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कविता

जब मैं अमीर बना
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जब मैं अमीर बना

दीपक अनंत राव "अंशुमान" केरला ******************** संकरी मिट्टी की झोपडी में, जहाँ चारों तरफ़ की दीवारें हमेशा अपने पसीनों की ख़ुशबू बिखेरती थीं, वहाँ मैं एक इंसान-बसा था। सोने-से रंग में हम एक-दूसरे को चमकाते भी थे, और बालों में ग़रीबी की धूल भी बिखरती थी। कालिख जमी चिमनी के पास, नज़रें टिकाकर मैं कुछ सवालों के जवाब तलाशा करता था। बचपन की मासूमियत में, तब कुछ सवालों के जवाब मिल भी जाते थे कुछ को चुपचाप सह लिया जाता था, कुछ उत्तर तो तर्क से क़रीब भी नहीं होते थे। और कुछ तो ऐसे थे, जिनका जवाब ढूंढते-ढूंढते उम्र गुज़र जाती थी। फिर भी उस कालिख लगे मिट्टी के दीये में मैंने जीवन को जाना, चखा था। अनुभवों से फटी- पुरानी चादर जैसी हमारे सपनों पर माँ की साड़ी का आँचल बिछा रहता सिर्फ़ उम्मीदों पर टिके मिट्टी के घरों के ऊपर पिता सी उस सूरज की दे...
भाई बहन के प्रेम को वंदन
कविता

भाई बहन के प्रेम को वंदन

सोनल सिंह "सोनू" कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) ******************** वंदन ऐसे प्रेम को, जिस जैसा नहीं है दूजा। भाई बहन का प्रेम है ऐसा, जैसे हो कोई अजूबा। भाई बहन जो नोंक-झोंक, किया करते थे दिन रैन। एक दूजे से मिलने को, अब रहते हैं बेचैन। आये बहन पर आंच, भैया दुनिया से लड़ जाए। भाई पर जो आए खतरा, बहन चट्टान सी अड़ जाए। भाई दूज और रक्षाबंधन, दोनों पावन है त्यौहार। हर साल बढ़ता जाता, इससे भाई बहन का प्यार। दोनों का है प्रेम अनोखा, जिसका आदि न अंत। वंदन इनके प्रेम को, जो रहेगा अनादि अनंत। परिचय - सोनल सिंह "सोनू" निवासी : कोलिहापुरी दुर्ग (छतीसगढ़) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र क...
भ्रम का दल-दल
कविता

भ्रम का दल-दल

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** भ्रम भ्रम तो भ्रम है मति भ्रम दृष्टि भ्रम दिशा भ्रम भांति भांति के भ्रम नित्य छलते हैं भ्रम कारण-अकारण भ्रमित करते हैं मानव मन..... मन चंचल है बदलती रहती है मन की दशायें कभी गम तो कभी खुशी कभी ईर्ष्या को कभी तुष्टि कभी प्रेम तो कभी नफरत कभी ग्लानि तो कभी लगाव कभी उद्वेग तो कभी उन्माद कभी क्रोधावेश तो कभी कामावेश नाना रकम के प्रपंच जीवन में भ्रमित करते हैं मानव मन...... मन सदा ही रहा है सुविधावादी जब संगम होता है स्वार्थ और सुविधा का मजबूर करता है मन को बदलने को सात्विक राहें और फिर मन चाहे-अनचाहै लगता है दौड़ने आपराधिक मार्ग पर दिग्भ्रमित मन करने लगता है अकरणीय शांत करने को अपने महत्वाकांक्षी अहम् को होने लगता भ्रमित फिर मानव मन..... शोणित प्रबल कंपन संवेदनह...
चन्द्रयान
कविता

