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Tag: शिवदत्त डोंगरे

अपनोंं से निष्कासित
कविता

अपनोंं से निष्कासित

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक टुकड़ा बादल का छोटा सा आंँखों के काजल- सा भटक रहा था यतीम- सा मगर मुझे लगा इसमें कोई बात है मौसम बरसात ‌का हुजूम बादलों का उमड़-घुमड़ बरस रहा फिर क्या वज़ह कि सूखी आंखों से गीली धरती ताक रहा. बस पूछ लिया मैंने अकेला अनमना है क्यों उसने देखा देर तक देखा फिर उदास- सा होके हमसे कहा अपनोंं से निष्कासित हूँ कहा गया था आज बरसना है झुग्गी पर शहर‌ के दांएंँ कोने की तराई पर नीचे देखा कुछ बच्चे खेल रहे थे लगा ये बच्चे डूब जाएंगे मैंने ना कर दी समझाया औरों ने पर मन माना नहीं तब मुझे फिर ये सज़ा मिली जा धूप में मर कल चुपके से जाके हल्की फुहार- सा बरसूंगा आज भय से दुबके बच्चे कल रिमझिम में उछलेगें खेलेगें पर आज मुझे सारा दिन यूँ‌ ही जलना होगा और तब से सोच रहा हूंँ मैं ...
जागना-चेतना-मरना
कविता

जागना-चेतना-मरना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जागना संगीत छन रहा हो अँधेरे की जाली से रोशनी के मानिन्द राग. तुम हो जाओ विराग. संगति को रहने दो निर्लिप्त. नादब्रह्म मौन पोर-पोर से अनुभव करो जागने का आनंद I चेतना जिज्ञासा मरती है मायूसी छोड़कर. प्रेम मरता है उदासी छोड़कर. मनुष्य मरता है राख छोड़कर और स्मृतियाँ शून्य. हाँ, तारीखें मरती हैं तारीखें छोड़कर यूँ रिसता है कालपात्र और सबकुछ समा जाता है धरती के रहस्यमय हृदय में. मरना घराना अलग आलापचारी अलग लयकारी अलग आघात की गति और वज़न अलग. फिर भी यह एक ही बंदिश आ रही है अलग-अलग रागों में नए-नए रूप धरकर. अलग भावस्थिति अलग स्वर-रचना शब्दार्थ-गायन का अलग स्वर-विलास अलग विस्तार. मुक्त करो, मुक्त करो खुद को इस बंदिश से अन्यथा मैं मर जाओगे जन्मों तक यूँ ही मरने क...
भंवर
कविता

भंवर

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* एक ऐसे समय में जब काला सूरज ड़ूबता नहीं दिख रहा है और सुर्ख़ सूरज के निकलने की अभी उम्मीद नहीं है एक ऐसे समय में जब यथार्थ गले से नीचे नहीं उतर रहा है और आस्थाएं थूकी न जा पा रही हैं एक ऐसे समय में जब अतीत की श्रेष्ठता का ढ़ोल पीटा जा रहा है और भविष्य अनिश्चित अति असुरक्षित दिख रहा है एक ऐसे समय में जब भ्रमित दिवाःस्वप्नों से हमारी झोली भरी है और पैरों के नीचे से ज़मीन खिसक रही है एक ऐसे समय में जब लग रहा है कि पूरी दुनिया हमारी पहुंच में है और मुट्ठी से रेत का आख़िरी ज़र्रा भी सरकता सा लग रहा है एक ऐसे समय में जब सिद्ध किया जा रहा है कि यह दुनिया निर्वैकल्पिक है कि इस रात की कोई सुबह नहीं और मुर्गों की बांगों की गूंज भी लगातार माहौल को खदबदा रही है एक ऐसे समय म...
तानाशाह के पास
कविता

