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Tag: अमित राव पवार

लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन
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लोककल्याण से टीआरपी तक : पत्रकारिता का देव ऋषि नारद से विचलन

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** सूचना के विस्फोट के इस दौर में पत्रकारिता पहले से कहीं अधिक शक्तिशाली और प्रभावशाली माध्यम बन चुकी है। स्मार्टफोन की स्क्रीन पर उभरती एक खबर कुछ ही पलों में जनमत तैयार कर देती है, सरकारों पर दबाव बना देती है और समाज की दिशा तक तय कर देती है। लेकिन इस तेज़, तात्कालिक और प्रतिस्पर्धा पत्रकारिता के बीच एक मूल प्रश्न बार-बार उभरता है, क्या हम अपने मूल उद्देश्य से भटक रहे हैं? यदि भारतीय परंपरा के परिप्रेक्ष्य में देखा जाए, तो संचार और संवाद की अवधारणा कोई नई नहीं है। हमारे पुराणों में देवऋषि नारद जी का चरित्र इस बात का प्रमाण है कि सूचना का आदान-प्रदान केवल तकनीकी प्रक्रिया नहीं, बल्कि एक उत्तरदायित्व था। नारदजी केवल संदेशवाहक नहीं थे, वे संवाद के वाहक थे। उनका हर हस्तक्षेप किसी न किसी रूप मेंलोककल्याण से जुड़ा होता ...
भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश
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भगवान परशुराम : पराक्रम, तप और सामाजिक न्याय का शाश्वत संदेश

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** भारत की सांस्कृतिक चेतना विविधताओं से परिपूर्ण है, जहाँ प्रत्येक क्षेत्र अपनी विशिष्ट पहचान और आध्यात्मिक परंपराओं के लिए जाना जाता है। मध्य प्रदेश का मालवा क्षेत्र इसी परंपरा का एक जीवंत उदाहरण है। यह भूमि केवल भौगोलिक दृष्टि से ही नहीं, बल्कि सांस्कृतिक और आध्यात्मिक रूप से भी अत्यंत समृद्ध रही है। इसी क्षेत्र (जानापाव) से जुड़ी भगवान परशुराम की परंपरा इसे एक विशिष्ट गौरव प्रदान करती है। भगवान परशुराम का व्यक्तित्व भारतीय चिंतन में शक्ति, तप, ज्ञान और न्याय का अद्वितीय संगम प्रस्तुत करता है। भगवान परशुराम को भगवान विष्णु का छठा अवतार माना जाता है। उनका जन्म महर्षि जमदग्नि और माता रेणुका के यहाँ हुआ। वे भृगु वंश के थे और विशेष बात यह है कि वे एकमात्र ऐसे अवतार हैं, जिन्होंने ऋषि कुल में जन्म लेकर भी क्षत्रिय धर्...
जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम
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जब-जब बिखरता समाज, तब-तब याद आते हैं श्रीराम

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** क्या आज का समाज उस आदर्श की ओर अग्रसर है, जिसे हम ‘रामराज्य’ के नाम से जानते हैं, या हम उससे लगातार दूर होते जा रहे हैं? यह प्रश्न केवल दार्शनिक नहीं, बल्कि हमारे समय की सबसे बड़ी सामाजिक चुनौती भी है। श्री राम नवमी का पावन पर्व हमें इसी आत्ममंथन का अवसर प्रदान करता है। त्रेतायुग में श्रीराम का अवतरण केवल एक धार्मिक घटना नहीं, बल्कि मानवता को दिशा देने वाला एक युगांतरकारी क्षण था। आज, जब समाज अनेक प्रकार के नैतिक और सामाजिक संकटों से जूझ रहा है, तब श्रीराम के आदर्श पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक प्रतीत होते हैं। भगवान विष्णु के सातवें अवतार के रूप में जन्मे श्रीराम ने अयोध्या में राजा दशरथ और माता कौशल्या के यहाँ जन्म लेकर यह सिद्ध किया कि महानता वंश या वैभव से नहीं, बल्कि चरित्र और आचरण से निर्धारित होती है। उनके ज...
नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना
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नवरात्रि का संदेश: मातृशक्ति, राष्ट्रभाव और भारतीय संस्कृति की अमर चेतना

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** जब विश्व की अनेक प्राचीन सभ्यताएँ समय के प्रवाह में विलीन हो गईं, तब भी भारत की संस्कृति आज उतनी ही जीवंत, जाग्रत और प्रेरणादायी बनी हुई है। इसका कारण केवल इसका प्राचीन इतिहास या विशाल भूभाग नहीं, बल्कि वह गहरी सांस्कृतिक चेतना है, जिसकी जड़ें मातृत्व, शक्ति और आध्यात्मिक मूल्यों में निहित हैं। भारतीय जीवन-दृष्टि में शक्ति का अर्थ केवल सामर्थ्य नहीं, बल्कि संरक्षण, करुणा, सृजन और संतुलन की वह शक्ति है जो समाज को दिशा देती है। यही कारण है कि भारत में शक्ति की उपासना केवल एक धार्मिक परंपरा नहीं, बल्कि एक सांस्कृतिक दर्शन है- और इसी दर्शन का विराट उत्सव है नवरात्रि। भारतीय संस्कृति का मूल स्वर यदि किसी एक भाव में व्यक्त किया जाए तो वह है- मातृत्व और शक्ति का सम्मान। यहाँ मातृभूमि को केवल भूमि नहीं माना गया,बल्कि ...
होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती
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होली-परंपरा, प्रतीक और वर्तमान की वैचारिक चुनौती

अमित राव पवार देवास (मध्य प्रदेश) ******************** होली भारतीय सांस्कृतिक जीवन का केवल एक उत्सव नहीं, बल्कि सामाजिक चेतना की परीक्षा भी है। रंगों की उन्मुक्तता, सामूहिक उल्लास और लोक परंपराओं की जीवंतता के बीच यह पर्व हर वर्ष हमें यह प्रश्न पूछने के लिए विवश करता है कि क्या हम अपने मूल मूल्यों के प्रति उतने ही प्रतिबद्ध हैं, जितने अपने उत्सवों के प्रति? बदलते सामाजिक परिदृश्य, तीव्र होती वैचारिक प्रतिस्पर्धा और डिजिटल माध्यमों की प्रभावशाली उपस्थिति के बीच होली का संदेश पहले से कहीं अधिक प्रासंगिक हो उठा है। पौराणिक कथा में हिरण्यकशिपु का अहंकार, प्रह्लाद की दृढ़ आस्था, होलिका का छल और अंततः भगवान नरसिंह का न्याय- ये घटनाएँ केवल धार्मिक आख्यान नहीं है, ये सत्ता और सत्य के शाश्वत संघर्ष का रूपक हैं। हिरण्यकशिपु उस मानसिकता का प्रतीक है, जो शक्ति के मद में असहमत...