चन्द्रयान

संजय वर्मा "दॄष्टि" मनावर (धार) ******************** सीढ़ी पर चढ़कर ढूंढ़ता हूँ बादलों में छुपे चाँद को पकड़ना चाहता हूँ चंदा मामा को बचपन में दिलों दिमाग में समाया था। लोरियों, कहानियों में रचा बसा था माँ से पूछा की चंदा मामा अपने घर कब आएंगे ये तो बस तारों के संग ही रहते है ये स्कूल भी जाते या नहीं अमावस्या को इनके स्कूल की छुट्टी होती होगी। तभी तो ये दिखते नहीं माँ ने आज खीर बनाई इसलिए मामा को खीर खाने बुलाने के लिए सीढ़ियों पर चढ़ कर देखा मामा का घर तो बहुत दूर है। माँ सच कहती थी चंदा मामा दूर के पोहे पकाए ... मैं बड़ा हो के चन्द्रयान में जाऊंगा जैसे गए थे निल आर्मस्ट्रांग तब माँ के हाथों की बनी खीर का न्यौता अवश्य दूंगा। परिचय : संजय वर्मा "दॄष्टि" पिता : श्री शांतीलालजी वर्मा जन्म तिथि : २ मई १९६२ (उज्जैन) शिक्षा : आय टी आय निवासी : मनावर, ...
बचपन की मस्ती
कविता

बचपन की मस्ती

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** माँ का आंचल पिता के कंधों का सफर कितना प्यारा था, किस्से कहानियां का दौर था, ऐसा अनमोल बचपन हमारा था! छोटी सी बात पर रूठना-चिल्लाना था, फिर कट्टी कर खुद ही मान जाना था! वो सुनहला सफर था बचपन सुहाना था! आंगन में नीले अम्बर तले नानी कहानियां सुनाती थी, भूत के झूठ-मूठ के किस्से से वो भी डर जाती थी ! छपाक-छपाक बारिश में कीचड़ उड़ाते मिट्टी और कीचड़ का उबटन लगाते ना माँ के डांट की चिंता ना पापा के गुस्से की फ़िकर थी, स्कूल की छुट्टी का उत्सव मनाते थे!! वो बचपन की मस्ती, मासूमियत की बस्ती थी, सराबोर बारिश में खुद को भिगोते मिट्टी से सने कपड़ों में थके माँ की गोद में ही सो जाते थे, अम्माँ की लोरी पापा भी गुनगुनाते थे! पेड़ों की डालों का झुला बनाते, गिल्ली-डंडे और ...
जंगल राज
आंचलिक बोली, कविता

जंगल राज

अशोक कुमार यादव मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** (छत्तीसगढ़ी बोली) शेर ह बनके महाराजा, जनता मन ल डहे ल धरलिस। तुमन ल जियन नइ देवंव, उबक के कहे ल धरलिस।। कोने भड़कावथे तोला, काखर बात-बिगित ल माने हस। जातरी आ गेहे तोर परबुधिया, बर्बाद करे बर ठाने हस।। बंद कर दिस स्कूल ल, कहिथे पढ़-लिख के का करहू। अदि शिक्षा पा जहु त, अपन अधिकार बर तुम लड़हू।। नौकरी नइ खोलत हे एकोकनिक, बेरोजगार हें परेशान। पढ़त-पढ़त कई साल बितगे, बुढ़वा होगें हें नवजवान।। जीवन भर सेवा देवइया मन ल, नइ मिलय जुन्ना पेंशन। सेवानिबृत्त होय म कुछु नइ मिलय, फेर बुता के हे टेंशन।। गरीब के घर बिजली नइ जलय, जलही कंडिल, चिमनी। छूट नइ मिलय बिजली बिल म, नगतहा पईसा ह बढ़ही।। खुलगे दारु भट्ठी संगवारी हो, पियव मन भर के सब दारु। समाज हो जय भले खोखला, नाचव अउ गावव समारु।। लुट मचे हे जंगल राज म, जनत...
नमामि शिवम्
कविता

