विकसित भारत की दिवाली
अभिषेक मिश्रा
चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश)
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न मैं दिवाली मनाता, न ये धूम धड़ाम मुझे भाता है,
मेरा मन तो उस कर्ज़ को गिनता, जो गरीब चुकाता है।
न ये मेरा उत्सव है, न आतिशबाजी का शृंगार,
मैं तो देखता हूँ, धन की चिता पर, चढ़ता बाज़ार।
जिस लक्ष्मी को घर बुलाने, लाखों का व्यापार हुआ,
चंद मिनटों की आतिशबाजी में, उसका सर्वनाश हुआ।
जिस पूँजी से संवर सकता, किसी का पूरा संसार,
तुम उसी को धूल बनाते, ये कैसा अंध-अधिकार?
पूंजी का यह प्रदर्शन, यह कैसा व्यंग्य रचता है?
जब फुटपाथ पर बैठा मानव, आज भी अन्न को तरसता है।
दीवारों के भीतर दीप जले, पर द्वार अँधेरा बोल रहा,
पत्थर की मूरत के लिए, तू लक्ष्मी को ही तोल रहा।
लाखों के रॉकेट से ऊँचा, वह गरीब का घर भी हो,
जो इस आस में बैठा है, कि 'आज वह भी ख़ुश हो।'
हज़ार जलाओ तुम दीप भवन में, पर एक दीया क्यों नहीं?
जहाँ भूख से सूख गए ह...















