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Tag: सरला मेहता

माँ का पल्लू
कविता

माँ का पल्लू

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** माँ पहनती थी सूती साड़ी उसे धोती कहा जाता था माँ की रंगबिरंगी साड़ी का वह प्यारा सा लम्बा पल्लू उसकी सर की शोभा बन काँधे से उतर कर हमेशा सामने लटका रहता था मानो खूँटी पर टँगा हुआ मुलायम तौलिया ही हो आँखे मलते जब उठता माँ के मुलायम पल्लू में सुहाना सवेरा होता मेरा कभी कुछ खाऊँ-पीयू पल्लू रुमाल बन जाता बिजली जाने पर पंखा धूप से बचाने को छाता ट्रेन बस की खिड़की पर वह पल्लू ही काम आता आज भी भुला न पाया उस तमाम मसालों की महक से भरे पल्लू को बाबा व मास्टर जी की डाँट पर ढाल बन जाता ढुलकते आँसुओं को पोछ गुलाबी गालों को सहलाता अपना लहराता पल्लू भी माँ ले गई अपने साथ याद में आँखें भर आती दिल ढूंढता उसे बारम्बार परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्ष...
कूक रही कोयलियाँ
धनाक्षरी

कूक रही कोयलियाँ

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** मनहरण घनाक्षरी कूक रही कोयलियाँ ये अम्बुवा की डालियाँ नियति निखर गई बासंती बयार से पीत रंग पसरा है वीतराग छलका है शारदे प्रसन्न हुई वीणा की झंकार से हरियाली देखो छाई मधुमास बेला आई सजनी सँवर गई यौवन के भार से डाल डाल पड़े झूले बालवृंद खूब डोले भोर से साँझ हुई हँसी की फ़ुहार से बिदेस से आया मीत सखियों ने गाए गीत आहट फिज़ा में हुई द्वारे पे दस्तक से किए सौलह सिंगार पीली ओढ़ के चुनर पिया से मिलन गई नैन मुंदे लाज से मेहँदी रचे हैं हाथ सजना है साथ साथ बिखरा गजरा ज़रा सँवार दे प्यार से ऋतुराज आगमन महामारी का नमन धरणी विभोर भई आशा के संचार से परिचय : सरला मेहता निवासी : इंदौर (मध्य प्रदेश) घोषणा पत्र : मैं यह प्रमाणित करती हूँ कि सर्वाधिकार सुरक्षित मेरी यह रचना स्वरचित एवं मौलिक है। ...
जो मुझे भा गई
लघुकथा

जो मुझे भा गई

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** दो वर्ष पश्चात घर जा रहा हूँ। टेक्सी में बैठे-बैठे पत्रिका के पन्ने पलटने लगा। सौंदर्य प्रतियोगिता पर नज़र पड़ते ही मुझे बहन के ब्याह का नज़ारा याद आ गया। बहन की वह परी सी सहेली मानो आकाश से उतर कर आई हो। सितारों जड़ी झक श्वेत साड़ी व लम्बे लहराते बालों में बिखरी मोगरे की लड़िया। नाम मात्र के गहने कह रहे थे... मोहताज नहीं जेवर का जिसे खूबी ख़ुदा ने दी। उसका पूरी जिम्मेदारी से माँ का हाथ बटाना मैं आज तक नहीं भुला नहीं पाया। इसी बीच माँ पापा ने कई रिश्ते सुझाए। बहन से उस सुंदरी के बारे में कई बार पूछा। विदेश में रह रही बहन उसका पता नहीं लगा पाई। चाय की तलब लगने पर टेक्सी रुकवाई। रेस्तरां में लगा कि मोगरे की खुशबू फैल रही है। सामने टेबल पर श्वेत पौशाक में पीठ किए बैठी एक युवती बैठी है। हाँ, बस लम्बी चोटी ही लहराती दिखी। ज्यों ही वह पलटी म...
हिन्दवासी हिंदी बोलो
कविता

हिन्दवासी हिंदी बोलो

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** हम हिंद के रहवासी हैं हिंदुस्तानी कहलाते हैं हिंदी हमारी मातृभाषा है यह देश की राजभाषा है राष्ट्रभाषा भी बन जाएगी ए हिंदवासियों हिंदी बोलो जननी जन्मभूमि हमारी स्वर्ग से भी महान होती तीसरी माँ है ये मातृभाषा प्रथम पूजनीय को त्याग क्यूँ पहने विदेशी ये जामें सबसे पहले हिंदी ही बोले यह सहज सरल व मधुर है झोपड़ी से महल तक जाती है संचार विचार का आधार है देश का अभिमान पहचान है एकता की भी ये सूत्रधार है संस्कृत की संस्कारी बेटी है विश्व बोलियों में तृतीय नं है विश्व में देश का अस्तित्व है सबने माना हमारा प्रभुत्व है इतिहास भी इसका भव्य है बने भारतीयों का व्यक्तित्व है हम सबको मिला मातृत्व है विज्ञान पर भी खरी उतरती है ध्वनि सिद्धांत पर आधारित है जो सोचे वही बोले व लिखते अंकल आँटी घोटाला नहीं है हर भाव के पृथ...
राष्ट्र के पुनरुत्थान में साहित्य की भूमिका
आलेख

