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प्रकृति

सपना
दिल्ली
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प्रकृति
रुके बिना थके
उपकारी, निरछल
अपनी ममता
हम पर लुटाती….
जीव , जंतु, पशु, पंछी
सहारा देती
अपने आंचल में
जरूरतों का रखती
पूरा ख्याल…
क्या नहीं सहती
हमारे लिए
गलती भी करें
देती हमें सीख
कभी उत्साह बढ़ाती
कभी उदाहरण दिखा कर
मोल समझाती अपना….
तेरे रूप अनेक
हर रूप में कुछ न कुछ
बीज बोऐं हम एक
फल उसमें अनेक
हमें देती
करे इतना कुछ
मांगे न कोई मोल हमसे…
चकाचौंध में
नए ज़माने की
भूल मां की ममता
करते खिलवाड़ हम उससे
उसे लेना पड़ता भंयकर रूप
मजबूर होकर…..
भूले हम

बिन प्रकृति मां
सबका अस्तित्व
खतरे में
सुरक्षा कवच
वह हम सबकी
सबकी भलाई
उसको सुंदर रखने में…
प्रण लें
नहीं करेंगे खिलवाड़
ममता के बदले
उतना ही
रखेंगे ख्याल
जितना वह रखती
हम सबका।।

परिचय :- सपना
पिता- बान गंगा नेगी
माता- लता कुमारी
शैक्षणिक योग्यता- एम.ए.(हिंदी), सेट, नेट, जेआर. एफ. अनुवाद में डिप्लोमा ( अंग्रेज़ी से हिंदी), पी.एचडी. (ज़ारी)
साहित्यिक उपलब्धियां- १५ से अधिक राष्ट्रीय और अन्तरराष्ट्रीय संगोष्ठियों में सहभागिता तथा प्रपत्र वाचन एवं विभिन्न पत्रिकाओं/ संपादित पुस्तकों में विभिन्न विषयों पर शोधालेख प्रकाशित। साथ ही साहित्य सिनेमा सेतु वेबसाइट पर कुछ कविताओं का प्रकाशन।
निवासी- दिल्ली
घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है।

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