगी साहब! वैसे ही देश में रोज़गारों की भट्टी बुझ चुकी है… थोड़ा-बहुत रोज़गार इस चुनावी सीज़न में मिल भी जाता है… सरकार उस पर भी छीना-झपटी करना चाहती है! देखो न, नज़र उठाकर… भारत के नक्शे पर उंगली फेरो ज़रा… कहीं न कहीं कोई न कोई राज्य पर लटकी हुई हैं चुनावी झालरें… चुनावी सावों का दौर- जुलूस, जलसा, जुगाड़…...
चलो आज फिर मास्टरी कर लेता हूँ – भाग-1
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चलो आज फिर मास्टरी कर लेता हूँ – भाग-1

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** नोट- यह ज्ञान मेरे द्वारा हृदयंगम की गई अनुभूति और उसके मन्थन का निष्कर्ष है जो कई विद्वानों की मान्यताओं से भिन्न भी हो सकता है। इतर होने पर जिज्ञासु मुझसे सम्बन्धित विषय पर प्रश्न पूछ सकते हैं। कई जिज्ञासुओं ने जानना चाहा है कि - प्रश्न- देवनागरी लिपि में 'क','ख' 'ग' 'ज', 'प' आदि को अमात्रिक बताया जा रहा है क्या यह उचित है? उत्तर- "नहीं"। स्वर रहित वर्ण को ही अमात्रिक कहना सही है जैसे क्,ख्,ग्, आदि, किन्तु किसी वर्ण पर कोई भी स्वर होने पर वह मात्रिक हो जाता है। इसलिए क,ख,ग अमात्रिक नहीं हो सकते हैंं, क्योंकि इनमें अ स्वर मिला हुआ है। प्रश्न - सर ! अन्य मात्राओं की भाँति इन वर्णों पर कोई मात्रा (किसी स्वर का चिह्न) तो दिखाई ही नहीं दे रही है ? उत्तर- हमारी देवनागरी लिपि में सभी वर्णों की आकृति ...
बस दो शब्द
व्यंग्य

बस दो शब्द

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** कहते हैं, शब्दों का प्रयोग सोच-समझकर करना चाहिए। शब्द वो हथियार हैं जो घाव भी करते हैं और मलहम भी लगाते हैं। इन्हें ब्रह्मस्वरूप माना गया है। शायद इसी कारण "दो शब्द" का कॉन्सेप्ट जन्मा। मंचों पर अक्सर देखा जाता है कि वक्ता से "दो शब्द"कहने का अनुरोध किया जाता है। मगर "दो शब्द" की सच्चाई इससे कहीं आगे है। दो शब्द आपको सही कहने में जायें तो आपको कोई भी भाषाधिकारी, वादव्य, वाकपति, वाक्य विशारद वागीश, शब्देश्वर, ब्राह्मणोत्तम, शब्द शिल्पकार, वाक नायक, वागीश्वर, वाग्मी, वाग्विलासी, वाचस्पति, वादेंद्र, वाद वित्त, विदग्ध, साहबे जबा, सुवक्ता, सुवग्नी कहलाने से नहीं रोक सकताl शब्द बड़े हिसाब से खर्च करने चाहिए, इसलिए मौन को मूर्खों का आभूषण बताया गया है। क्योंकि मूर्ख अगर मौन ही रहें तो ठीक है, ...
मकान मालिक की व्यथा
व्यंग्य