नमामि शिवम्

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** नमामि सत्य सुंदरम, नमामि चन्द्रधारणाम। नमामि त्रिलोक त्रिलोचनम्, नमामि नमामि शिव शिवम्।। सत्य शिव सुंदरम, सत्य शिव सुंदरम।। समस्त् पाप खंडनं, समस्त् लोक पोषणं। सत्य ही शिवम् शिवम् , शिवकृपा जनम जनम।। सत्य शिव सुंदरम, सत्य शिव सुंदरम।। समस्त दोष शोषणं, युतं सुखैक दायकं। निकाम काम दायकम्, नमो नमो शिवो शिवम्।। सत्य शिव सुंदरम, सत्य शिव सुंदरम।। त्वमेव ही कृपाकरम, त्वमेव ही सुखाकरम। गरल कंठ सुशोभितम्, नमामि नमामि मस्तकम।। सत्य शिव सुंदरम, सत्य शिव सुंदरम।। परिचय :- सूर्यपाल नामदेव "चंचल" शिक्षा : एम ए अर्थशास्त्र , एम बी ए ( रिटेल मैनेजमेंट) व्यवसाय : उद्यमी, प्रबंधन सलाहकार, कवि, लेखक, वक्ता निवासी : जयपुर (राजस्थान) । घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरा यह रचना स्वरचित ...
अरे वो फुटबॉल
कविता

अरे वो फुटबॉल

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** कभी इस पैर से तो कभी उस पैर से ठोकर मारे जाते वो फुटबॉल, कभी आया है अपनी मान सम्मान का ख्याल, या फिर लुढ़कना ही रह गया है तुम्हारा काम, भूलकर अपने भविष्य का अंजाम, अपने लिये भीड़ तो लाते हो, पर अपने हृदय का दर्द क्यों नहीं दिखाते हो, दो टीमों के बीच पिस रहे हो, क्या लात पड़ने की खुशी का चंदन घिस रहे हो, तुमने कभी सोचा है कि तुम्हारे बिना इन खिलाड़ियों का हर मूवमेंट खेल अधूरा है, या फिर लतखोर बन लुढ़क रहे सिर्फ इसलिए कि चढ़ चुका मन मस्तिष्क पर किसी का धतूरा है, भूल रहे हो कि लात तुम खा रहे और इनाम कोई और पा रहा है, अपनी खेल कौशल की बात कर वो मदमस्त हो झूमा जा रहा है, तुम्हारे चुप रहने या खुश रहने से तुम्हारी बिरादरी के अन्य फुटबालों पर क्या बीत रही होगी क्या प्रभाव पड़ रहा होगा, कौन कहां मर ...
जीत जाओगे एक दिन
कविता

जीत जाओगे एक दिन

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अपनी मुश्किलों से जो लड़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन! अगर तुम बारीकियों को पकड़ रहे हो तो सीख जाओगे एक दिन !! हौसले से मंजिल पर बढ़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! समय की हवा उस रुख में बहने लगेगी जिस दिशा में तुम होगे ! खुशियों की परछाईयाँ पीछे चलने लगेगीं जिस जगह पे तुम होगे ! साफ नीयत से काम करोगे तो काम भी तुम पर मरेंगे !! अगर ज़मी-आसमां एक कर रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! ख़ामोशी के संग भी तुम ख़ामोश मत रहना !! हुस्न के नशे में हर दम मदहोश मत रहना !! अपनों को गैर मत करना गैरों से बैर मत करना !!!! हुस्न इक निकासी है आत्मज्ञान सर्वव्यापी है ये बात जो समझ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन ! अपनी मुश्किलों से जो लड़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्...
जब नेह घुला हो बातों में
कविता