तानाशाह के पास

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अपने वफ़ादार वर्दीधारी सैनिक थे, अपने चुने हुए जन-प्रतिनिधि थे, अपने अमले-चाकर थे, अफ़सर-मुलाज़िम-कारकुन थे, अपनी न्यायपालिका थी, अपने शिक्षा-संस्थान थे जहाँ टैंक खड़े रहते थे और तानाशाही तले जीने की शिक्षा दी जाती थी। पर तानाशाह की सबसे बड़ी ताक़त हिंसक भेड़ियों के झुण्ड जैसी वह भीड़ थी जो तानाशाह के लोगों ने बड़ी मेहनत से तैयार की थी। इसमें समाज के अँधेरे तलछट के लोग थे और सीलन भरे उजाले के पीले-बीमार चेहरों वाले लोग थे और जड़ों से उखड़े हुए सूखे-मुरझाये हुए लोग थे। यह भीड़ तानाशाह के इशारे पर किसीको बोटी-बोटी चबा सकती थी, सड़कों पर उन्माद का उत्पात मचा सकती थी, बस्तियों को खून का दलदल बना सकती थी। सम्मोहित-सी वह भीड़ हमेशा तानाशाह के पीछे चलती थी और तानाशाह के इशारे का इंतज़ार करती थी। त...
जीत जाओगे एक दिन
कविता

जीत जाओगे एक दिन

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* अपनी मुश्किलों से जो लड़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन! अगर तुम बारीकियों को पकड़ रहे हो तो सीख जाओगे एक दिन !! हौसले से मंजिल पर बढ़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! समय की हवा उस रुख में बहने लगेगी जिस दिशा में तुम होगे ! खुशियों की परछाईयाँ पीछे चलने लगेगीं जिस जगह पे तुम होगे ! साफ नीयत से काम करोगे तो काम भी तुम पर मरेंगे !! अगर ज़मी-आसमां एक कर रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! ख़ामोशी के संग भी तुम ख़ामोश मत रहना !! हुस्न के नशे में हर दम मदहोश मत रहना !! अपनों को गैर मत करना गैरों से बैर मत करना !!!! हुस्न इक निकासी है आत्मज्ञान सर्वव्यापी है ये बात जो समझ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन ! अपनी मुश्किलों से जो लड़ रहे हो तो जीत जाओगे एक दिन !! परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्...
मैं हूँ ना …
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मैं हूँ ना …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जब ज़िंदगी उलझने देती है और सारे दरवाज़े बंद लगते हैं तब दिल सबसे पहले जिस नाम को पुकारता है वो है- ‘पिता’ हर मुश्किल का टोल फ्री नंबर। ना नेटवर्क चाहिए ना कोई बैलेंस ना ही कोई समय तय करना होता है बस एक कॉल दिल से जाता है और उस तरफ से आता है "बोल बेटा, क्या हुआ?" जब जेब खाली हो और सपने भारी जब दुनिया मुंह फेर ले और दोस्त भी न साथ दें तब वो कहते हैं "मैं हूँ ना… तू बस चल" न टाइमटेबल न ही शिकायत की फुर्सत लेकिन फिर भी वो हमेशा अवेलेबल रहते हैं, हर दर्द, हर चिंता के लिए। उनकी आवाज़ में वो जादू है, जो आँसुओं को रोक देता है और उनके कंधे मानो पूरी दुनिया से मज़बूत हैं। "पिता" वो टोल फ्री नंबर है जो कभी व्यस्त नहीं होता जो हर बार जवाब देता है चुपचाप, लेकिन पूरे दिल ...
मौन और संवाद
कविता

मौन और संवाद

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* आज मै फ़िर बैठी हूँ उसी जगह वही समय और वही चांद है मेरे सामने बस तुम कहीं खो गए हो. बादल तो हमारे यहां हल्के हैं इस बरसात में भी शायद तुम्हारे यहां के बादल तुम्हें छिपाकर रोक लिया चांद को दिखाने से कुछ यूं ही हम तुमको सोच रहे हैं. क्या वो मछली स्पर्श कर पाई होगी कमल को या वो वैसे ही बैचेन उद्धत है आज भी चूमने को उस कमल को? नहीं शायद वो घबरा गई होगी मेघों को देख के या कहीं छिप गई होगी उसी कमल के पत्तों में लेकिन इसका मतलब ये नहीं कि वो दिखें न तो वो होगा ही नहीं बस ऐसे ही घुमड़ रहे हैं कई सवाल जो सिर्फ़ और सिर्फ़ दिमाग़ की उपज हैं. इसलिए कि कुछ प्रश्न उसके अनुसार अनुत्तरित रहते हैं हां सही भी है हर सवालों के जवाब मिल जाए जरूरी तो नहीं. आज फ़िर बैठी हूँ तो उ...
मुझे तुम भूल जाना …
कविता

