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Tag: मंजिरी पुणताम्बेकर

संकल्प
कथा

संकल्प

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************                               वीणा शहर के नामी विद्यालय की अध्यापिका थी। उसे अपने विद्यार्थियों को शहर के वृद्धाश्रम में ले जाना था। विद्यालय की महानिर्देशिका ने उसे बच्चों को लेके जाने से पहले वृद्धाश्रम जाकर मुआयना कर आने का निर्देश दिया। वहाँ पहुँच कर वीणा वृद्धाश्रम की मैनेजर श्रीमती सुशीला जी से मिली। सुशीला जी से विद्यार्थियों को लाने की बात कर ही रही थी तभी दरवाजे पर लाल रंग की ब्रीजा में से एक स्त्री की आवाज सुनाई दी जो चौकीदार से जल्दी दरवाजा खोलने को कह रही थी। देखते ही देखते वह गाड़ी उन दोनों के सामने आ खड़ी हुई। उसमें से एक दंपत्ति और एक बूढ़ी स्त्री उतरी। वो जरूर उस लड़के की माँ थी। उन्हें देख सुशीला ने वीणा से कहा ये एक आम नजारा है यहाँ का। अपने ही अपनों को छोड़ जाते हैं। आप यहीं रुकिए में थोड़ी देर में आई। वीणा ने देखा कि ल...
किस्मत से समझोता
कहानी

किस्मत से समझोता

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************                               आज सुबह उठते ही नितिशा के हाथों की हरी चूड़ियाँ खनखना गईं। चूड़ियों को देख उसे याद आया कि कल उसकी शादी है। न जाने क्यूँ उसे बार-बार लग रहा था कि मम्मी से कह दे कि उसे शादी नहीं करनी है। नितिशा ने उसकी सहेली शुचि को फोन लगा कर कहा। शुचि ने समझाया कि टेंशन न ले। हर लड़की को शादी से पहले टेंशन होता ही है। नितिशा के पापा न होने से सारा भार उसकी मम्मी के कंधे पर था। शायद नितिशा को टेंशन मम्मी को छोड़ सीधे अमरीका जाना था। और आज नितिशा शादी का जोड़ा पहन अपने ससुराल जाने को भारी मन से तैयार थी। वह अपना सब कुछ छोड़ एक अनजान आदमी के साथ उसके घर में, उसके घर को अपना घर कहने, उसकी माँ को अपनी माँ जैसा आदर देने जा रही थी। जाते जाते उसने माँ की तरफ देखा तो माँ ने समझाया बेटा यही जीवन की रीत है। हर लड़की को शादी कर पराया होन...
बेबसी (कश्मीरी स्त्री की)
कविता

बेबसी (कश्मीरी स्त्री की)

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ******************** वो हर दहलीज और हर शाम उसका इन्तजार करती है वो ढलती धूप और मायूस सुबह कल फिर से होती है वो शौहर जो चंद रोज पहले ले गया कोई आज तक उसके आने का इंतजार करती है वो खुद को क्या कहे ना सुहागन ना विधवा उसे स्वछंद जीने का अधिकार आज ख़त्म हुआ जिंदगी के दुखों को चेहरे पर समेटे अपार दिक़्क़तों को पल्लू में लिये लपेटे पति के इंतजार में आधी जिँदगी बिताये बाकी की जिंदगी बच्चों का भविष्य सवारें कुछ ऐसी ही आधि जिंदगी अपनाये बीता हर दिन और हर निशा एक आशा लेकर आये कि शायद किसी दरवाज़े पर कभी तो दस्तक होगी सुहाग का सामान देख मन का ललचाना दूसरे ही क्षण विधवा का एहसास होना साँझ क्षितिज की लालिमा को देखना और सफ़ेद लिबास देख आँखें भर आना दुनिया की बुरी नजर से खुद को बचाये रखना निर्मल दामन रखकर भी हमेशा लांछन सहना आँखें शुष्क और पथराई सारे अरमानों की सती कर आई ...
जख्मों की टीस
कहानी

जख्मों की टीस

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************                                   नेहा महज तीस साल की है। वह हिमाचल प्रदेश के बद्दी में रहती है। वह बद्दी के एक नामी पाठशाला में शिक्षिका है। वह अक्सर कहती कि उसे छुट्टियों वाले दिन की दोपहर बहुत लम्बी लगती है जैसे कि दिन यहाँ आकर रुक सा जाता है और इन दोपहरों की चुप्पी जैसे बीहड़ की कोई झील एकदम शांत सी। आज इतवार था। इस दिन का सभी बेसब्री से इंतजार करते हैं। कोई दोस्तों से मिलने जाता है तो कोई सिनेमा देखने तो कोई शॉपिंग। पर नेहा के लिये यह सबसे लंबा और बोझल दिन रहता है। वह तब भी था जब आकाश था और वह अब भी है जब आकाश नहीं। आकाश नेहा का पति एल. आई. सी. में फील्ड ऑफिसर था। उसकी मौत हो चुकी थी। वह कोशिश करती कि रविवार को भी कॉपी चेकिंग के लिए ले जाये। पर आज तो उसके सारे काम भी खतम हुए काफ़ी समय हो गया था। शाम का समय था कॉलोनी के कपल देख उस...
वनवासी
आलेख