जब नेह घुला हो बातों में

संजय कुमार नेमा भोपाल (मध्य प्रदेश) ******************** इत्र नहीं मिलता जग में, दोस्ती को महकाने का। जब नेह घुला हो बातों में, व्यवहार महकने लगता है। हो प्रीत परस्पर रिश्तों में, घर द्वार महकने लगता है। जब मित्र परिवारों से जुड़े तो, किरदार महकने लगता है। मित्रता दिवस पर हार्दिक शुभकामनाएं स्वीकारें 🙏 परिचय :- संजय कुमार नेमा निवासी : भोपाल (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाईप करके हमें hindirakshak17@gmail.com पर अणु डाक (मेल) कीजिय...
न जाने कहाँ से कहाँ
कविता

न जाने कहाँ से कहाँ

मालती खलतकर इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** उदधी का उच्च उफान कूल की सीमा लाये जन जीवन को भिगोता वढता है प्यासी धरा की ओर वायु वेग भी साथ देता उदधी को जल पावन करने धरा को मानो सन्देश देते हम आ रहे है साथ-साथ। यह शायद प्रकृति की कारीगरी या जन-जीवन से खिलवाड मानव मन समझ नही पाता कहीं गिरीव्हर का गिरना कहीं गगन से श्याम मेघो का झांकना। शायद कह रहे है हे मानव अब तो सर्तक हो सम्भल जा नही तो प्रकृति का ताण्डव देख कैसा होता है एक क्षण मे न जाने कहाँ से कहाँ होगे सब। परिचय :- इंदौर निवासी मालती खलतकर आयु ६८ वर्ष है आपने हिंदी समाजशास्श्र में एम ए एल एलबी किया है आप हिंदी में कविता कहानी लेख गजल आदि लिखती हैं व आपकी रचनाएँ विभिन्न पत्र-पत्रिकाओं मैं प्रकाशित होते हैं आप सन १९६८ से इंदौर के लेखक संघ रचना संघ से जुड़ी आप शासकीय सेवा से निमृत हैं पीछेले...
सच के उजाले
कविता

सच के उजाले

मित्रा शर्मा महू, इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मुझे अब किसी की अनुमति लेना नहीं। मुझे अब किसी को साबित भी करना नहीं। मुझे दुनिया के लिए मुखौटे पहनने नहीं सच-सी ख़ूबसूरती और किसी चीज में नहीं। मेरे ज़िंदगी के अंधेरे सायों! मुझे डराओ नहीं ग़लतियों को अपनी बार -बार दोहराओ नहीं। मुझे अपने इस टूटे आईने को जोड़ना नहीं कुछ पाने के लिए, किसी को तोड़ना नहीं। मैं जैसी हूँ वैसी ठीक हूँ, ख़ुद को छुपाकर रखना नहीं दिखावे के ढकोसला में मुझे अब पड़ना नहीं। परिचय :- मित्रा शर्मा निवासी : महू (मूल निवासी नेपाल) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्...
रोटी की महिमा
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रोटी की महिमा

प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे मंडला, (मध्य प्रदेश) ******************** भूख से बड़ी वेदना नहीं है यह तो समझो। मिल जाए रोटी यही कामना, यह तो समझो।। भूख तो मानव जीवन का ही है हिस्सा। पेट को भरने का ही तो है देखो सब किस्सा।। पेट भरा हो तो दुनिया लगती अति प्यारी है। भूख के आगे यह सारी दुनिया ही हारी है।। भूख ही तो दुनिया से देखो सारे पाप कराती है। भूख ही तो नित सारे यह संताप बढ़ाती है।। कहते हैं कि कभी भूखे भजन न होय गोपाला। सही बात है रोटी का ही तो सब गड़बड़झाला।। रोटी के आगे तो देखो सब कुछ ही बोना है। रोटी से ही उजला लगता घर का हर कोना है।। रोटी मिलना बहुत देखो भाई बड़ा वरदान है। मिलती रहे सबको रोटी यही आज अरमान है।। भूख से बड़ी वेदना नहीं है, यह तो समझो। रोटी देने से बड़ी संवेदना नहीं है, यह तो समझो।। परिचय :- प्रो. डॉ. शरद नारायण खरे जन्म : २५-०९-१९६१ निवासी :...
सर्वश्रेष्ठता
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सर्वश्रेष्ठता