मकान मालिक की व्यथा

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सच पूछें तो आज के ज़माने में सबसे कठिन काम है मकान मालिक बनना। शादी में ३६ गुण नहीं मिलें तो चल जाता है, पर मकान मालिक और किरायेदार के बीच तो हमेशा ३६ का आंकड़ा रहता है। कहते हैं ना कि आपके किए का फल इसी जन्म में मिलता है। इसी कारण "क्योंकि सास भी कभी बहू थी" की तर्ज़ पर जो आज मकान मालिक है, वो कभी किरायेदार भी रहा होगा। जिस प्रकार आपने किरायेदार रहते हुए अपने मकान मालिक की नाक में दम कर दिया था, उसी का बदला भगवान आपको इसी जन्म में मकान मालिक बनाकर लेता है। पता नहीं कब हमारे भाग्य में शुक्र ग्रह अतिक्रमण करके मेष राशि की कुंडली में बैठ गया कि हमें एक विला बनाने का शौक चढ़ा। इस शौक को चढ़ाने में कुछ मेरे यार भी थे, जो “चढ़ जा बेटा सूली पे, तेरा भला करेंगे राम” की तर्ज़ पर पूरा योगदान दे र...
पौराणिक सच- हमारे पुराणों का सच
पुस्तक समीक्षा

पौराणिक सच- हमारे पुराणों का सच

सुधा गोयल द्वारा लिखित 'पौराणिक सच' पुस्तक की विवेचना लेखक :- नील मणि मवाना रोड (मेरठ) *************** हिंदू धर्म में वर्णित १८ महा पुराणों (एक पुराण लगभग ७००-१००० पेज) के गहन अध्ययन के बाद लेखिका श्रीमती सुधा गोयल जी ने "पौराणिक सच" नामक किताब में अलंकारिक व शुद्ध साहित्यिक हिंदी भाषा में कुछ चमत्कृत व हैरान कर देने वाले तथ्य चुन चुन कर कहानी के रूप में पाठकों की थाली में परोसे हैं। सन २०२२ में ‘नमन प्रकाशन’ नई दिल्ली द्वारा प्रकाशित "पौराणिक सच" की कहानियां को पढ़ने के बाद पुराणों में वर्णित पाठ्य सामग्री की झलक स्पष्ट हो जाती है। मेरी तमन्ना रही थी कि कुछ पुराणों का अध्ययन करूं, जो "पौराणिक कथाओं का सच" जानकर काफी हद्द तक तृप्त हो गई है। पुराणों में देवताओं की भोग, छल कपट व ईर्ष्या की प्रवृत्ति सर्वत्र वर्णित है। लेखिका ने पौराणिक सच की भूमिका में साहसिक तौर पर लिखा है कि प...
प्रेम का दोष …?
आलेख

प्रेम का दोष …?

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** यदि मेरा हृदय किसी से अनजाने में, अनचाहे, पर अटूट प्रेम कर बैठता, और मैं उस प्रेम को केवल इसलिए कुचल देता क्योंकि वह समाज की निर्धारित सीमाओं के भीतर नहीं था? नहीं... मैं उस प्रेम को स्वीकार कर लेता। उस आकर्षण को, उस आत्मीयता को, उस जीवन भर के साथ का वचन देने वाले भाव को, विवाह के पवित्र बंधन में बाँध लेता। किन्तु यह कल्पना मात्र ही रोमांच उत्पन्न कर देती है। क्योंकि मेरा यह निर्णय, जो मेरे और मेरे प्रेमी/प्रेमिका के लिए जीवन की नई प्रभात होता, वही समाज के एक वर्ग के लिए काली घटा बनकर आता। और इस काली घटा के तले सैकड़ों जीवन नष्ट हो जाते- कोई अपने सम्मान के नाम पर आत्मघात कर लेता, तो कोई कथित 'सम्मान' बचाने के नाम पर हिंसा की भेंट चढ़ जाता। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, यह भारतीय समाज के उस क्रूर यथार्थ का काला पक्ष है जहाँ 'प्रे...
पहली बारिश मेरे शहर की
व्यंग्य