वनवासी

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************                                    भारत देश संस्कृति, विभिन्न धर्मों, जनजातियों और भाषाओ का सम्मिश्रण है। इस देश के लोग शहरों में, गावों में और जंगलों में रहना पसंद करतें हैं। हम शहरों में रहने वालों को शहरी, गाँव में रहने वालों को ग्रामीण और जंगलों में रहने वालों को हम आदिवासी कहते हैं। यदि आदिवासी इस शब्द का सन्धि विच्छेद किया जाय तो आदि(म)+वासी =मूल निवासी। आखिर ये आदिवासी क्या होते हैं? क्या खाते हैं? ये समाज से कटे हुए क्यों होते हैं? इनमें क्या अदभुत और विलक्षण होता है? इन्हें लोग अजूबे की तरह क्यों देखते हैं? इनकी वेशभूषा, खानपान क्यों आम आदमियों की तरह नहीं होती? ये क्यों समाज से दूर भागते हैं? ऐसे अनगिनत प्रश्न मन में उठते हैं। सुना है कि ये वनवासी प्रकृति पूजक होते हैं क्यूकि प्रकृति ही इन्हें अन्न, परिधान, आवास और औषधि प्...
धूप-छाँव
कहानी

धूप-छाँव

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************              घड़ी में शाम के चार बजे थे। रमेश अपने कॉर्पोरेट के आलिशान ऑफिस में बैठा था। तभी चपरासी चाय लेकर उसकी मेज पर रख गया। चाय के प्याले को हाथ में लिये रमेश अपने सम्पूर्ण कार्यकाल को याद करने लगा। उसका बहुराष्ट्रीय कंपनी का वो पहला दिन जहाँ सारे विदेशी कर्मचारी थे और वो अकेला हिंदुस्तानी। उसे हर दिन एक नई तकलीफ का सामना करना पड़ता था। वो विदेशी इसके साथ कार्यस्थल पर राजनीति खेलते थे। जब सारे साथ जाते तो उसे हीन नजरों से देखते थे ये सोचकर कि उसे उनकी भाषा समझ में आ भी रही है या नहीं? खाने की मेज पर बैठते तो उसको टकटकी लगाकर देखते कि वो चाकू, छुरी से खा पायेगा कि नहीं? इत्यादि इत्यादि। इन सारी तकलीफों के कारण रमेश को असंख्य बार हिंदुस्तानी कंपनी में काम करने की इच्छा हुई। उसके एक वरिष्ठ पदाधिकारी को उसकी तकलीफों का अंदाजा था। उसने...
गंगासागर
कहानी

गंगासागर

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************                          मैं ऑफिस से अपना काम खतम कर निकली वैसे ही रामसिंग जो हमारा प्यून था दौड़ कर आया और बोला कि आपको साहब बुला रहें हैं। बॉस के केबिन में जाते ही बॉस ने मेरे हाथ में कोलकता का हवाई टिकट पकड़ाया और कहा कि "आपको कोलकता ऑफिस में दो दिन के असाइनमेंट पर जाना है। कम्प्यूटर्स सारे ख़राब है तो प्रेज़ेंटेशन के लिये आपको वहाँ जाकर कैसे भी कर मेन प्रोग्राम को ठीक करना है।" मेरा तो जी जल गया क्यूंकि दो दिन के बाद उत्तरायण जो था। बहोत सारे प्रोग्राम बनाये थे कि तिल के लड्डू बनाउंगी, पतंग उड़ाएंगे और मौज करेंगे। और आज बॉस ने ये हवाई टिकट पकड़ाकर सारे प्रोगाम पर पानी फेर दिया। अब मैंने दूसरे दिन कोलकता पहुँच कर दिन भर काम किया और घड़ी में देखा तो शाम के सात बजे थे। फिर दिल बोल उठा कि काश मैं गुजरात में होती। केबिन से बाहर आई तो देखा कि...
राम भारत का स्वाभिमान
कविता

