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भारतीय सेना दिवस
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भारतीय सेना दिवस

प्रिया कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारतीय सेना के शौर्य, बलिदान और समर्पण को सम्मान देने के लिए हर साल १५ जनवरी को भारतीय सेना दिवस मनाया जाता है। १९४९ में इसी दिन, फील्ड मार्शल के. एम. करिअप्पा भारतीय सेना के पहले भारतीय कमांडर-इन-चीफ बने, जो भारत के सैन्य इतिहास में एक महत्वपूर्ण क्षण था। भारतीय सेना देश की सीमाओं की रक्षा करने और देश के अंदर शांति और सुरक्षा बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभाती है। भारतीय सेना के जवान अत्यधिक ठंड, गर्मी, रेगिस्तान, पहाड़ों और घने जंगलों जैसी कठिन परिस्थितियों में दिन-रात काम करते हैं। वे देश की सुरक्षा के लिए अपनी जान कुर्बान करने के लिए हमेशा तैयार रहते हैं। भारतीय सेना दिवस पूरे भारत में बड़े गर्व और सम्मान के साथ मनाया जाता है। मुख्य परेड नई दिल्ली में होती है, जहाँ सैनिक अपना अनुशासन, शक्ति और आधुनिक सैन्य उपकरण द...
सतरंगी दुनिया – १५
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सतरंगी दुनिया – १५

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** जितना अगूंठा हमारा फोन पर चलता है, अगर उतना माला पर चले तो हमें भगवान अवश्य मिलेंगे। 'भला करने से भला होता है' इस कहावत से तो मेरा विश्वास ही उठ गया है, क्योंकि मैं अपनी प्रेमिका को डेयरी मिल्क, फाईव स्टार और फिर किट-कैट देता था। उसी प्रेमिका से मेरी शादी हो गयी। अब वो मुझे टिफिन में टिंडे, लौकी और करेले दे रही है। लोग अपने मोबाईल पर डी.पी. लगाते हैं। डी.पी.- मतलब दिखावटी फोटो। एक लड़की कह रही थी मैं बचपन में बहुत ताकतवर थी। मैंने पूछा- तुम्हें कैसे पता ? उसने कहा- मेरी मम्मी कहती है जब मैं रोती थी तो पूरा घर सिर पर उठा लेती थी। हमें भगवान और डॉक्टर को कभी नाराज नहीं करना चाहिए, क्योंकि जब भगवान नाराज होता है तो डॉक्टर के पास भेजता है और जब डॉक्टर नाराज होता है, तो वो भगवान के पास भेज देता है। जब कोई बटोरने की जगह ब...
गणतंत्र दिवस
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गणतंत्र दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** २६ जनवरी १९५० को हमारे देश को संविधान मिला, जिसने हर भारतीय को समान अधिकार, समान अवसर और समान सम्मान दिया। आजादी हमें १९४७ में मिली, लेकिन उसे सही दिशा देने का काम हमारे संविधान ने किया। डॉ. भीमराव आंबेडकर और उनके साथियों ने ऐसा संविधान बनाया, जो हमें सिर्फ अधिकार नहीं, कर्तव्य भी सिखाता है यह ऐतिहासिक क्षणों में गिना जाने वाला समय था। इसके बाद से हर वर्ष इस दिन को गणतंत्र दिवस के रूप में मनाया जाता है तथा इस दिन देशभर में राष्ट्रीय अवकाश रहता है। भारतीय संविधान दुनिया का सबसे बड़ा लिखित संविधान है, जिसमें देश के हर नागरिक को समानता, स्वतंत्रता और न्याय का अधिकार दिया गया है। इस दिन १९५० में हमारा संविधान लागू हुआ था। तब से भारत एक गणतंत्र देश बन गया। यह दिन हमें याद दिलाता है कि हमारे स्वतंत्रता सेनानियों ने कितने त्...
स्वतंत्रता
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स्वतंत्रता