राजेन्द्र लाहिरी पामगढ़ (छत्तीसगढ़) ******************** चल उतर कर देख एक बार सीवर में, या फिर गंदे नाले में, फिर कितने दिन पी पाओगे चाय स्वच्छ प्याले में, लेकर स्वच्छ हाथ, तब सोच पाओगे कितना मुश्किल है बनना, रहना बनकर छोटी जात, बिना शारिरिक श्रम, पाया हुआ मुफ्त का धन, मजे और धनवीर बन कर खुद को कहना सर्वोच्च, कर नहीं पा रहे हो उच्चता का उन्मोच्य, कभी कर के दिखा दो खेतों में पूरा दिन भर परिश्रम, फिर न कहना कि टूट गया तन-मन, छोड़कर मिथ्यात्मक कहानियां सुनाना, कितना कठिन है मड़े से नए जूते बनाना, परलोक ले जाने का तरीका खुलकर बताओ वैज्ञानिकों को, यदि सचमुच में वजूद उन स्थानों का, तो खोज लेंगे वे उन स्थानों को, जैसे ढूंढ ले रहे हैं खरबों मील दूर रहने वाले नायाब ग्रह, वे साबित भी करते हैं और नहीं भरमाते आपकी तरह झूठ को सच कह कह, आओ श्रीमान ...
विरह का सावन
कविता

विरह का सावन

सूर्यपाल नामदेव "चंचल" जयपुर (राजस्थान) ******************** घनघोर घटा और कारी बदरिया सावन बरस ही जाए भीगे बदन मोरा मन भी भीगे मिलन अगन लगी जाए छाए बदरवा न आए सजनवा सूखी अंखियां बहती जाए सावन की झड़ी दिल ऐसे पड़ी याद सताए बस तू नहीं आए। खामोश तनहा बैठी रही तेरा इंतजार आंखों में लिए बारिश की झड़ी मिलन की कशक अब बढ़ा देगी तस्वीर लिए दिल में थी तेरी विरह वेदना दबाने के लिए क्यू आज फिर लगा कि सावन की बूंदे दर्द को जगा देगी बारिश की फुहार मुकम्मल थी अश्क छुपाने के लिए, सैलाब जो बने दरिया का रंज ओ गम ही बहा देगी। बनके हमराज रस्में निभाई थी सारी वफ़ा के लिए, क्यों आज फिर लगा कि तेरी मोहब्बत रुला देगी। रिमझिम झड़ी ही काफी थी हूक उठाने के लिए, छा जाए सावन तो आग जुदाई की ही जला देगी। जज्बातों की तस्वीर जो उकेरी तेरे इश्क के लिए, क्यों आज फिर लगा कि मेरी तन्हाई दबा देगी। परिच...
चूहा दौड़
कविता

चूहा दौड़

नील मणि मवाना रोड (मेरठ) ******************** घर-घर त्रस्त माता-पिता ग्रस्त रिश्ते ध्वस्त सपना त्यागे पल-पल जागे अच्छी परवरिश को सब सुख के त्यागे बच्चे युवा हुए कभी खुश कभी खफा हुए कामनाएं जगीं मोह, अहंकार पंख पसारे भय, भ्रम के मारे कच्चे अनुभवहीन बच्चे विचारों की गहराई क्या जाने माता-पिता से उलझ उनकी सहनशीलता क्षमाशीलता की सीमा लांघें। परिचय :- नील मणि निवासी : राधा गार्डन, मवाना रोड, (मेरठ) घोषणा : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपने परिचय एवं छायाचित्र के साथ प्रकाशित करवा सकते हैं, राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि प्रकाशित करवाने हेतु अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, हिंदी में टाई...
अगर तुम ना होते
कविता

