मातृभाषा का महोत्सव
अभिषेक मिश्रा
चकिया, बलिया (उत्तरप्रदेश)
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हिंदी है दिल की जुबां, हिंदी है जन-गान।
भारत माँ की वाणी है, इसका ऊँचा मान।।
माटी की खुशबू लिए, बोले हर इंसान।
गंगा-जमुनी संस्कृति की, हिंदी पहचान।।
तुलसी की चौपाइयों में, सूर की रसधार।
कबिरा के दोहों में बसी, जीवन की पुकार।।
मीरा के पद झंकारित हों, भक्तिरस का गीत।
भारतेंदु का जागरण हो, हिंदी का संगीत।।
प्रेमचंद की कहानियों ने, जग में दिया प्रकाश।
साहित्य के हर पृष्ठ पे, हिंदी का इतिहास।।
महादेवी के भावों में, कोमलता का गीत।
दिनकर की गर्जना में है, ओजस्वी संगीत।।
रसखान की राधा बानी, रही प्रेम की धुन।
हिंदी का उत्सव यही, हिंदी का अभिमान।
संविधान की गोद में, राजभाषा का मान।
विश्वपटल पर गूंजती, भारत की पहचान।।
आज तकनीकी युग में भी, हिंदी लहराए।
मोबाइल की स्क्रीन पर भी, हिंदी ही छाए।।
कीबोर्ड स...





