पहली बारिश मेरे शहर की

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** रविवार, शाम का वक्त थोड़ा सा सुकून भरा होता है, क्योंकि मेरे रेलवे अस्पताल की ड्यूटी से राहत रहती है। इसलिए दिन के नैपिंग टाइम को थोड़ा ज़्यादा खींच लेता हूँ। सोकर उठा तो पाँच बज गए थे। हड़बड़ाकर नीचे फ़ोन किया कि क्या हुआ, आज ओपीडी से बुलावा नहीं आया? स्टाफ बोला- “सर, बाहर बारिश हो रही है।” बारिश! मुझे पता ही नहीं चला। शहर में पहली बारिश और हम यहाँ कमरे में पड़े कृत्रिम एसी की हवा में बरसात के विलक्षण आनंद से वंचित। ये बारिश भी न! सबसे ज़्यादा ख़ुशी अगर किसानों को देती है तो उसके बाद मेरे स्टाफ को। क्योंकि बारिश है तो मरीज़ कोई आएँगे नहीं, और बिना कुछ एक्स्ट्रा प्रयास के ही उनकी ढींगामस्ती में चार चाँद लग जाएँगे। शहर के मकान कुछ इस तरह से बन गए हैं कि पहली बारिश कब हो जाए, कब चली जाए,...
योग से सहयोग तक की यात्रा
आलेख

योग से सहयोग तक की यात्रा

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** यात्रा तो हम सभी करते है पर आज हम जो यात्रा कि बात कर रहे वह यात्रा सफल यात्रा है और हम सभी को करना भी चाहिए आइये आज संक्षिप्त में हम योग, सहयोग और उसके लाभ पर बात करते है। हम सभी जानते है योग की उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी, योग शब्द संस्कृत से आया जिसका अर्थ है जोड़ना एकजुट होना योग प्राचीनतम जीवन शैली जो मन आत्मा शरीर को संतुलित करने में मदद करती है योग एक यात्रा है ना कि कोई मंजिल। ऐसी यात्रा जो निरन्तर अभ्यास और समर्पण से आगे बढ़ती है। योग हमारे भीतर छिपे असीम सामर्थ्य को पहचानने और उसका उपयोग करने का साधन जिस दिन से योग जीवन का हिस्सा बनता है उस दिन से योग जीवन से दूर जाना दिखता है। युज शब्द के तीन अर्थ उपलब्ध समाधि, संयोग, संयमन। सुख दुख,मान अपमान सिद्ध-असिद्धि, आदि विरोधी भावों में भी समान रहने को ही भगवान ने ...
बीवी बनी वकील
कहानी

बीवी बनी वकील

बृज गोयल मवाना रोड, (मेरठ) ******************** आज तिलक का पुणे से पत्र आया है। मैं पढ़कर आत्म विभोर हो गई हूं… जो सिर्फ स्वप्न मात्र था आज साकार रूप में फलदार छाया वाला कल्पवृक्ष बन, मेरे सामने पनप रहा है। उसकी छाया में मेरा तन मन प्रफुलित हो गया है, आज तो सचमुच ऐसा लग रहा है कि तपते रेगिस्तान में चलते-चलते थक कर, आज शीतल शांत छल-छल बहती सरिता के किनारे आ बैठी हूं, जहां सुंदर उपवन है, कुहुकती कोयल है, आज तो पुरवाई बयार भी संगीतमय लग रही है। तिलक डॉक्टर बन गया है। मैं बार-बार पढ़कर भी जैसे विश्वास नहीं कर पा रही थी। अलट पलट कर पत्र पढ़ते-पढ़ते में बीते दिनों में चली गई। विपुल के रूखे व्यवहार से मैं तंग थी। बच्चे भी विपुल के घर में रहते आतंकित से रहते थे। एक भय का साया सा मंडराता रहता था। सब चुप और दुपके दुपके से रहते थे। न जाने कब किसकी तबाही आ जाए… एक दिन विपुल नहा रहे थे, मैं ...
बधाई हो! आपको किताब हुई है …
व्यंग्य