मुझे तुम भूल जाना …

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* साथ देखा था कभी जो एक तारा आज भी अपनी डगर का वो सहारा आज भी हैं देखते हम तुम उसे पर है हमारे बीच गहरी अश्रु-धारा नाव चिर जर्जर नहीं पतवार कर में किस तरह फिर हो तुम्हारे पास आना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! सोच लेना पंथ भूला एक राही लख तुम्हारे हाथ में लख की सुराही एक मधु की बूँद पाने के लिए बस रुक गया था भूल जीवन की दिशा ही आज फिर पथ ने पुकारा जा रहा वह कौन जाने अब कहाँ पर हो ठिकाना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! चाहता है कौन अपना स्वप्न टूटे? चाहता है कौन पथ का साथ छूटे? रूप की अठखेलियाँ किसको न भातीं? चाहता है कौन मन का मीत रूठे? छूटता है साथ सपने टूटते पर क्योंकि दुश्मन प्रेमियों का है ज़माना। भूल पाओ तो मुझे तुम भूल जाना! यदि कभी हम फिर मिले जीवन-डगर पर मैं लिए आँसू, लिए तुम ...
प्रेयसी की पाती
कविता

प्रेयसी की पाती

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* पता है कुछ वक़्त बाद हम साथ नहीं होंगे वक़्त करवट लेगा तो सब बदल जाएगा तुम मेरे न रहोगे और मै शायद रहूंगी ही नहीं. हां मगर मै तुमको तनहा नहीं छोडूंगी तुझ संग सदैव रहेंगी मेरी यादें मेरा वो अटूट प्रेम जो मैंने आजीवन तुमसे किया मेरी श्रद्धा. श्रद्धा जो तुम्हारे प्रेम के लिए थी वो भी सदैव रहेगी मेरी मुस्कुराहट गूंजेगी तुम्हारे अंतर्मन में हमेशा यूं ही मेरी आंखो में तुम्हारा अक्स जो तुम्हे हमेशा दिखाई पड़ता था वो भी तुम्हे आंखे बन्द करके समक्ष दिखाई देगा. जब भी कोई हवा का झौंका तुम्हे छूकर गुजरेगा तुम महसूस करोगे मुझे अपने आस पास हमेशा ही तुम्हारे मन में मेरे गीत हमेशा गुंजायमान रहेंगे माना कि मेरी कोई जायदाद नहीं जो तुमको सौंप जाऊं मै मेरे पास तो बस तुम्हारा प्रेम है ...
आजादी
कविता

आजादी

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ख़ौफ़ से आज़ादी ही हमारी सच्ची आज़ादी है जिस पर मैं तुम्हारे लिए दावा ठोंकता हूँ मेरी मातृभूमि! पीढ़ियों के बोझ से आज़ादी अपना सिर झुका कर चलते रहना अपनी कमर की हड्डियाँ तोड़ लेना और भविष्य की पुकार पर मूंद लेना अपनी आँखों को नींद की बेड़ियों से चाहिए हमें आज़ादी. जिससे तुम रात के सन्नाटे में ख़ुद को जकड़ लेते हो और उस सितारे पर ज़ाहिर करते हो अपना अविश्वास जो सत्य की साहसिक राहों तक हमें ले जाना चाहता है आज़ादी अपनी क़िस्मत की अराजकता से. जिसकी पालें अंधी और अनिश्चित हवाओं के सामने कमजोर पड़ती जाती हैं और पतवार हमेशा चला जाता है मौत के माफ़िक कठोर और ठंडे हाथों में कठपुतलियों की इस दुनिया में रहने के अपमान से आज़ादी. जहाँ हरकतें बद-दिमाग़ तंत्रिकाओं के ज़रिए शुरू होती हैं नासमझ आ...
जीभर जीकर जाना
कविता