अगर तुम ना होते

सुनील कुमार "खुराना" नकुड़ सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) ******************** जीवन में मेरे अगर तुम ना होते हमारा साथ कभी कोई ना देते जीवन के मेरे सुंदर सफर ना होते तूने सदा ही साथ दिया अपना साथ तेरा बन गया मेरा सपना सपने अपने कभी ना पूरे होते इस मेरे जीवन के सुंदर सफर में सदा साथ दिया तूने हर डगर में ना होते जीवन में अपने अच्छे रास्ते किया आज मैंने मुकाम जो हासिल मेरी किश्ती के रहें तुम सदा साहिल साथ हमारा ना जीवन में तुम देते ये इतिहास बन गईं अपनी कहानी गाएंगे इसे जीवन में अपनी जुबानी मुझमें सफलता के तुम बीज ना बोते परिचय :-  सुनील कुमार "खुराना" निवासी : नकुड़ सहारनपुर (उत्तर प्रदेश) भारत घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच पर अ...
पहलगाम की व्यथा
कविता

पहलगाम की व्यथा

आशा जाकड़ इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हे पाक तेरे आतंकवाद को जड़ से खत्म करना होगा। तेरे नापाक इरादों को सबक सीखना होगा।। बहुत सहा, अब न सहेंगे तेरी नाकामी चालें खूब पानी पिया है, तुझे ‌प्यासा रखना होगा। भूल गया, तेरा बीज इस भारत से जन्मा है । अब तुझे बन्दूक की नोंक पर रखना होगा।। जाति-धर्म पूछ-पूछ हिंदुओं को मारते हो। धर्म निंदको अब तुम्हें सूली पर चढ़ना होगा।। अभी मांँग में सिंदूर सजा, हाथों में मेहंदी सजी। चूड़ियां तोड़ने वालों अब फांसी पर चढ़ना होगा।। कश्मीर घाटी बिलखकर खून के आँसू रो रही । हे नील गगन कब यहाँ शान्ति का आलम होगा।। पुलिस ड्रेस में धोखे से वार, बहादुरी दिखाते हो अरे गद्दारों अब तुम्हें भी कफ़न पहनना होगा।। हमारे देश में रहकर हम पर ही जुल्म करते हो। जुल्म करने वाले दरिंदों अब बेमौत मरना होगा। परिचय :- आशा जाकड़ (शिक्षिका, साहि...
शौर्य पुराण
कविता

शौर्य पुराण

डाँ. बबिता सिंह हाजीपुर वैशाली (बिहार) ******************** भारत भू का शौर्य पुराण, अतुलित है तेरा बलिदान विश्व की शान्ति दूत धरा है पर अरि जब देता ललकार, कभी ना मानी इसने हार जियो -जियो भारत के लाल! गंगा यमुना हिंद का सागर, तेरे पद-रज को लेकर ही पुण्य धरा को सिंचित करते वन पर्वत घाटी का ज़र्रा, तेरी साँसों से ही सहमते जियो-जियो भू के सरताज! अरि-दल में जिससे भय व्यापै, अपनी हड्डी की मशाल से नैनों में हालाहल भरके करते जुल्मी का संहार कौन लिखे इतिहास तुम्हारा? जियो-जियो ऐ पुण्य प्रकाश! अंबर पर घन जब छाएगा, तब-तब लहू बने चिंगारी जन्म-मरण का मोह छोड़कर, तुम हो जाते हो कुर्बान धरती माँ की आँख के तारे, जियो जियो भारत के भाल! धन साम्राज्य नहीं हैं माँगते, पर शत्रु जो आँख दिखाता तुरंत उतारते मौत के घाट निशक्त और निराश नहीं हैं करते हैं तम. का परिहार जि...
मैं अक्सर भूल जाती हूँ
कविता