बधाई हो! आपको किताब हुई है …

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** अभी तक तो बस हम बधाई ही देते आए थे, किसी लेखक के पुस्तक होने की बधाई! जी, बढ़िया बात तो है ही, जनाब... लेखक का "गर्भाधान" तब होता है, जब विचारों का मिलन स्याही से होता है। "गर्भस्थ शिशु" की तरह रचना पलती है- कभी उबकाई (लेखक का असंतोष), कभी मूड स्विंग (संशोधन), और कभी पौष्टिक खुराक (प्रेरणा) मिलती है। संपादक स्त्री रोग विशेषज्ञ बनकर जांचता है, प्रकाशक अल्ट्रासाउंड करता है-"किताब स्वस्थ है या सी-सेक्शन लगेगा?" प्रकाशन के दिन प्रसव पीड़ा चरम पर होती है, और किताब कागज़ पर जन्म लेती है। समीक्षकों की गोदभराई में तारीफ और आलोचना के टीके मिलते हैं। फिर वह पाठकों के संसार में किलकारी भरती है- कुछ इसे पालते हैं, कुछ अनाथालय में छोड़ देते हैं! लेकिन अब हम भी बधाई के पात्र बन गए जी... अरे, हमारी भी...
अपेक्षा भंग
लघुकथा

अपेक्षा भंग

माधवी तारे लंदन ******************** कई सौ परिवारों से भरपूर एक सोसायटी की एक बहुमंजिला इमारत में एक दंपति रहता था। वो पति पत्नी इतने कंजूस थे कि मक्खी के चाय में गिरने पर मक्खी को चूस कर चाय पी सकते थे। जाहिर है उनकी न तो इमारत में, न ही सोसायटी में कोई दोस्ती थी न तो वो रिश्तेदारों से मिलते थे न ही रिश्तेदार उनके यहां आते थे। उनकी बिल्डिंग के लोग उन्हें देखते ही उनसे दूर ही भागते थे कि कहीं कुछ मांग न लें। प्रकृति का विनाश कर बनी ये सीमेंट कंक्रीट की इमारतें जैसी भावना शून्य होती हैं वैसे ही ये दोनों थे, घर में भी वह हर संभव कंजूसी करते थे। बचत और कम सामान में जीवन यापन करने की कला इनके पास कुछ ज्यादा ही थी वो इस डर से कहीं आते जाते नहीं थे कि कहीं पैसा न खर्च हो जाए। अच्छी नौकरी से रिटायरमेंट के बावजूद इन्होंने किसी शौक, जरूरत पर कम से कम पैसा खर्च करने पर ही जोर दिया बेवजह कटौती की...
नाई चाचा की दुकान
व्यंग्य

नाई चाचा की दुकान

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** ओपीडी में बैठा, प्लास्टर रूम से एक अधेड़ उम्र की महिला की चीख सुन रहा था। दरअसल उसका प्लास्टर काटा जा रहा था। प्लास्टर कटाई मशीन की धरधाराती आवाज़ और महिला की चीख, दोनों ने माहौल को बेहद डरावना बना रखा था। मैं सोच रहा था कि क्या मेरे जीवन में इससे भी बुरा और डरावना दृश्य हो सकता है। तभी मुझे याद आया कि हां, बिल्कुल है, और शायद उससे भी ज्यादा डरावना अनुभव था बचपन में नाई चाचा के सैलून में हेयर कटिंग का। किसी रामसे ब्रदर्स की डरावनी फिल्म की स्क्रीनिंग से भी डरावना वह दृश्य होता, जब हम लगभग घिसटते हुए पिताजी के हाथों नाई चाचा की दुकान तक पहुंचाए जाते। नाई चाचा की दुकान गाँव के हिसाब से सबसे आकर्षक, रहस्यमयी, डरावनी और रोमांच भरी होती थी। दुकान में एक पुरानी, टूटी-फूटी मेज थी, जिसकी एक टूट...
शरणागति
आलेख