जीभर जीकर जाना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* खाना-पीना सो जाना बात-बात पर रो जाना. क्या ये है कोई ज़िंदगी यूँ ही मायूस हो जाना. चार दिनों की पूँजी साँसें बेजा इन्हें मत कर जाना. अवसर यह मिला हुआ है इसको जीभर जीकर जाना. विधाता ने बड़े प्यार से धरती घूमन को भेजा है. कुँदन काया सुँदर माया देकर के तुम्हें सहेजा है. अंदर-बाहर भरा उजाला हम सबको राह सुझाते हैं. न जाने किस भरम बावले कोई राह तक न वे पाते हैं. जग जैसा है, वैसा ही है किसलिए है इससे डरना. अकारण न घटती घटना केवल कारण से है बचना. बस इतना है हाथ तुम्हारे खुद की सुधबुध है रखना. है ईश्वर तेरे ही भीतर बैठा जब जी चाहे कर मिलना. बिना विचारे अंधा हो कर काहे कदम उठावे तू प्यारे. खुली आँख से चलने वाला कभी न ठोकर खावे प्यारे. तन- जीवन- जान अभी है फिर क्यों तू घबराए जग...
बौना हुआ ईमान
कविता

बौना हुआ ईमान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सारी दुनिया वह कहे जो सम्मत विज्ञान धरती -चपटी मानते अभी बहुत इंसान। अड़े हुए हैं झूठ पर जान -बूझ अंजान अंध-श्रद्धा के सामने बौना हुआ ईमान। इंसाँ -इंंसाँ फर्क कर मज़हब लीने मान कुछ लोगों को छोड़कर सब काफिर शैतान। काफ़िर का जायज़ क़तल क्या यही कहता ज्ञान काफ़िर का कर खात्मा हासिल करो जहान। जो धरती पैदा हुआ वो सब एक समान यहाँ सभी हकदार हैं जीव -जंतु -इंसान। प्रेम -मुहब्बत -मुरब्बत इंसानी पहचान जिस मज़हब ये न रहें वो मज़हब मुर्दा जान। कुछ लोगों को वहम का होने लगा गुमान जो जितना जाहिल दिखे वो मज़हब की शान। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्व...
संभल जा इंसान
कविता

संभल जा इंसान

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* सारी दुनिया वह कहे जो सम्मत है विज्ञान धरती -चपटी मानते अभी बहुत इंसान। अड़े हुए हैं झूठ पर जान -बूझ अंजान अंध -श्रद्धा के सामने बौना हुआ ईमान। इंसाँ -इंंसाँ फर्क कर मज़हब लीने मान कुछ ही को छोड़कर सब काफिर शैतान। काफ़िर का जायज़ क़तल इनका यही कहता ज्ञान काफ़िर का कर खात्मा हासिल करो जहान। जो धरती पे पैदा हुआ वो सब ही एक समान यहाँ सभी हकदार हैं, जीव - जंतु - इंसान। प्रेम- मुहब्बत- मुरब्बत इंसान की है पहचान जिस मज़हब ये न रहें वो मज़हब मुर्दा जान। लोगों को वहम का है होने लगा गुमान जो जितना जाहिल दिखे वो ही मज़हब की शान। घटिया- सटिया माल की कुछ दिन चले दुकान बेचा सो वापस फिरे करना पड़े चुकान। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : ...
मैं पुरुष हूं
कविता

मैं पुरुष हूं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* मैं पुरुष हूं मर्दानगी की सूली पर चढ़ा हूं कठोर हूं, निर्मम हूं ,निर्भय हूं इस तरह ही मैं गढ़ा गया हूं. मैं पुरुष हूं खारिज भी किया गया हूं कभी बेटा नालायक कभी पति नामर्द कभी पिता नाकाबिल बताया गया हूं. मैं पुरुष हूं मुझे यह भी बताया गया है : बस जिस्म तक सोचता हूं मैं हवस की दलदल में धंसा हवस का पुजारी कहा गया हूं. मैं पुरुष हूं दर्द से मेरा क्या रिश्ता मैं पत्थर हूं आंसुओं से मेरा क्या वास्ता मगर सच तो ये है कि मैं भी रूलाया गया हूं. जब भी किसी गलत को गलत कहता हूं अपने ही घर में जालिम करार दिया जाता हूं मैं पुरुष हूं, ऐसे ही दबा दिया जाता हूं. मैं पुरुष हूं, लेकिन~ मुझमें भी हैं परतें मुझमें भी पानी बहता है खोल सकोगे जो परतें मेरी तो देखोगे : मुझमें भी सैलाब रहता है....
आयु अपनी शेष हो गई
कविता

