भारत तिलक विवेकानंद!
डॉ. पंकजवासिनी
पटना (बिहार)
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हे संन्यासी हे अमर सपूत भारतवर्ष के!
आधार भारत माता के गर्व-हर्ष के!!
तुमने की थी युवा संन्यासियों की मांग
जो भारत भर के ग्रामों में फैल
देशवासियों की सेवा में जाएं खप!
आज भी सख्त प्रासंगिकता है तेरी इस मांग की
देश की बलिवेदी पर सहर्ष डालें हविष...
आज सभी युवा अपने अपने स्वार्थ की!
हे मनीषी! तेजोदिप्त संन्यासी!! हिन्दू धर्म के गौरवशिखर!!
हे आध्यात्मिक चिंतक! वेदांतों के समर्थ व्याख्याता!!
तूने धर्म को सदा रखा मनुष्य-सेवा के केन्द्र में
और देश के सर्वतोभावेन कल्याण का
कैसा विलक्षण-क्रांतिकारी उपाय सुझाया
"देश के ३३ कोटि भूखे-दरिद्र-कुपोषण के शिकार को
कर दो मंदिरों में स्थापित देवी देवताओं की तरह!
और हटा दो मंदिरों से देवी देवताओं की मूर्तियों को!!
फिर करो उनकी बेहतरी के लिए ईमानदार कोशिश!
क्या रंग निखरेगा धर्मप्राण भारत का जो ऐसी पावन पूजा ...





