शरणागति

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** मैं चाहूँगी कि यदि जीवन को धन्य करना चाहते हो तो शरणागति को समझते हुए आगे कैसे बढ़ना है- जानते हैं सर्वप्रथम शरणागति का अर्थ या संक्षिप्त परिभाषा किसी भी चीज़, ख़ासकर भगवान नारायण (कृष्ण) के या भगवान श्रीराम के प्रति पूरी तरह से समर्पण करना अपने अहंकार का त्याग और भगवान के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित रहना शामिल है। शरणागति या प्रपत्ति अति संक्षिप्त में कहूँ तो मन की वह अवस्था जिसमें भगवान से प्रार्थना की जाती है कि वे भक्त को बचाने का साधन बनें यह अनुभूति इस बात से जुड़ी है कि भक्त पूरी तरह असहाय है, पापी है,तथा उसके पास अन्य मोक्ष की कोई आशा नहीं। शरणागति का शाब्दिक अर्थ है शरण में आया हुआ व्यक्ति। शरणागति के मुख्य चार प्रकार बताए गए हैं जो हम इस तरह से जान सकते हैं … भगवान की आज्ञाओं का पालन करना। भगवान के नाम का जप कर...
संतकृपा
संस्मरण

संतकृपा

माधवी तारे लंदन ******************** अपनापन खो जग में अपना मिलता है जग सपना भी अपने को सोकर ही मिलता है जब हार न पाया मैं अपनापन जगने में तब जग को अपनी जीत सुनाना चाहती हूं सबको ऐसा अनुभव जीवन के किसी न किसी मोड़ पर आता ही है. कॉलेज की पढ़ाई पूरी करके, रोज कहीं न कहीं नौकरी की अर्जी देना, साक्षात्कार के लिये जाना ये सिलसिला मुझे आज भी याद है। पीएससी के इंटरव्यू के लिये नागपुर गई थी। तब सोलह सोमवार जैसा कड़क व्रत मेरा था। मां ने हजारों सूचनाओं से मेरा दामन भर दिया था। ये नहीं खाना, वो नहीं करना ऐसी अनेक सूचनाएं पल्लू में भरकर में गाड़ी में बैठ गई। किसी ने सहृदयता से भी कुछ दिया तो हाथ में लेना नहीं। मां के कहे अनुसार आचरण करते हुए और भगवान की कृपा से इंटरव्यू का नतीजा भी अच्छा रहा। प्रथम नौकरी पुरुषों के डीएड कॉलेज में मिली। वरिष्ठ अधिकारी ने आश्वासन दिया था कि दो-तीन महीने मुझे म...
बाबा साहब का कुर्ता
लघुकथा

बाबा साहब का कुर्ता

अमिता मराठे इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** बाबा ने फूल का गट्ठर रखते हुए कहा, "बाईजी, जरा एक गिलास पानी दे दो। पानी लेकर, रेखा भी पुराने कपड़े गिनाने लगी।" बाबा साहब का कुर्ता नजर नहीं आ रहा है। बाईजी, "बहू से पूछकर बताती हूं।" देखिये, उसकी हेराफेरी इतनी बड़ी कीमती है, जो होनी नहीं चाहिए। साहब का पसंदीदा पहरावा है। हां बाईजी, "ध्यान रखने को कहा हूं। मेरा तो बस इतना ही काम है आस-पास के लोगों के कपड़े पहनना। भला अब मेरी उम्र भी क्या हो गई है, एक पैर कब्र में ले जाया जा रहा हूं, कभी भी बुलावा आ जाए।" बाबा ऐसे तैयार रहो रहने वालों की उम्र और बड़ी होती है बाबा बाबा ने रेखा को ऊपर से नीचे तक देखकर बोला, "जिंदगी भर ठाट से रह रही है, बाईजी, बड़े से बड़े लोगों के काम में। कभी-कभी झटकाकर नहीं चलता। जमाना पलट गया है, बेटों का राज आया, फ़टे हाल से भी फ़टा सामान बना है। फटी धोती दिखाते...
हड्डियों की चीख़…
व्यंग्य