आयु अपनी शेष हो गई

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* आयु अपनी शेष हो गई पीड़ा की पहनाई में अब भी सपने सुलग रहे देखे जो तरुणाई में काजल सी काली अंधियारी यह रात ढलेगी संभव आशाएं मुस्काए पूरब की अरुणाई में चैता की वो विरह गीतिका कब तक सिसके कभी संदेशा आने का मिल जाए पुरवाई में इन सांसों की उलझन में क्यों जीवन उलझे हरियाए उपवन भी, कलियों की अंगड़ाई में क्यों ना पाए समझ, झुकी दृष्टि की लाचारी क्यों नहीं डूबकर देखा चुप्पी की गहराई में सहमे-सहमे गलियारे हैं दरकी-दरकी दीवारें पहले कैसी चहलपहल होती थी अंगनाई में जब स्वयं को भूल गए हम, अपने ही भीतर कितना बेगानापन लगे अपनी ही परछाई में मन की सारी व्यथा लिखी, इन गीतों छंदों में पूरे सफर की कथा लिखी पांव की बिवाई में परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फ...
स्त्री
कविता

स्त्री

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* उन्हें पुकारा गया शहर या गाँव के नाम से खंडवा वाली पिपरिया वाली देवरी वाली छिंदवाड़ा वाली. कभी बच्चों के नाम से बिट्टू-छोटू की माँ मनी की माँ लकी की माँ. प्रिया रिया की मां पति के पेशे से भी हुई इनकी पहचान मास्टरनी डाक्टरनी मील वाली भट्टा वाली. तो किसी ने कहा विधवा बाँझ बदचलन बेहूदा या ख़राब औरत। औरतें जो खपती रहीं मकान को घर बनाने में जिम्मेदारियाँ निभाने में पति के नख़रे उठाने में बच्चों को लायक बनाने में ताउम्र कोई नहीं जान पाया उनका असली नाम सिवाय घर की एक दीवार के यहाँ लटकी हुई तस्वीर में वो साथ झूलता है। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्ष...
धरा भी तू ही गगन भी तू
स्तुति

धरा भी तू ही गगन भी तू

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* धरा भी तू ही गगन भी तू मरुस्थल तू मधुवन भी तू सागर भी तू है ज्वार भी तू पार भी तू ही अपार भी तू आदि भी तू अंत भी तू... शक्तिमाम्....शक्तिमाम्. मान्य भी तू अमान्य भी सरल कठिन सामान्य भी अनुराग भी तू विराग भी काल तू ही विकराल भी अंत भी तू ही अनन्त भी शक्तिमाम्....शक्तिमाम्. सुधा भी तू है गरल भी तू अतीत अद्य तू कल भी तू सृजन ही तू विनाश भी तू आस भी तू विश्वास भी तू दिग भी तू दिगन्त भी.... शक्तिमाम्....शक्तिमाम्. सृजन भी तू सृष्टि भी तू अगोचर है तू दृष्टि भी तू विषपायी तू भुजंग भी तू हिमाद्री है तू अनंग भी तू गहन निशा तू प्रात भी तू स्नेह है तू है संघात भी तू पतझर भी तू बसंत भी.... शक्तिमाम्....शक्तिमाम्. परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० ...
तर्क
कविता

तर्क

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* दुनिया के सबसे सुन्दर फूल की तरह खिलता है, एकदम मानवीय प्यार की तरह, मेहनत की ज़मीन पर उगे अनुभव के पौधे पर शोभा पाता है तर्क मेहनत करने वालों के पास। तर्क सुन्दर होता है क्योंकि वह बताता है कारण का कार्य से सम्बन्ध वह बताता है चीजों के होने के बारे में, गतियों के रहस्यों के बारे में। बताता है वह रहस्य, अन्धकार और कृत्रिमता तथा निरुपायता से मुक्ति के बारे में इसलिए ज़रूरी है तर्क करना और लोगों को बताना तर्क के बारे में। जो चाहते हैं दुनिया को चलाना ऐसे ही जैसे कि वह चल रही है वे डर जाते हैं जब हम शुरू करते हैं तर्क करना I परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इं...
बेकार लड़का
कविता