राम भारत का स्वाभिमान

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ******************** भगवान राम से है भारत की पहचान शुरू हो गया रामजन्म स्थल निर्माण राम मंदिर हम सभी भारतीयों का स्वाभिमान राम सभी के, सभी राम के ये हमारी शान संस्कृति ओर संस्कारों पर हमें हो अभिमान सर्वें भवन्तु सुखीन: परिपाटी करें सब का सम्मान त्याग, बलिदान, साहस, धैर्य की थी वह मूर्ती तभी सारे विश्व में है आज सियाराम जी की कीर्ति वानर सेना ने दिखाई प्रभु राम जी में भक्ति तभी समुद्र पर पुल बनाने की उन्हें मिली शक्ति रावण जैसे बलशाली राक्षस को मार समझाई, बुराई पर अच्छाई की जीत चारों भाई सगे न होने पर भी रिश्तों को साथ रखने की सीख अपने आराध्य के चरणों में बिन संदेह समर्पित होना तभी मोक्ष और जन्म मरण से छुटकारा पाना विनम्र आचरण से बड़ों का सम्मान, मानों छोटों का आभार उम्र, लिंग भेदभाव बावजूद समान करो व्यवहार युगों से न हो सका अब हो रहा साकार वर्षों ...
आत्मविश्वास
कहानी

आत्मविश्वास

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************   तीस साल का अशोक एक सीनियर प्रबंधक, बहुराष्ट्रीय कम्पनी के स्वागत कक्ष में बैठा था।अशोक थोड़ा आतुर था, थोड़ा घबराया हुआ क्यूंकि आज उसके जीवनकाल और उसके कम्पनी की सबसे बड़ा समझौते पर हस्ताक्षर होने जा रहे थे। तभी रिसेप्शनिस्ट ने आकर उसे बताया कि सर बुला रहे हैं और आपको प्रेज़ेंटेशन के लिये सिर्फ बीस मिनट का समय है। अंदर जाकर जैसे ही अशोक ने प्रेजेंटेशन देना शुरू किया वो बीस मिनट कब जाकर चार घंटे हो गये पता ही नहीं लगा। उसके प्रेजेंटेशन से कम्पनी का मालिक बहोत खुश हुआ और डील साइन हुई। साइन करते-करते मालिक ने कहा- यंग मेन मैं तुमसे बहोत इम्प्रेस हुआ हूँ। जब से अशोक आया तब से उसकी नजर वहाँ रखी लूज तम्बाकू और लूज कागज से जो हेंडरोल सिगरेट बनाते हैं वो उनकी मेज पर रखी थी। तभी मालिक ने अशोक से पूछा कि क्या तुम इसे लोगे? अशोक ने हामी भरते हुए ए...
प्रवास
कहानी

प्रवास

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************   शाम के करीब छः साढ़े छः का समय था। बाहर अरब सागर पर सूर्य ढल रहा था। जिसकी लालिमा अरब सागर पर अपनी छाप छोड़ रही थी। मैं अपने चौदहवी माले वाले नरीमन पॉइंट पर स्थित कार्यालय से सागर की उठती लहरों को देखकर सोच रहा था कि जिंदगी भी कितनी अजीब है। मैं आज ही के दिन करीब तीस साल पहले यहाँ आया था तब क्या था और आज क्या हूँ। इतने में टेलीफ़ोन की घंटी बजी। उठाया तो घर से फ़ोन था। पत्नी ने बाबूजी की पिच्यास्वी सालगिरह की पार्टी हेतु टिकिट बुक कराने का याद दिलाया था। मेरे दिमाग के ख्याल समुद की लहरों की भांति बिखर गये। घर जाने की तैयारी मैं मैने अपने टेबल पर बिखरे काम पूरे किये और अजीज को गाडी निकालने को कहाl इतने सालों के बाद गाँव जाने के ख्यालों में कब घर पहुँचा मालूम ही ना पड़ा। घर में गुस्ते ही मैने कहा आप सबको सरप्राइज है। हम सब इस बार अपनी नई ...
जलदेवियाँ
लघुकथा

जलदेवियाँ

मंजिरी पुणताम्बेकर बडौदा (गुजरात) ********************  नारी उस वृक्ष की भाँति है जो विषम परिस्थिति में तटस्त रहते हुए परिवार के सदस्यों को छाया देती है। नारी अबला नहीं सबला है। पुरुष वर्ग शायद नहीं जानते कि नारी कोमलता एवं सहनशीलता के साथ यदि वह दृढ निश्चय करे तो वह कुछ भी सम्भव कर सकती है। इस बात के असंख्य उदाहरण हैं जिसमें से एक कहानी आपके सम्मुख प्रस्तुत है। गंगाबाई और रामकली ये दोनों आदिवासी खालवा विकास खंड लंगोटी की रहने वाली थीं। इस आदिवासी विकास खंड की पहचान सुदूर आदिवासी अंचल के नाम से थी क्यूंकि ये दुनिया से एक सदी पीछे था। इस विकास खंड के पंद्रह गाँव आज भी पहुँच विहीन हैं। पानी के अभाव से जीवन अत्यंत जटिल था। गंगाबाई और रामकली के साथ पार्वती, लछमी, ललिता, मीरा, चमेली, टोला और चम्पा ये सारी स्त्रियाँ हर रोज सुबह शाम तीन किलोमीटर तापती नदी पर जाकर झिरी खोद कर पानी भर कर लातीं थ...