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मिथ्या ख्वाब

शरद सिंह “शरद”
लखनऊ

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खेले सदा  जो वीरानियो मे
भाई उन्हें कब महफिले,
अरमा सजे टूटे सदा जब
मिलती कहाँ है मन्जिले
उड़ते परिन्दे देख के नभ मे,
तौल लिये पर ख्वाहिश के,
हर ख्वाहिश दम तोड़ गयी,
की भाग्य ने गुप चुप साजिश ये,
सप्त सिन्धु भर जाये अश्रु से,
या उठे दावानल अन्तस मे,
तिल तिल कर मर जाये स्वप्न,
या मिले ठोकरे हर पग मे,
हो न मलिन ह्रदय किसी का,
तेरे अन्तर की दुखती रग से,
होठों पर मुस्कान सजा
नयनो मे छुपा ले मोती को,
महफिल मे जगा कहकहे बुलन्द,
फिर अश्रु बहा ले वीराने मे,
यूँ बहका ले अपना हर अरमां,
मिथ्या ख्वाब जगा कर जीवन मे

.

लेखक परिचय :- बरेली के साधारण परिवार मे जन्मी शरद सिंह के पिता पेशे से डाॅक्टर थे आपने व्यक्तिगत रूप से एम.ए.की डिग्री हासिल की आपकी बचपन से साहित्य मे रुचि रही व बाल्यावस्था में ही कलम चलने लगी थी। प्रतिष्ठा फिल्म्स एन्ड मीडिया ने “मेरी स्मृतियां” नामक आपकी एक पुस्तक प्रकाशित की है। आप वर्तमान में लखनऊ में निवास करती है।


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