बेकार लड़का

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* बेकार लड़का माँ से नहीं डरता पिता से नहीं डरता और न ही मौत से बेकारी के दिनों में उसका सारा डर मर गया। सिगरेट के दाम से लेकर दोस्तों के चेहरों तक बहुत कुछ बदल गया दीवार से उतरे हुए पुराने कैलण्डर की तारीखें चली गईं अखबार की रद्दी के साथ थूकने के अलावा क्या बचा है बेकार लड़के के पास जबकि दिन बहुत छोटे हो गए हैं और ठंडी हवा गालों में चुभती है। बाज़ार की चिल्ल-पों धूल भरी गलियों के सूनेपन और अपनी पीठ पर टिकी कस्बे की आँखों से बचता देर रात पहुंचता है वह घर नींद में बड़बड़ाते पिता न जाने कब सुन लेते हैं किवाड़ों पर दी गई थाप पिता की दिनचर्या में शामिल हो गई है दरवाजे की हलचल सिर झुकाकर उसका सामने से गुजर जाना कुछ शब्दों के हेरफेर से जमाने का बिगड़ना और अरे मेरे भगवान कह फिर सो जाना...
वे पुरानी औरतें
कविता

वे पुरानी औरतें

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जाने कहाँ मर-खप गई वे पुरानी औरतें जो छुपाए रखती थी नवजात को सवा महीने तक घर की चार दीवारी में। नहीं पड़ने देती थी परछाई किसी की रखती थी नून राई बांध कर जच्चा के सिरहाने बेल से बींधती थी चारपाई रखती थी सिरहाने पानी का लोटा सेर अनाज दरवाजे पर सुलगाती थी हारी दिन-रात। कोई मिलने भी आता तो झड़वाती थी आग पर कपड़े और बैठाती थी थोड़ा दूर जच्चा-बच्चा से फूकती थी राई, आजवाइन, गुगल सांझ होते ही नहीं निकलती देती थी घर से गैर बखत किसी को। घिसती थी जायफल हरड़ बच्चे के पेट की तासीर माप कर पिलाती थी घुट्टी और जच्चा को देती थी घी आजवाइन में गूंथ कर रोटियाँ। छ दिन तक रखती थी दादा की धोती में लपेटकर बच्चे को फिर छठी मनाती थी बनाती थी काजल बांधती थी गले में राई लाल धागे से. पहना...
आदमी वो ही हैं
कविता

आदमी वो ही हैं

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* आदमी वो ही हैं आदमी वो ही है जिसमें धैर्य तो हो मानव धर्म भी हो आदमी वो है करे जो सार्थक सब कर्म भी हो। आदमी वो है रहम का वास जिसके दिल में हो आदमी वो है जो सहज हर मुश्किल में हो। सच बताओ? लग रहा क्या आदमी-सा आदमी आदमी के भेष में क्यूँ ? जानवर-सा आदमी। कब घुसा इस आदमी के जिस्म में ये जानवर? आदमी हो तो तुम्हें इस जानवर की शर्म हो। आदमी का वहम हो और जानवर-पन ही रहे ये ईमाँदारी कहाँ? हम आदमी खुद को कहें। आदमी हैं जिंदगी में आदमी बनकर रहें आदमी हो तो समझ़ में तत्व का कुछ मर्म हो। आदमी गर ठान ले तो स्वर्ग सी जीवन धरा हो शुभ हुआ है आज तक भी आदमी जब शुभ करा हो। आदमी हो आदमी से जुड़ गये गर प्रेम से भाव जो गहरा हुआ तो हर हृदय में यह भरा हो। आदमी वो जो ये जाने जन्म ...
चाहना
कविता

चाहना

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* चाहना एक अभिव्यक्ति है और चाहत एक अनुभूति. चाहने में भौतिकता है और चाहत में स्वतंत्र, अद्वैत होने के बोथ. चाहना एक फूल से हो सकता है और चाहत संपूर्ण उपवन की. चाहने में लालसा और पाने की कामना उद्बबोधित है चाहत सृष्टि के स्वरुप की स्तुति हैं. इसलिए जब मैंने कहा कि तुम मेरी चाहत हो तो केवल तुम नहीं तुम से जुड़ी, बंधी वो सारी नैसर्गिकता भी है. निश्छल, पावन अक्षत एवं साश्वत काव्य संस्कृति में सौंदर्य बोध परालौकिक है. मेरा मौन रहना जिस दिन लोग समझेंगे मै उन्हें महाकाव्य लगूंगा। परिचय :- शिवदत्त डोंगरे (भूतपूर्व सैनिक) पिता : देवदत डोंगरे जन्म : २० फरवरी निवासी : पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) सम्मान : राष्ट्रीय हिंदी रक्षक मंच इंदौर द्वारा "समाजसेवी अंतर्राष्ट्...
वो क्यों है?
कविता

वो क्यों है?