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** ओशो कहते हैं- जीवन जीने के केवल दो ढंग हैं: एक मालिक बनकर और दूसरा गुलाम बनकर। गुलामी में जिया गया जीवन, जीवन नहीं- केवल समय काटना है। यदि जीना है, तो मालिक बनकर जियो, अन्यथा मर जाना ही बेहतर है। यह कथन कठोर अवश्य लगता है, पर इसमें जीवन का गहरा सत्य छिपा है। मालिक बनने का अर्थ किसी पर शासन करना नहीं है। यह बाहरी सत्ता की नहीं, भीतर की सत्ता की बात है। असली गुलामी बाहर नहीं, हमारे अपने मन में है- आदतों की गुलामी, भय की गुलामी, तुलना की गुलामी, अपेक्षाओं और समाज की राय की गुलामी। मालिक बनने की यात्रा भी मन से ही शुरू होती है। सवाल यह नहीं कि हमें कहाँ पहुँचना है; असली सवाल यह है कि हम कहाँ से शुरू कर रहे हैं- भय से या बोध से। मन के आनंद का स्वाद ही मंज़िल का पता देता है। जिस क्षण व्यक्ति किसी कार्य को करते हुए सहज आनंद अनुभव करता है, उस...
स्वामी विवेकानन्द की जयंती
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स्वामी विवेकानन्द की जयंती

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** भारत में स्वामी विवेकानन्द की जयंती, अर्थात १२ जनवरी को प्रतिवर्ष राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में मनाया जाता है। संयुक्त राष्ट्र संघ के निर्णयानुसार सन् १९८४ ई. को 'अन्तरराष्ट्रीय युवा वर्ष' घोषित किया गया। इसके महत्त्व का विचार करते हुए भारत सरकार ने घोषणा की कि सन १९८४ से १२ जनवरी यानी स्वामी विवेकानन्द जयंती (जयन्ती) का दिन राष्ट्रीय युवा दिवस के रूप में देशभर में सर्वत्र मनाया जाए। राष्ट्रीय युवा दिवस का महत्व और उद्देश्य :- राष्ट्रीय युवा दिवस मनाने का महत्व और उद्देश्य आज के युवाओं को भविष्य में आगे बढ़ने के लिए प्रोत्साहित करना और उन्हें अपने देश के प्रति कर्तव्यनिष्ठ और जागरूक बनाना है। राष्ट्रीय युवा दिवस युवाओं को समर्पित एक विशेष दिन है। इस दिन का उद्देश्य युवाओं में समझ, प्रशंसा और ज़िम्मेदारी को बढ़...
सेतु का काम करती हिन्दी
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सेतु का काम करती हिन्दी

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** आज हम बड़े ही रोचक विषय पर बात करेंगे जी हाँ हिन्दी न केवल भाषा वरन भारतीय संस्कृति और एकता का प्रतीक हैं। हम सभी जानते है हिन्दी के जनक और जननी कौन है? जी भारतेन्दु हरिशचंद्र जी का नाम तो सुना ही होगा वो न केवल हिन्दी के जनक कहलाते बल्कि दुनिया में आधुनिक साहित्य के जनक कहलाते हैं। वहीं जननी संस्कृत जी पर हिन्दी आज भी सबसे सरल, प्रिय, विकसित भाषा है जिसे राज भाषा का दर्जा प्राप्त है, वैश्विक स्तर पर हिन्दी ने अपनी पहचान यूँ ही नहीं बनाई, आज ना केवल भारत में अन्य देश में भी हिन्दी भाषा प्रचलित है। यह तो हम हिन्दी के विकास और पहचान कैसे बनाई उसको जाने पर हिन्दी का योगदान देश के विकास में और देश को समृद्ध बनाने में अहम भूमिका निभाता रहा, हिन्दी संघ की भाषा है जो हमें जोड़े रखती हैं। यह वो मज़बूत कड़ी है जो हमें जड़ों से जोड...
विजय दिवस
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विजय दिवस

मन्नत रंधावा कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** हर साल १६ दिसंबर को मनाया जाने वाला विजय दिवस, भारतीय इतिहास में एक महत्वपूर्ण दिन है। यह १९७१ के भारत-पाक युद्ध में भारतीय सशस्त्र बलों की पाकिस्तान पर विजय का प्रतीक है। यह एक ऐतिहासिक संघर्ष था जिसने न केवल भारत की सैन्य शक्ति का प्रदर्शन किया, बल्कि मानवीय मूल्यों के प्रति उसकी प्रतिबद्धता की भी पुष्टि की। यह दिन हमारे उन सैनिकों के बलिदान और वीरता का स्मरण करता है जिन्होंने आधुनिक इतिहास की सबसे निर्णायक विजयों में से एक में महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। इस युद्ध में ३० लाख से अधिक लोगों की जान गई और १०० लाख बांग्लादेशी निर्वासित हो गए।26 मार्च को बांग्लादेश अपना स्वतंत्रता दिवस मनाता है, और इसी दिन से इस युद्ध की भयावहता शुरू हुई थी। लगभग नौ महीने बाद, १६ दिसंबर को, अंततः सब कुछ समाप्त हो गया। पूर्वी और पश्चिमी पाकि...
मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश
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मानवाधिकार दिवस: स्वतंत्रता समानता और न्याय का संदेश