हड्डियों की चीख़…

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** “कृपया कमजोर दिल वाले इस रचना को नहीं पढ़ें“ अपने प्रतिष्ठान में, अपनी कुर्सी में गहराई से धँसा, कुछ मरीज़ों की हड्डियों और पसलियों को एक साथ मिला रहा था, तभी पास के प्लास्टर कक्ष से, जहाँ एक अधेड़ उम्र की महिला थी, उसके चिल्लाने की आवाज़ आई। साथ ही, प्लास्टर काटने के लिए इस्तेमाल की जा रही कटर मशीन की गड़गड़ाहट सुनाई दी, मानो कोई मशीनगन चल रही हो। यह प्लास्टर काटने का खौफनाक मंज़र किसी रामसे ब्रदर्स की हॉरर फ़िल्म से भी ज़्यादा डरावना। यूँ तो प्लास्टर काटने का समय मैं ओ.पी.डी. के बाद का रखता हूँ, इसका एक विशेष प्रयोजन है... मुझे आवाज़ के शोरगुल में बच्चों को पेरेंट्स की गोद में दुबकते सिसकते देखना अच्छा नहीं लगता। कई मरीज़, जिनका प्लास्टर लगना होता है, अपना इरादा बदल देते हैं। बोलते हैं- ...
एक रिटायरी की कहानी- “पिया घर आया”
व्यंग्य

एक रिटायरी की कहानी- “पिया घर आया”

सुधा गोयल बुलंद शहर (उत्तर प्रदेश) ********************  हां जी यह सही है कि पिया यानि मेरे पतिदेव पैंतालीस साल आफिस में एक कुर्सी पर बैठ कर थक चुके और बिना कुर्सी के घर आए हैं बलैयां लूं या पूजा का थाल लेकर आरती उतारुं,गल हार पहनाऊं और कहूं -"पधारो सा"।उम्र के इस पड़ाव को चूम लूं। अब हम दोनों गलबहियां डालकर रहेंगे। तुम रिटायर हो ही गये हो में भी बहू पर घर परिवार छोड़ कर रिटायर हो जाती हूं। अभी इतना सोच ही पाई थी कि बहू रानी की भृकुटी देखकर चौंक पड़ी- "सासू मां, अब आप रिटायर होने की मत सोचना। दो-दो रिटायरियों को कैसे झेल पाऊंगी?" मैंने घूम कर देखा-सुना बहू के चेहरे पर चिंता की लकीरें थीं। पर क्यों- ? यह मैं समझ नहीं पा रही थी। अगले दिन से घर में रिटायरमेंट का कार्यक्रम शुरू होने वाला था। अथ कथा रिटायरमेंट सुनाकर अपना जी कुछ हल्का कर लेती हूं। दस बज गए हैं पर पतिदेव के पांव बिस्तर से न...
पिता का मौन तप
कहानी

पिता का मौन तप

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** राजस्थान के मारवाड़ प्रदेश में बसा छोटा-सा गाँव था सुंदरसर। यहाँ की बलुई धरती सूर्य की तपिश सहती थी, रेतीले टीलों के बीच हरे-भरे खेत बाजरे की फसल से लहलहाते थे, और लोगों के चेहरों पर राजपूतानी सहनशीलता की छाप थी। इसी गाँव के एक छोर पर, खेजड़ी के पेड़ की छाया में, नारायण गर्ग का मिट्टी से लिपा-पुता कच्चा घर था। नारायण गर्ग- नाम में ही एक गरिमा और दायित्वबोध था। पचपन वर्ष के इस किसान के चेहरे पर धूप और लू ने गहरी झुर्रियाँ खोद दी थीं, लेकिन आँखों में अपने परिवार के प्रति अटूट प्रेम और जिजीविषा चमकती थी। उनकी धर्मपत्नी, संतोष देवी, गृहणी थीं- घर की छोटी-सी दुनिया को संचालित करने वाली अविचल स्तंभ। उनका सारा जीवन चूल्हा-चौका, बच्चों की देखभाल और पति के साथ खेत के कामों में बीता था। चेहरे पर सदा एक शांत संतोष, किन्तु आँखों के को...
चूहों का आतंक
व्यंग्य

