प्रीत की पाती: पंचम स्थान प्राप्त रचना
रशीद अहमद शेख 'रशीद'
इंदौर म.प्र.
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मन मलिन है, सुख नही वैभव नहीं!
प्रेम की पाती लिखूँ संभव नहीं!
सुप्त है स्वर्णिम सबेरा, दु खों ने डाला है डेरा!
हैं नहीं आशा की किरणें, जग में छाया है अंधेरा!
जो करे आलोक वह अर्णव नहीं!
प्रेम की पाती लिखू संभव नहीं!
मौन हैं सब ओर व्यापित, नाद लगता है पराजित!
क्षण-प्रतिक्षण है उदासी, दिवस शापित,निशा शापित!
कौनसा स्थल है जो नीरव नहीं है!
प्रेम की पाती लिखूँ संभव नहीं है!
अपने घर में बन्द हैं सब, अनमने आनन्द हैं सब!
दृष्टिगत एकल अधिक हैं, अगोचर पथ-वृन्द हैं सब!
पूर्ववत अब श्रव्य जन-कलरव नहीं!
प्रेम की पाती लिखूँ संभव नहीं!
हुए हैं अगणित प्रभावित, काल भी है स्वयं विस्मित!
समस्या-पर्वत खड़े हैं, सभी सम्मेलन हैं वर्जित!
त्रासदी-पीड़ित कहाँ मानव नहीं!
प्रेम की पाती लिखूँ संभव!
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परिचय - रशीद अहमद शेख 'रशीद'
साहित्यिक उपनाम ~ ‘रशीद...






















