जीवन का यथार्थ
रागिनी सिंह परिहार
रीवा म.प्र.
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हम हवाओं को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ें हैं,
तेरी ही देहरीयो में हम अब तो धरना धरे है।
कल वो आये थे मिलने को हमसे,
हमने कह दिया है, उनसे
हम तो रस में है, डूबे
हम हवाओं को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ें हैं।
बादलों की ओट से रोशनी खोजा है हमने,
मन की मंदिर में बसी है, पंखुडी की एक कली।
छोटी सी नन्ही सी हैं वो देखना पडता है उसको।
हम हवाओं को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ें हैं।
ताड़े बैठे है, जी भौरा, कब खिलेगी कलियाँ ये,
नन्ही सी कलियों को हमनें पल्को में छिपा लिया है।
हम हवाओं को भी पीछे छोड़ कर आगे बढ़ें हैं।
तेरी ही देहरीयो में हम अब तो धरना धरे हैं।।
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परिचय :- रागिनी सिंह परिहार
जन्मतिथि : १ जुलाई १९९१
पिता : रमाकंत सिंह
माता : ऊषा सिंह
पति : सचिन देव सिंह
शिक्षा : एम.ए हिन्दी साहित्य, डीएड शिक्षाशात्र, पी.जी.डी.सी.ए. कंप्यूटर, एम फील हिन्दी साहित्य, ...



















