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कविता

जीत का परचम फहराना है

अनुराग बघेल लोरमी, मुंगेली (छत्तीसगढ़) ******************** मंजिल चढूँ तो चढूँ कैसे?, मन में यह सवाल है। रास्ता कठिन है लेकिन, हौसला बेमिसाल है।। कदम-कदम पर काँटे बिखरे, रुकना कब स्वीकार है? राह अंधेरी, दूर किनारा, मुझमें हिम्मत अपार है।। चट्टानें भी झुक जाएँगी, जब हिम्मत की हुंकार होगी। तूफ़ान भी रास्ता बदलेगा, जब हौसलों की बौछार होगी।। माना कि यह चढ़ाई दुर्गम, साँसें भी अब फूल रहे हैं। रुक गए जो, वो मिट गए, चले जो, वो अंबर छू रहे हैं।। जितने छाले पैरों में होंगे मेरे, उतनी सुंदर जीत होगी। काली रात के ढलते ही फिर, भोर की नई शुरुआत होगी।। मेरे पैरों के छाले गवाह हैं, मैं थककर हारने वाला नहीं। मंजिल के शिखर को छुए बिना, मैं पीछे हटने वाला नहीं।। तपती भूमि, धधकती ज्वाला, राहों में मेरे अंगारे हैं। लेकिन टूटने न दूँगा सपने, जो आँखों ने सँवारे हैं।। ...