 दिव्याना कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ********************  मानवाधिकार दिवस प्रत्येक वर्ष १० दिसंबर को विश्व भर में मनाया जाता है यह दिन संयुक्त राष्ट्र महासभा द्वारा १९४८ में अपनाई गई सार्वभौमिक मानवाधिकार घोषणा पत्र की याद दिलाता है, जो सभी मनुष्यों को जन्मजात अधिकार प्रदान करता है ,जिसमें ३० अनुच्छेदों के माध्यम से जीवन, गरिमा और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता सुनिश्चित की गई है। द्वितीय विश्व युद्ध के बाद न्याय की शुरुआत: द्वितीय विश्व युद्ध की भयावहताओं, जैसे होलोकॉस्ट और नरसंहार, ने वैश्विक स्तर पर न्याय की नई व्यवस्था की मांग को जन्म दिया। मित्र राष्ट्रों-अमेरिका, ब्रिटेन, फ्रांस और सोवियत संघ ने १९४५ में नूर्नबर्ग में अंतरराष्ट्रीय सैन्य न्यायाधिकरण (IMT) की स्थापना की, जो युद्ध अपराधियों को व्यक्तिगत रूप से दंडित करने का पहला मॉडल बना। इन मुकदमों ने १९४८ में संयुक्त राष्ट्र...
छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार
आंचलिक बोली, आलेख

छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी : वीर नारायण सिंह बिंझवार

प्रीतम कुमार साहू 'गुरुजी' लिमतरा, धमतरी (छत्तीसगढ़) ******************** जब हम गरीब मनखे ला इंसाफ अउ अधिकार दिलाय के बात करथन त सबले पहिली हमर मन म एकेच नाव आथे। वो नाव हरे वीर नारायण सिंह बिंझवार के जेन हर गरीब मनखे के जान बचाय बर अपन जान के बलिदान कर दिस। जमीदार होय के बाद भी साहूकार मन ले गरीब मनखे के भूख मिटाय बर आंदोलन करिस। १८५७ के स्वतंत्रता समर म छत्तीसगढ़ के पहिली बलिदानी आय। वीर नारायण सिंह के जनम छत्तीसगढ के सोनखान गांव म बछर १७९५ म जमीदार परिवार म होइस। पिता के नाव रामसाय रिहिस। कहे जाथे कि पुरखा के सियान मन कर ३०० गांव के जमींदारी रिहिस। वीर नारायण सिंह बिंझवार जनजाति के रिहिस। पिता के परलोक सिधारे के बाद ३५ बछर म अपन पिता के जगह म बइठ के जमींदार बन गे। पर दुख ल अपन दुख जान के गांव के गरीब मनखे मन बर अब्बड़ दया धरम करय। बछर १८५६ म बिकट आकाल परिस। लोगन मन कर खाय प...
अखंड भारत के निर्माता : सरदार वल्लभभाई पटेल
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अखंड भारत के निर्माता : सरदार वल्लभभाई पटेल

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** भारत के स्वाधीनता संग्राम के इतिहास में अनेक ऐसे वीर पुरुष हुए जिन्होंने अपने जीवन को राष्ट्रसेवा के लिए समर्पित कर दिया। महात्मा गॉंधी ने जहाँ अहिंसा और सत्य का मार्ग दिखाया, वहीं पंडित नेहरू ने आधुनिक भारत के निर्माण कि परिकल्पना की। परन्तु इन सबके बीच एक ऐसे पुरुष का नाम स्वर्णाक्षरों में अंकित है जिसने भारतीय रियासतों को एक सूत्र में पिरोकर भारत की अखंडता को स्थायी रूप प्रदान किया। वे थे सरदार वल्लभभाई पटेल, जिन्हें ससम्मान “लौह पुरुष” और “अखंड भारत के निर्माता” कहा जाता है। सरदार वल्लभभाई पटेल का जन्म ३१ अक्टूबर १८७५ को गुजरात के नडियाद नामक स्थान पर हुआ था। उनके पिता झवेरभाई एक साधारण कृषक थे और माता लाडबाई धार्मिक प्रवृत्ति की महिला थी। बचपन से ही वल्लभभाई में आत्मसम्मान, परिश्रम और दृढ़ संकल्प की भावना थी। उन्होंने...
हिन्दी दिवस
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हिन्दी दिवस