चूहों का आतंक

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** सरकारी दफ़्तर-सा था... नहीं-नहीं, सरकारी दफ़्तर ही था... अब आप कहेंगे, कौन-सा दफ़्तर? भई, मुझे तो सब दफ़्तर एक जैसे ही नज़र आते हैं। दफ़्तरों की शक्ल एक जैसी, वहाँ कुर्सी पर बैठे अधिकारियों की शक्ल बिल्कुल एक जैसी... जैसे माँ-जाए भाई या बहन हों। सरकारी नाम आते ही एक चिर-परिचित छवि आपके मन में बन ही गई होगी... बननी ही चाहिए... क्योंकि मेरी तरह आप सभी का भी नित-प्रतिदिन इन सरकारी दफ़्तरों से पाला पड़ता ही है। बस ऐसे ही किसी दफ़्तर के बरामदे में पड़ी टूटी बेंच पर मैं पड़ा हुआ हूँ। क्योंकि मुझे बुलाया नहीं गया था, अपनी मनमर्ज़ी से मुँह उठाए यहाँ चला आता हूँ, इसलिए घर के बाहर गली के कुत्ते की तरह मालिक की रहमो-करम की नज़रों की इनायत हो जाए, बस यही इंतज़ार कर रहा हूँ। एक लफ़ड़ा हो गया... न ज...
मैं क्या हूँ ….?
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मैं क्या हूँ ….?

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** मनुष्य के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब वह स्वयं से यह प्रश्न करता है - "मैं क्या हूँ ?" यह प्रश्न केवल शरीर, नाम, या पहचान तक सीमित नहीं होता, बल्कि आत्मा, उद्देश्य, और अस्तित्व की खोज की ओर संकेत करता है। जब हम कहते हैं "मैं", तो हम क्या दर्शाते हैं ? क्या यह शरीर "मैं" है ? क्या यह विचार, भावनाएँ, या यादें "मैं" हैं ? या फिर कुछ और है जो इन सबसे परे है ? हमारा शरीर समय के साथ बदलता है - बाल सफ़ेद हो जाते हैं, चेहरा झुर्रियों से भर जाता है, लेकिन फिर भी भीतर एक एहसास बना रहता है कि "मैं वही हूँ।" इसका अर्थ यह हुआ कि "मैं" केवल शरीर नहीं हो सकता। यह तो केवल एक वाहन है, जिससे आत्मा इस संसार में कार्य करती है। मन हमें सोचने, समझने, और महसूस करने की शक्ति देता है। बुद्धि निर्णय लेने में सहायता करती है और अहंकार यह भावना देत...
किसी न किसी का आदमी
व्यंग्य

किसी न किसी का आदमी

डॉ. मुकेश ‘असीमित’ गंगापुर सिटी, (राजस्थान) ******************** आजकल किसी का आदमी होना कितना जरूरी हो गया है! अगर आप किसी के आदमी नहीं हैं, तो आप आदमी कहलाने लायक ही नहीं हैं। यह पक्का मान लीजिए- आप दो पाये जानवर हो सकते हैं, पर आदमी नहीं। जहाँ देखो, वहाँ कोई न कोई किसी न किसी का आदमी ही नजर आ रहा है । नौकरी, प्रमोशन, जॉब, डिग्री, राशन, वजीफा, पुरस्कार- सब उसी को मिल रहे हैं जो किसी न किसी का आदमी है। मेरी ओपीडी में भी हर दूसरा मरीज किसी न किसी का आदमी होता है। मरीज आते भी यह देखने के लिए हैं कि डॉक्टर साहब भाव देते हैं या नहीं। सलाह तो डॉक्टर साहब देंगे ही, लेकिन भाव भी देंगे या नहीं, मसलन चाय भी तो पिलाएँगे, नहीं तो तो जिनके आदमी हैं, उनका फोन आ जाएगा- 'अरे, हमने अपना आदमी भेजा था! बताओ, आपने ध्यान ही नहीं रखा। मरीज मरा जा रहा था, और आपने उसे बाहर ...