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* जो वर्तमान है, वो क्यों है? हम बने जिम्मेदार कायरता तो जैसे हमारे ख़ून में थी और इन्तज़ार करना हमारा जीवन था। प्रार्थना पत्रों और निवेदनों की भाषा हमें घुट्टी में पिलायी गयी थी और मामूली लोगों के प्रति थोड़ी दया और कृपालुता ही हमारी प्रगतिशीलता थी। हमारी दुनियादारी को लोग भलमनसाहत समझते थे। संगदिली हमारी उतनी ही थी जितनी कि तंगदिली। अत्याचार और मूर्खता से उतने भी दूर नहीं थे हम जितना कि दिखाई देते थे और दिखलाते थे। जब ज़ुल्म की बारिश हो रही हो और कुछ भी बोलना जान जोखिम में डालना हो तो हम चालाकी से अराजनीतिक हो जाते थे या कला और सौन्दर्य के अतिशय आग्रही, या प्रेम, करुणा, अहिंसा, मानवीय पीड़ा, ख़ुद को बदलने आदि की बातें करने लगते थे। और लोग इसे हमारी सादगी और भोलापन समझते थे...
खोदिए …रुकिए मत
कविता

खोदिए …रुकिए मत

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* खोदिए! मस्जिद के नीचे खोदिए मिलेंगी मूर्तियां यक्ष, किन्नर, गंधर्व, देवों देवियों की मूर्तियां उसकी भी जिसका मंदिर ऊपर नहीं है. मूर्तियों के नीचे खोदिए मिलेंगे मिट्टी के बर्तन खिलौने उसके नीचे खोदिए पत्थर के औज़ार बर्तन और हथियार भी सिर्फ़ पत्थर के. उसके भी नीचे खोदिए अस्थियां खोपड़ी ठठरियां बचे-खुचे दांत मिलेंगे. उसके भी नीचे खोदिए रुकिए मत अभी भी आपके नीचे उतरने की ख़त्म नहीं हुई है संभावना. हालांकि ज़िंदगी की शर्त थी ऊपर उठने की कींच में धंसने की नहीं फिर भी जितना नीचे गिर सकते हैं गिरिए और खोदिए. अब मिलेंगे फ़ॉसिल्स उन पेड़-पौधों जीव-जंतुओं के जिनकी कब्र पर इस वक्त खड़े हो तुम. तुम्हारी सभ्यता तुम्हारे मंदिर-मस्जिद गिरजे ख़ानकाह सब खड़े हैं गर्व से जबकि शर...
ढूँढ रही हैं आँखें किस को
कविता

ढूँढ रही हैं आँखें किस को

शिवदत्त डोंगरे पुनासा जिला खंडवा (मध्य प्रदेश) ******************* ढूँढ रही हैं आँखें किस को क्या खोया कुछ खबर नहीं है. भटकन-तड़पन-बेचैनी है सब है लेकिन सबर नहीं है। क्या ऐसा था गुमा दिया जो जिसको ढूँढ रही हैं आँखें ग़लत दिशा में हो बाहर की बाहर कोई डगर नहीं है। खुद में ही खुद मंजिल अपनी खुद में ही खुद रस्ता अपना जो खोया खुद में खोया है किसी शहर किसी नगर नहीं है। कैसी तुम को बेचैनी है पहले खुद में खुद पहचानों कैसी भी आफ़त हो खुद में आखिर खुद से जबर नहीं है। ग़ाफ़िल-सा दौड़े खुद में ही खुद का कोई होश नहीं है ज़रा सुकूँ भी पा नहीं पाओ जो गर खुद में ठहर नहीं है। कुछ न कुछ तो खोया लगता कुछ न कुछ असआर ग़लत हैं या तो ये फिर ग़ज़ल नहीं है या फिर इसमें बहर नहीं है। क्या चाहा क्या पा जाओगे क्या मर्ज़ी का जी जाओगे? मरे-मरे जीना पड़ता है यहाँ हौसल...