मोहर सिंह मीना "सलावद" मोतीगढ़, बीकानेर (राजस्थान) ******************** हिन्दी दिवस प्रति वर्ष १४ सितम्बर को पूरे देश में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। १४ सितम्बर १९४९ को ही संविधान सभा ने निर्णय लिया था कि हिन्दी केन्द्र सरकार की आधिकारिक भाषा होगी क्योंकि भारत के अधिकतर क्षेत्रों में हिन्दी भाषा बोली जाती थी। इसलिए हिन्दी को राजभाषा बनाने का निर्णय लिया गया और इसी निर्णय के महत्व को प्रतिपादित करने तथा हिन्दी को प्रत्येक क्षेत्र में प्रसारित करने के लिए वर्ष १९५३ से पूरे भारत देश में १४ सितम्बर को प्रतिवर्ष हिन्दी-दिवस के रूप में मनाया जाता है। स्वतन्त्रता प्राप्ति के बाद हिन्दी को आधिकारिक भाषा के रूप में स्थापित करवाने के लिए काका कालेलकर, हजारी प्रसाद द्विवेदी, सेठ गोविन्द दास आदि साहित्यकारों को साथ लेकर राजेन्द्र सिंह ने अथक प्रयास किए। हिन्दी भाषा और इसमें निहित भारत की सांस्कृत...
समाधान जरूरी है
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समाधान जरूरी है

खुमान सिंह भाट रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़) ******************** आज सूर्योदय होने से पहले ही घर के आंगन में प्रातः काल की ताज़ा हवा का आनंद लेने के लिये मैं अपने दैनिक कार्य से एक दम फ्रि हो गया और जैसे ही घर से निकले के लिए कदम बढ़ाया तो आंगन मे देखा गमले में फूल खिल उठा था और उससे थोड़ी ही दूर में ऊपर से रस्सी से बंधा हुआ आज का अखबार दिखाई दिया मैं थोड़ा सा चिंता मे डुब गया। क्योंकि पेपर वाला रोज़ की तरह विलंब न करके समय से पहले ही अखबार पहुंचा दिया था। फिर क्या अखबार हाथ में आते ही मै खुद को पढ़ने से भला रोक पाता? तभी देखा कि गहरे काले काले मोटे अक्षरों से हेड लाइन को देख मैं तो शून्य सा हो गया लिखा यूं था कि- 'अविचारी वाहन चालक' हेड लाइन पढ़ते ही मैं आग बबूला हो गया। मन को थोड़ा शांत किया और मैंने सोचा कि आज सही समय आ गया है जवाब देने का, अक्सर सोसल मीडिया में चंद टी.आर.पी.पाने के चक...
स्वयं ही स्वयं को पहचानिये
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स्वयं ही स्वयं को पहचानिये

माधवी तारे लंदन ******************** बचपन से एक मराठी गीत रेडियो पर सुनना अच्छा लगता था। सुधीर फडके जी के स्वरों में वह गीत बहुत मधुर लगता। उसका अर्थ कुछ ऐसा था कि मानव जन्म में ही मनुष्य से देवत्व प्राप्त करने किया जा सकता है यही तुलसी रामायण का एक मुख्य तत्व है। यह लेख भी कुछ ऐसे ही विचारों से भरपूर है। हम अक्सर देखते हैं कि मनुष्य को स्वर्ण की बहुत चाह होती है। और इसी से आंका जाता है कि व्यक्ति कितना संपन्न है। इस शरीर के सौंदर्य में स्वर्ण और चांदी चार चांद लगाते हैं। लेकिन हम ये अक्सर भूल जाते हैं कि इस ईश्वर प्रदत्त शरीर की कीमत सोने चांदी से कहीं अधिक है और बहुत मूल्यवान है। लेकिन मनुष्य चौर्यमयी सोने का अधिक जतन करता है और शरीर रूपी सोने को बिलकुल भूल जाता है। हमें यह ध्यान रखना चाहिये कि अनेक योनियों में भटकने के बाद हमें मनुष्य जन्म की प्राप्ति हुई है। सोने की लंका के गुणग...
सतरंगी दुनियां
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सतरंगी दुनियां

