मौन
डॉ. चंद्रा सायता
इंदौर (मध्य प्रदेश)
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कहने को मैं मौन हूं।
जब उधर रहते सिले हुए,
आंखें भी निशब्द रहती,
तब मैं संवाद कर रहा होता हूं
अंतस के साथ बहुत देर तक,
जिसे कोई अन्य सुन नहीं पाता।
मैं देह का समग्र शक्तिपुंज बन जाता हूं,
तर्कपूर्ण संवाद करने को।
मेरे साथी बन जाओ या
मितभाषी बनो,
पर वाचालता मत अपनाओ।
चरित्र तुम्हारा इससे
तार-तार हो जाएगा।
मत झुठलाओ जीवन को।
मुझे अपना साथी बना लो।
तुम और तुम्हारी शक्ति युवा रहेगी सदा सदा।
परिचय :- डॉ. चंद्रा सायता
शिक्षा : एम.ए.(समाजशात्र, हिंदी सा. तथा अंग्रेजी सा.), एल-एल. बी. तथा पीएच. डी. (अनुवाद)।
निवासी : इंदौर मध्य प्रदेश
लेखन : १९७८ से लघुकथा सतत लेखन
प्रकाशित पुस्तकें : १- गिरहें २- गिरहें का सिंधी अनुवाद ३- माटी कहे कुम्हार से
सम्मान : गिरहें पर म.प्र. लेखिका संघ भोपाल से गिरहें के अनुवाद पर तथा गिरह़ें पर शब्द प...






















