मेरा वजूद
मित्रा शर्मा
महू - इंदौर
********************
किन्नरों की भावनाओ को ध्यान में रखकर लिखी गई रचना :-
मेरा होना किसी को भाता नहीं
सभ्य समाज में, मैं समाता नहीं।
जन्म से धिक्कार, कोई अपनाता नहीं
सभ्य समाज से मेरा कोई नाता नहीं।
सिर्फ हँसी के लिए बना हूँ
दर्द पीने के लिए बना हूँ
तालियाँ मेरे नसीब में नहीं
ताली बजाने के लिए बना हूँ।
पेट भरने के लिए
मेरी झोली फैली रहती
सबकी मुरादें मेरी झोली में
सिक्कों संग गिरती रहती
अपने तन से नफरत कैसे करूँ
बस, खुद मन ही मन धीर धरूँ
आँसू को मुस्कान के पीछे धरूँ
उसने भेजा धरती पर, कबूल करूँ।
तन अधूरा मन अधूरा,
ना कुछ मुझमें भी पूरा
लेकिन स्त्री का श्रृंगार कर,
करूँ कुछ मन का पूरा।
कोई नहीं दे सकता मुझे जो
रह गया मुझमें अधूरा
विनती यही कि दुआ लेते रहना,
हो ख्वाब तुम्हारा पूरा।
परिचय :- मित्रा शर्मा - महू (मूल निवासी नेपाल)
आप भी अपनी कविताएं, कहान...





