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** क्या कड़वे पौधे से मीठे फल आ सकता है? जी हां धैर्य एक कड़वा पौधा है पर फल हमेशा मीठे ही आते है। अपना बैंक बैलेंस देखकर खुश मत होइए जनाब, ऊपर वाला हिसाब तो आपके कर्मों का करेगा। चार लोग क्या कहेंगे? अक्सर कोई भी काम करने से पहिले हम सोचते है। चार लोग आपकी आपकी तेरहवीं पर कहेंगे "पूड़ी गरम लाना।" इसलिए उन चार लोगों में अपना अमूल्य समय बर्बाद न करें अपने कार्य में व्यस्त रहें। समय सबसे बलवान है। आप कुछ भी योजना बना ले पर होता वही है जो समय चाहता है। एक महिला सरकारी कार्यालय पहुंची और विधवा पेंशन का फार्म भरने लगी क्लर्क ने पूछा आपके पति को मरे कितना समय हुआ है? महिला ने बताया वो अभी बीमार है। फिर आप विधवा पेंशन का फार्म क्यों भर रही है? अरे भाई सरकारी काम में बहुत समय लगता है। जब तक मेरी पेंशन पास हो जायेगी तब तक शाय...
प्रकृति पूजक आदिवासी
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प्रकृति पूजक आदिवासी

मोहर सिंह मीना "सलावद" मोतीगढ़, बीकानेर (राजस्थान) ******************** विश्व आदिवासी दिवस ९ अगस्त को पूरे विश्व में बड़ी धूमधाम से मनाया जाता है। भारत में सबसे पहले से रहने वाले आदिम लोगों के बंशज आदिवासी ही है। भारत की २०११ की जनगणना के अनुसार लगभग ११ करोड़ आबादी हैं जो भारत की लगभग 8.५ प्रतिशत हैं। आदिवासियों का जीवन धरती, जल, जंगल, वन्य जीवों के साथ एवं संपूर्ण मानवता के साथ परस्पर पूरक और संरक्षित है। भारत देश में आजादी के ७५ वर्ष बाद भारत के सर्वोच्च पद पर प्रथम आदिवासी महिला द्रौपदी मुर्मू जो कि सबसे कम उम्र की प्रथम राष्ट्रपति भी है। आदिवासी शब्द दो शब्दों से आदि और वासी से मिलकर बना है। जिसका अर्थ है उस देश के मूल निवासी अगर सिर्फ भारत की बात की जाए तो १० से ११ करोड़ की जनसंख्या का एक बड़ा हिस्सा आदिवासियों का है आदिवासी समुदाय में मुंडा, संथाल, मीणा, भील, गरासिया, उरांव आदि अन...
चलो आज फिर मास्टरी कर लेता हूँ – भाग-1
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चलो आज फिर मास्टरी कर लेता हूँ – भाग-1

गिरेन्द्रसिंह भदौरिया "प्राण" इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** नोट- यह ज्ञान मेरे द्वारा हृदयंगम की गई अनुभूति और उसके मन्थन का निष्कर्ष है जो कई विद्वानों की मान्यताओं से भिन्न भी हो सकता है। इतर होने पर जिज्ञासु मुझसे सम्बन्धित विषय पर प्रश्न पूछ सकते हैं। कई जिज्ञासुओं ने जानना चाहा है कि - प्रश्न- देवनागरी लिपि में 'क','ख' 'ग' 'ज', 'प' आदि को अमात्रिक बताया जा रहा है क्या यह उचित है? उत्तर- "नहीं"। स्वर रहित वर्ण को ही अमात्रिक कहना सही है जैसे क्,ख्,ग्, आदि, किन्तु किसी वर्ण पर कोई भी स्वर होने पर वह मात्रिक हो जाता है। इसलिए क,ख,ग अमात्रिक नहीं हो सकते हैंं, क्योंकि इनमें अ स्वर मिला हुआ है। प्रश्न - सर ! अन्य मात्राओं की भाँति इन वर्णों पर कोई मात्रा (किसी स्वर का चिह्न) तो दिखाई ही नहीं दे रही है ? उत्तर- हमारी देवनागरी लिपि में सभी वर्णों की आकृति ...
प्रेम का दोष …?
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प्रेम का दोष …?

