फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी
अख्तर अली शाह "अनन्त"
नीमच
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बड़ी बड़ी बातें करलें पर,
यह कड़वी सच्चाई है।
फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी,
एक यहाँ मिल पाई है।।
जन कल्याण के खातिर हमने,
बनती सरकारें देखी।
वोट के खातिर नेताओं की,
चलती मनुहारें देखी।।
वादों से फिरते नेताओं,
को देखा उसके पश्चात।
और कभी देखा है उनको,
करते जनता पर ही घात।।
प्रश्न यही क्या आज करें हम,
सम्मुख गहरी खाई है।
फुटपाथों को कहाँ झोंपडी,
एक यहाँ मिल पाई है।।
माना हमने, देश बड़ा है,
और हजारों मसले हैं।
हर मसले का हल हो ऐसी,
उगा रहे वो फसले हैं ।
लेकिन लोगों की सब माया,
खाली पेट रहें कैसे।
हमीं न होंगे तो क्या होगा,
बोलो दर्द सहें कैसे।।
इतसी जो बात न समझे,
समझो वो हरजाई है।
फुटपाथों को कहाँ झोंपड़ी,
एक यहाँ मिल पाई है।।
"अनन्त" तन भी नंगा है और,
गरमी सरदी सहता है।
गांधी का है देश देर तक,
सदमें सहता रहता है।।
आसमान को छत कहकर वो,
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