मैं अक्सर भूल जाती हूँ

शशि चन्दन "निर्झर" इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हां मैं भूल जाती हूँ सच कहा तुमने, मैं अक्सर भूल जाती हूँ, अपमान के घूंट हर रोज़ पी जाती हूँ। पर याद रखती हूँ मिटाना सलवटें, और उधड़ने लगे जो कमीज़ … चुपचाप सी जाती हूँ।। हां मैं अक्सर भूल जाती हूँ अपनी पसन्द न पसन्द, उलझे से केश .... साज शृंगार और मुस्कान, पर याद रखती हूँ कहीं बिगड़े न तुम्हारा कोई भी जोड़ीदार जुराब । मैं अक्सर भूल जाती हूँ, सरल सी .... एक से दस तक की गिनती, पर बखूबी याद रहता, वो सत्रह का पहाड़ा ... जो बचपन में कभी याद न था। हां .... मैं ..... हां मैं अक्सर भूल जाती हूँ, व्याकरण के नियम ... मेरे लिए उपयोग हुए पशुवत संबोधन। पर याद रखती हूँ, अपने से छोटों के लिए भी, सम्मानजनक उद्वोधन।। हां मैं अक्सर भूल जाती हूँ इतिहास की बातें .... भूगोल की बातें पर याद रखती हूँ ...
भाषा व्यक्तित्व का दर्पण
कविता

भाषा व्यक्तित्व का दर्पण

डॉ. किरन अवस्थी मिनियापोलिसम (अमेरिका) ******************** पंक्ति नहीं वो जिसमें बहती संस्कृति की धार नहीं नहीं काव्य वह जिसमें मानवता का प्यार नहीं नहीं कला वो जो न उद्वेलित करती हो नहीं काव्य रचना वो जो न प्रेरित करती हो। साहित्य नहीं जो करता ईश्वर की रचना को साकार नहीं मानवीय मूल्यों का जो बनता आधार नहीं। संस्कृति, मानवता का वाहक साहित्य की‌ अपनी‌ मर्यादा है समाज के दर्पण को जीवन मूल्यों से कर सज्जित साहित्य वही कहलाता है। ऊर्जित करने जन-धन को साहित्य रचा जाता है जिसमें न हो प्रेम मनुजता हित जहां समर्पण नहीं राष्ट्र हित वह कविता कब कहलाता है? शब्दों को न रख मर्यादित जो तीखे बाण चलाता है मानव हृदय नहीं वो कौओं की टोली कहलाता है। परिचय :- डॉ. किरन अवस्थी सम्प्रति : सेवा निवृत्त लेक्चरर वर्तमान निवासी : मिनियापोलिस, (अमेरिका) शिक्षा : एम.ए. अंग्...
आनंद अनुभूति
कविता

आनंद अनुभूति

डॉ. राजीव डोगरा "विमल" कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) ******************** मृत्यु योग बनता रहा पर मेरे महाकाल काल का भक्षण करते रहे। शत्रु योग बनता रहा पर मेरी मां काली शत्रुओं का रक्त पान करती रही। भयभीत करने का प्रयास लोग करते रहे मगर मेरे कालभैरव भय के साथ भयाकारक का भी भयानक विनाश करते रहें। दुरात्मा योग बनता रहा पर मेरे सदाशिव ज्ञानामृत देकर पापयुक्त करते रहे। वियोग का योग बनता रहा पर मेरी मां काली का ममतामई स्पर्श आनंदमय करता रहा। परिचय :-  डॉ. राजीव डोगरा "विमल" निवासी - कांगड़ा (हिमाचल प्रदेश) सम्प्रति - भाषा अध्यापक गवर्नमेंट हाई स्कूल, ठाकुरद्वारा घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करता हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना, स्वरचित एवं मौलिक है। आप भी अपनी कविताएं, कहानियां, लेख, आदि राष्ट्रीय हिन्दी ...
क्या है कविता
कविता