पं. भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** यदि मेरा हृदय किसी से अनजाने में, अनचाहे, पर अटूट प्रेम कर बैठता, और मैं उस प्रेम को केवल इसलिए कुचल देता क्योंकि वह समाज की निर्धारित सीमाओं के भीतर नहीं था? नहीं... मैं उस प्रेम को स्वीकार कर लेता। उस आकर्षण को, उस आत्मीयता को, उस जीवन भर के साथ का वचन देने वाले भाव को, विवाह के पवित्र बंधन में बाँध लेता। किन्तु यह कल्पना मात्र ही रोमांच उत्पन्न कर देती है। क्योंकि मेरा यह निर्णय, जो मेरे और मेरे प्रेमी/प्रेमिका के लिए जीवन की नई प्रभात होता, वही समाज के एक वर्ग के लिए काली घटा बनकर आता। और इस काली घटा के तले सैकड़ों जीवन नष्ट हो जाते- कोई अपने सम्मान के नाम पर आत्मघात कर लेता, तो कोई कथित 'सम्मान' बचाने के नाम पर हिंसा की भेंट चढ़ जाता। यह कोई अतिशयोक्ति नहीं, यह भारतीय समाज के उस क्रूर यथार्थ का काला पक्ष है जहाँ '...
योग से सहयोग तक की यात्रा
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योग से सहयोग तक की यात्रा

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** यात्रा तो हम सभी करते है पर आज हम जो यात्रा कि बात कर रहे वह यात्रा सफल यात्रा है और हम सभी को करना भी चाहिए आइये आज संक्षिप्त में हम योग, सहयोग और उसके लाभ पर बात करते है। हम सभी जानते है योग की उत्पत्ति प्राचीन भारत में हुई थी, योग शब्द संस्कृत से आया जिसका अर्थ है जोड़ना एकजुट होना योग प्राचीनतम जीवन शैली जो मन आत्मा शरीर को संतुलित करने में मदद करती है योग एक यात्रा है ना कि कोई मंजिल। ऐसी यात्रा जो निरन्तर अभ्यास और समर्पण से आगे बढ़ती है। योग हमारे भीतर छिपे असीम सामर्थ्य को पहचानने और उसका उपयोग करने का साधन जिस दिन से योग जीवन का हिस्सा बनता है उस दिन से योग जीवन से दूर जाना दिखता है। युज शब्द के तीन अर्थ उपलब्ध समाधि, संयोग, संयमन। सुख दुख,मान अपमान सिद्ध-असिद्धि, आदि विरोधी भावों में भी समान रहने को ही भगवान ने ...
शरणागति
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शरणागति

डाॅ. कृष्णा जोशी इन्दौर (मध्यप्रदेश) ******************** मैं चाहूँगी कि यदि जीवन को धन्य करना चाहते हो तो शरणागति को समझते हुए आगे कैसे बढ़ना है- जानते हैं सर्वप्रथम शरणागति का अर्थ या संक्षिप्त परिभाषा किसी भी चीज़, ख़ासकर भगवान नारायण (कृष्ण) के या भगवान श्रीराम के प्रति पूरी तरह से समर्पण करना अपने अहंकार का त्याग और भगवान के प्रति पूर्ण रूपेण समर्पित रहना शामिल है। शरणागति या प्रपत्ति अति संक्षिप्त में कहूँ तो मन की वह अवस्था जिसमें भगवान से प्रार्थना की जाती है कि वे भक्त को बचाने का साधन बनें यह अनुभूति इस बात से जुड़ी है कि भक्त पूरी तरह असहाय है, पापी है,तथा उसके पास अन्य मोक्ष की कोई आशा नहीं। शरणागति का शाब्दिक अर्थ है शरण में आया हुआ व्यक्ति। शरणागति के मुख्य चार प्रकार बताए गए हैं जो हम इस तरह से जान सकते हैं … भगवान की आज्ञाओं का पालन करना। भगवान के नाम का जप कर...
मैं क्या हूँ ….?
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मैं क्या हूँ ….?