राष्ट्र के पुनरुत्थान में साहित्य की भूमिका

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** राष्ट्र का तात्पर्य मात्र देश नहीं, देश के साथ उसकी संस्कृति भी है। इसमें वन, पहाड़, नदियाँ व  सामाजिक रीतिरिवाज भी समाविष्ट हैं। राष्ट्र एक प्रवाहमयी इकाई है। साहित्यकार जो अनुभव करता, वही लिखता है। साहित्य, समाज का दर्पण ही है।  आदिकाल, भक्तिकाल व रीतिकाल तक राज्याश्रय, अध्यात्म व श्रृंगार के संदर्भ में लिखा गया। आधुनिककाल में राष्ट्रप्रेम व समाजसुधार की स्वस्थ भावनाओं द्वारा साहित्य, सामान्यजन से जोड़ा जाने लगा। गद्यविधा भारतेंदु युग  इस नवजागरण युग में सदियों से सोए भारत ने अँगड़ाई ली। राष्ट्रवादी-भाव, जनवादी- विचारधारा, संस्कृति- गौरवगान, स्वराज्य- भावना पर भी लेखनी चलने लगी। भारदेन्दु अंग्रेजों की फूट नीति में... "सत्रु सत्रु लड़वाई दूर रहि लखिय तमासा" "उठो हे भारत, हुआ प्रभात" नारी दशा पर  " स्त्रीगण को विद्या देवें " ...
अकेले हम
कविता

अकेले हम

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** नहीं समझ पाया था जन्मदात्री माँ का दर्द कर्ज में डूबे पिता प्रति एक पुत्र का अहम फर्ज़ सोचता था बस यही जन्म दिया है इन्होंने कर्तव्य तो निभाना ही था कौनसा एहसान किया है जब मैं स्वयं पिता बना और पत्नी माँ बनी बदल गई हमारी दिनचर्या सुबह से रात तक की तुम्हें कोई दर्द होने पर रातभर तीमारदारी करना और जब तुम सोते थे जल्दी से काम निपटाना हम दोनों बारी बारी से लेने लगे थे छुट्टियाँ जब तुम्हारे दाँत निकले या ठुमक के चलना सीखे तुम्हारे स्कूल की मांगें जब भारी होने लगी हमारे शौकों की फ़ेहरिस्त छोटी होने लगी थी तुम्हारी पढ़ाई व नौकरी और ब्याह की रस्मों में खाली कर दिए सब खाते हमारा अरमान जो थे तुम अचानक चल दिए तुम अपनी ऊँची उड़ान पर रह गए दोनों वैसे ही जैसे थे कभी अकेले हम परिचय : सरला मेहता निवासी : इं...
भाग्य की कसौटी
लघुकथा

भाग्य की कसौटी

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** (१४ सितम्बर २०२१ को हिंदी दिवस पर राष्ट्रीय हिन्दी रक्षक मंच द्वारा आयोजित अखिल भारतीय लघुकथा लेखन प्रतियोगिता (विषय मुक्त) में तृतीय स्थान प्राप्त लघुकथा।) शब्द संख्या- २०५ ब्याह की विदाई में नाइन पायल पाकर चहकने लगी, "अम्मा ! बहु आपकी चाँद का टुकड़ा है। भैया के साथ जोड़ी भी खूब जमती है। बुलाओ ना, ज़रा नज़र उतार दूँ।" यशोदा हँसती है, "तेरे मुँह में घी शक्कर। चल, दूल्हा-दुल्हन दोनों को एक साथ भेजती हूँ।" वन्दनवार अभी सूखे भी नहीं हैं। नई नवेली दुल्हन अपने प्रियतम के साथ मगन है। "पूर्णा ! बताओ ना, अपनी मनपसंद जगह। अच्छा ठीक है, मैं ही तय करता हूँ ।" कहते हुए पार्थ अपनी प्रिया को आग़ोश में ले निहारता है। और चल देता है टिकिट बुक कराने। तूफान कभी कहकर आता है भला। सड़क हादसे से पूर्णा के मेहंदी भरे हाथ मंगलसूत्र उतारने को मजबूर हो गए। ...
धीरे-धीरे रे मना
कहानी, नैतिक शिक्षा

धीरे-धीरे रे मना

सरला मेहता इंदौर (मध्य प्रदेश) ******************** "अरे चुन्नू ! क्या सारा दिन खेलते रहोगे। पता है, छः माही सर पर आ रही है। पढ़ाई के लिए स्कूल ने छुट्टी रखी है और मैं भी तुम्हारे लिए घर पर हूँ। तिमाही का रिज़ल्ट देखकर पापा ने कितनी डाँट लगाई थी, याद है न। चलो जल्दी से पढ़ने बैठो।" कामवाली सरयू अभी तक आई नहीं है। धैर्या पोहे धोकर प्याज़ काटने बैठ जाती है। आँखों से झरते पानी में मिले बहू के आँसू अम्मा को सोचने पर मजबूर कर देते हैं। उन्होने भी तीन तीन बच्चों को पाला है। दोनों बेटियाँ सुघढ़ता से गृहस्थी चलाते हुए नौकरी भी कर रही हैं। और बेटा भी अपने कर्तव्य निभा रहा है। बस तीनों को नियमित अभ्यास करने बिठा देती थी। ख़ुद तरकारी भाजी साफ़ करते हुए उनकी कॉपियाँ भी देखती जाती। फ़िर तीनों मस्ती में खेलते-कूदते रहते थे। तभी बहू ने नाश्ते के लिए आवाज़ लगाई। सही मौका देख उसे टेबल पर हिदायतें देने लगी- "बि...