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छैनी

रचयिता : विजयसिंह चौहान

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छैनी

गर्मी की तपिश ने सभी को हालाकान कर दिया मगर लूहार की झोपड़ी में गर्मी का असर कहीं नजर नहीं आता। लोहे को गर्म कर, पीट-पीट कर छैनी जो बनाना है इसलिए पूरा परिवार लगा रहता है। परिवार का मुखिया लोहे को गर्म कर लालसुर्ख करता और फिर शुरू होता है काम शुरू होता गुल्लो का। वजनी हथोडे को पूरी ताकत से लोहे पर प्रहार करती और आकार देती है छेनी को। छैनी वही, जो पत्थर तराशने, मूर्ति बनाने की लिए काम आती है। आकार और साकार का यह क्रम गुल्लो और छेनी बखूबी करते हैं, तभी गुल्लो की बिटिया, झूला बंद होने पर रोने लगती है। गुल्लो, छैनी पर चोट करते-करते बच्ची को दुलारती, पुचकारती, बचपन सँवारती, और पसीना पोछ कर फिर जुट जाती है, आकार देने के लिये,

तराशने का यह क्रम जारी रहता है, रोज हर रोज ……

लेखक परिचय : विजयसिंह चौहान की जन्मतिथि ५ दिसम्बर १९७० जन्मस्थान इन्दौर (मध्यप्रदेश) है, इसी शहर से आपने वाणिज्य में स्नातकोत्तर के साथ विधि और पत्रकारिता विषय की पढ़ाई की, आप सामाजिक क्षेत्र में गतिविधियों में सक्रिय हैं, वहीं स्वतंत्र लेखन, सामाजिक जागरूकता, के साथ साथ समाज सेवा भी करते हैंl
लेखन में आपकी विधा-काव्य, व्यंग्य, लघुकथा और लेख हैl आपकी उपलब्धि यही है कि, उच्च न्यायालय (इन्दौर) में अभिभाषक के रूप में सतत कार्य तथा स्वतंत्र पत्रकारिता जारी है। हाल ही में आपको डॉक्टर एसएन तिवारी स्मृति सम्मान समारोह में साहित्य के क्षेत्र में उल्लेखनीय योगदान के लिए सम्मानित भी किया गया है।

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