रूपेश कुमार चैनपुर (बिहार) ******************** मनुष्य के जीवन में एक ऐसा समय आता है जब वह स्वयं से यह प्रश्न करता है - "मैं क्या हूँ ?" यह प्रश्न केवल शरीर, नाम, या पहचान तक सीमित नहीं होता, बल्कि आत्मा, उद्देश्य, और अस्तित्व की खोज की ओर संकेत करता है। जब हम कहते हैं "मैं", तो हम क्या दर्शाते हैं ? क्या यह शरीर "मैं" है ? क्या यह विचार, भावनाएँ, या यादें "मैं" हैं ? या फिर कुछ और है जो इन सबसे परे है ? हमारा शरीर समय के साथ बदलता है - बाल सफ़ेद हो जाते हैं, चेहरा झुर्रियों से भर जाता है, लेकिन फिर भी भीतर एक एहसास बना रहता है कि "मैं वही हूँ।" इसका अर्थ यह हुआ कि "मैं" केवल शरीर नहीं हो सकता। यह तो केवल एक वाहन है, जिससे आत्मा इस संसार में कार्य करती है। मन हमें सोचने, समझने, और महसूस करने की शक्ति देता है। बुद्धि निर्णय लेने में सहायता करती है और अहंकार यह भावना देत...
अंतरतम का अग्निपथ
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अंतरतम का अग्निपथ

भारमल गर्ग "विलक्षण" जालोर (राजस्थान) ******************** वाराणसी के घाटों पर प्रातःकालीन सूर्य की प्रथम किरण जब गंगा के जल को स्पर्श करती, तो ऐसा प्रतीत होता मानो भगवान शंकर अपनी जटाओं से अमृत की धारा प्रवाहित कर रहे हों। किन्तु उस विशेष प्रभात में, पंडित विश्वनाथ की दृष्टि गंगा के तरंगों में नहीं, अपितु अपने हृदय के शून्य में अटकी थी। वेद-वेदांग के मर्मज्ञ, शास्त्रार्थ में अजेय इस पंडित के वक्षस्थल में अब केवल एक टूटे हुए सितार की ध्वनि गूँज रही थी। मंदिर के विराट शिखर के सम्मुख खड़े वे अपनी छाया से प्रश्न कर रहे थे- "क्या यह चोटी में बँधा रुद्राक्ष माला का टूटना उसी दिन का संकेत था, जब महादेवी ने प्रथम बार इस ओर दृष्टिपात किया था?" महादेवी... नाम ही उनके अस्तित्व का सार था। काशी की वह नृत्यांगना जिसके चरणों की थाप पर स्वयं नटराज प्रसन्न होकर तांडव करने लगते। जिस दिन वह संकी...
यूक्रेन युद्ध, नाटो और यूरोप, भारत
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यूक्रेन युद्ध, नाटो और यूरोप, भारत

अरुण कुमार जैन इन्दौर (मध्य प्रदेश)  ******************** विगत दिनों विश्व की सबसे बड़ी खबर यदि कोई थी तो वह ट्रंप और जेलेंस्की की नाटकीय मुलाकात और बच्चों की तरह लड़ना, विश्व स्तर की राजनीति और कूटनीति में इन दिनों का सबसे हल्का, स्तरहीन और सही मायने में भौंडा प्रदर्शन था, जिसमें सामान्य स्तर के शिष्टाचार को बलाए ताक रखा गया। यह सभी को पता है कि असली लड़ाई नाटो के विस्तार और रुस की घेराबंदी के मूल प्रश्न पर लड़ी गई। रुस की भौगोलिक स्थिति विघटन के बाद की स्थिति में किसी भी हालत में वह यह सहन नहीं कर सकता कि उसके समुद्री मुहाने पर नाटो चौकीदार बन कर बैठ जाए और उसके विशालकाय पोत निर्भय होकर अपने ही समुद्र से आगे नहीं बढ़ पाएं। यद्यपि संयुक्त सोवियत रुस के विघटन के पश्चात रुस की आर्थिक स्थिति मजबूत होने के बावजूद पिछले सालों से चल रहे यूक्रेन युद्ध में खराब हुई है। जब रूस ने युद...
भारतीय ज्ञान परंपरा में जैन दर्शन का योगदान
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भारतीय ज्ञान परंपरा में जैन दर्शन का योगदान

