नशा (सकारात्मक दृष्टिकोण)
खुमान सिंह भाट
रमतरा, बालोद, (छत्तीसगढ़)
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विज्ञान का मानना है कि किसी वस्तु के सेवन से मस्तिष्क की तंत्रिकाएं प्रभावित होती हैं और व्यक्ति का व्यवहार परिवर्तित हो जाता है। किंतु, यह आवश्यक नहीं है कि केवल मस्तिष्क को प्रभावित करने वाली वस्तुएं ही 'नशा' हैं। यदि नशे को सकारात्मक दृष्टिकोण से देखा जाए, तो यह कला और भावना के प्रति गहरी दीवानगी को दर्शाता है।
न करते औषधियों से प्रेम धन्वंतरि, तो आयुर्वेद का सटीक प्रमाण कहाँ से मिल पाता?
न होती ईमानदारी और कर्तव्यनिष्ठा की लगन राजा हरिश्चंद्र में, तो सामाजिक नैतिकता की स्थापना कहाँ से हो पाती?
न होती ज्ञान और संगीत की तल्लीनता देवर्षि नारद में, तो वेदों का प्रचार-प्रसार कहाँ से हो पाता?
न होती भक्ति-भावना की पराकाष्ठा भक्त प्रह्लाद में, तो ईश्वरीय आस्था की सिद्धि कहाँ से हो पाती?
न होता निःस्वार्थ भाव महर्षि दधीचि मे...