क्या है कविता

छत्र छाजेड़ “फक्कड़” आनंद विहार (दिल्ली) ******************** मैं नहीं जानता ये पद्य है या फिर गद्य है सावद्य है या फिर निरवद्य है पर इतना जानता हूँ भावों से ओतप्रोत रचना पूर्णतया सद्य है......! व्याकरण मुक्त है मन भाव युक्त है सरस्वती कृपा से संवेदन सशक्त है मन उभरे जो भाव लिख रही कलम उद्विग्नता से कागज पर आवेग भी है... संवेग भी है... शायद श्रेणी इसकी मुक्त छंद है..... चिन्तन है मनन है स्तवन है सम्मोहन है स्पंदन है ज्ञान है... मन विद्वान है निचोड़ है भाव अभिव्यक्ति सच की निरंतर... निर्लिप्त... होती है कविता.... ! सपने सजाती अंतस भाव दर्शाती अवसादी पीड़ा उन्मादी क्रीड़ा सच दिखलाती वाद विवाद की लक्ष्मण रेखा से परे निर्द्वन्द्व निस्पृह मनभावों से झरती है कविता...! ना पूंजीवाद ना साम्यवाद क्यों करें रचना कोई वाद-विवाद बात ...
मायका केवल एक घर नहीं होता
कविता

मायका केवल एक घर नहीं होता

श्रीमती क्षिप्रा चतुर्वेदी लखनऊ (उत्तर प्रदेश) ******************** मायका केवल एक घर नहीं होता वो एक ऐसी जगह होती है, ऐसा ठिकाना जहाँ एक बेटी खुद को 'बस बेटी' समझ सके।" मायका वो अहसास होता है जहां बेटियाँ खुद से जुड़ सकें, जिन सपनों को उनकी आँखों ने देखा था उसको पूरा कर सकें! जहाँ वो बिना किसी संकोच या औपचारिकता के, मनचाहे आरामदायक कपड़े पहन सकें… जहाँ दिन की शुरुआत घड़ी के अलार्म से नहीं, बल्कि माँ-पिता की मीठी शुभ प्रभात से हो… जहाँ नींद अधूरी नहीं रहती, और सुबह की कोई आपाधापी नहीं होती, चाय की गर्म प्याली उसका इंतजार करती! मायके का दरवाज़ा उनके लिए दुनिया का सबसे सुरक्षित कोना होता है जहाँ वो सूकून से अपने भविष्य के सपने बुन सकती हैं! जहाँ न उन्हें कोई किरदार निभाना होता है, न किसी की उम्मीद पर खरा उतरना होता है। वहाँ वो रिश्तों में ...
दहेज
कविता

दहेज

रतन खंगारोत कलवार रोड झोटवाड़ा (राजस्थान) ******************** दहेज दानव कुछ बोल रहा है, मुंह अपना ये कितना खोल रहा है, प्रेम को तराजू मे तोल रहा है, रिश्तों मे विष ये घोल रहा है। शिक्षा का कोई महत्व नहीं, संस्कारों का कोई अस्तित्व नही, झूठ का यहाँ बाजार लगा, और सत्य का कोई खरीददार नही। डॉक्टर, इंजीनियर बनाये बेटे, फिर झोली ले बाजार चले, खरीद लो कोई मेरे घर का चिराग, हरे- गुलाबी नोट चले। जिसको अपने लहू से बनाया , श्रमवारि से जिसे तृप्त किया, नाजो से पाली अपनी बिटिया को, अब पराये घर को विदा किया। पराई बेटी का कोई मोह नही, संस्कारों का यहाँ कोई मोल नही, कौनसी गाडी? कैश कितना? सोने का अब कोई तोल नहीं। लालच का ये रुप निराला, बहरूपियों का नित लगता मेला, इससे बचना है अब मुशिकल, शांतिदूत का इसने पहना है चोला। भाँति-भाँति के लगा मुखोटे, दानव ने कई रुप...