मयंक कुमार जैन अलीगढ़ (उत्तर प्रदेश) ******************** भारतीय ज्ञान परंपरा अनेक दार्शनिक धाराओं से समृद्ध हुई है, जिनमें जैन दर्शन का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। जैन दर्शन न केवल आध्यात्मिकता का संदेश देता है, बल्कि यह तर्क, नैतिकता, अहिंसा और सामाजिक समरसता का भी आधार है। इसकी शिक्षाएँ हजारों वर्षों से भारतीय समाज और विश्व चिंतन को दिशा देती आ रही हैं। अहिंसा: भारतीय संस्कृति को दिया अमूल्य उपहार जैन धर्म का मूल सिद्धांत अहिंसा है, जिसे महावीर स्वामी ने अपने जीवन का आधार बनाया। उन्होंने कहा, "परस्परोपग्रहो जीवानाम्" अर्थात सभी प्राणी एक-दूसरे पर निर्भर हैं। यह विचार भारतीय समाज में करुणा, सहिष्णुता और शांति की भावना को प्रोत्साहित करता है। महात्मा गांधी के सत्याग्रह और अहिंसा के सिद्धांतों पर भी जैन दर्शन का गहरा प्रभाव देखा जा सकता है। अनेकांतवाद: सहिष्णुता और तर्कशक्...
हिंदी शब्दों का रोमन लिप्यंतरण
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हिंदी शब्दों का रोमन लिप्यंतरण

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** हिंदी के लिए प्रयुक्त देवनागरी लिपि में विश्व की लगभग सभी भाषाओं की ध्वनियों केलिए पृथक ध्वनिचिह्न प्राप्त हैं। कुछ नहीं भी हैं तो हिंदी का ´विकासशीलता´ का गुण उसे अपना कर नया चिह्न दे देता है यथा, क=क़, ग=ग़, ज=ज़ आदि। चूँकि अंग्रेज़ी स्वयं में एक वैश्विक भाषा का रूप ले चुकी है तथा हिंदी के लगभग सभी पौराणिक व ऐतिहासिक ग्रंथ अंग्रेज़ी में प्राप्त हैं, प्रकाशित हो रहे हैं। ऐसे मे समस्या तब आती है जब राम को Rama कृष्ण को Krishna, सुग्रीव को Sugriva, Omkara, Veda, Chanakya, Ashoka आदि लिखा जाता है तथा रामा, कृष्णा, नारदा, चाणक्या ओमकारा, वेदा, अशोका लोग बोलने भी लगे हैं। इससे मूल शब्दों के अर्थ का अनर्थ भी हो रहा है। अहिंदी भाषियों, अंग्रेज़ी माध्यम से पढ़ने वाले प्रवासी भारतीयों, विदेशों में जन्मे भारतीय बच्चों तथा भारत म...
न जन्म सहज न मृत्यु सहज
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न जन्म सहज न मृत्यु सहज

डॉ. प्रताप मोहन "भारतीय" ओमेक्स पार्क- वुड-बद्दी ******************** पुराने समय में महिलाएं प्रसव घर पर ही करती थी। उस समय दाईया होती थी जो सुरक्षित प्रसव कराती थी। अस्पताल जाने की जरूरत ही नहीं पड़ती थी। न कोई ज्यादा खर्च न कोई झंझट सरलता से प्रसव हो जाता था। वर्तमान युग में प्रत्येक प्रसव अस्पताल में हो रहा है और डॉक्टर पैसा कमाने के चक्कर में साधारण प्रसव के स्थान पर आपरेशन द्वारा प्रसव कराते है। बच्चे के जन्म के साथ परिवार में खुशियां आती है और प्रसव आपरेशन द्वारा होता है तो डॉक्टर का बिल बढ़ जाता है इसलिए आपकी खुशी के साथ साथ डॉक्टर भी खुश हो जाता है। पहिले जब कोई व्यक्ति बीमार या दुर्घटना ग्रस्त होता था तो डॉक्टर यथा संभव साधनों द्वारा उसका उपचार करते थे। उनकी भावना मरीज को ठीक करने की होती थी। जब हमारा उद्देश्य सही होता है तो स्वयं भगवान आपकी मदद करने के लिए आ जाते है और अक्स...